Trending News

सिर्फ OTP नहीं, अब पूरा फोन निशाने पर! फर्जी बैंक साइट से ‘Android God Mode’ तक, 3 घंटे वाले साइबर फ्रॉड के नए खेल को ऐसे समझें

नई दिल्ली: साइबर ठगी का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब अपराधी केवल फोन कॉल, संदेश या नकली बैंक वेबसाइट के जरिए लोगों को निशाना नहीं बना रहे, बल्कि ऐसे तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं जिनसे मोबाइल फोन और उसमें मौजूद संवेदनशील जानकारी तक पहुंच बनाने की कोशिश की जाती है। Google Firebase जैसे क्लाउड प्लेटफॉर्म के कथित दुरुपयोग और ‘Android God Mode’ जैसे मैलवेयर ने साइबर सुरक्षा की चिंता बढ़ा दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र यानी I4C ने अगस्त में Google को Firebase पर मौजूद कम से कम 57 वेबसाइट और डेटाबेस हटाने के लिए नोटिस भेजे थे। इनमें भारतीय स्टेट बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और एक्सिस बैंक जैसी संस्थाओं की नकल करने वाले कुछ फिशिंग पेज भी शामिल थे। कुछ मामलों में क्रेडिट कार्ड, इनाम अंक या क्रेडिट सीमा बढ़ाने का लालच देकर लोगों से फर्जी ऐप डाउनलोड कराने की कोशिश की गई।

Firebase का इस्तेमाल कर कैसे बिछाया जा रहा ठगी का जाल?

Google Firebase एक क्लाउड आधारित मंच है, जिसका इस्तेमाल ऐप और वेबसाइट बनाने, डेटाबेस संभालने और होस्टिंग जैसी जरूरतों के लिए किया जाता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, साइबर अपराधियों ने इसकी आसान होस्टिंग और डेटाबेस सुविधाओं का दुरुपयोग कर फर्जी बैंकिंग पेज और दूसरे ठगी से जुड़े ढांचे तैयार किए।

ठग असली बैंक की वेबसाइट जैसा दिखने वाला पेज तैयार कर सकते हैं। इसके बाद किसी फर्जी लिंक या ऐप के जरिए ग्राहक को उस पेज तक पहुंचाया जाता है। अगर व्यक्ति वहां अपनी संवेदनशील जानकारी दर्ज करता है या संदिग्ध ऐप में जानकारी भरता है, तो वह डाटा अपराधियों के नियंत्रण वाले ढांचे तक पहुंच सकता है।

I4C के नोटिस में जिन 57 वेबसाइट और डेटाबेस को हटाने के लिए चिन्हित किया गया, उनमें 7 ऐसे फिशिंग पेज थे जो भारतीय स्टेट बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और एक्सिस बैंक जैसी संस्थाओं की वेबसाइट की नकल कर रहे थे। अन्य ढांचे का इस्तेमाल फोन से चोरी की गई जानकारी, क्रेडिट कार्ड विवरण और ओटीपी हासिल करने के लिए किया जा रहा था।

हालांकि, इस मामले में Google या Firebase को इन धोखाधड़ी गतिविधियों का जिम्मेदार नहीं बताया गया है।

फर्जी बैंक वेबसाइट को पहचानना क्यों हो रहा मुश्किल?

साइबर ठग अब नकली वेबसाइट को असली जैसा दिखाने के लिए उसी तरह के रंग, लोगो और डिजाइन का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में केवल वेबसाइट देखने से फर्क करना मुश्किल हो सकता है। लेकिन कुछ संकेतों पर ध्यान देकर जोखिम कम किया जा सकता है।

सबसे पहले वेबसाइट के पते को ध्यान से जांचें। असली बैंक की वेबसाइट का डोमेन बिल्कुल सही होता है, जबकि ठग अक्सर मिलते-जुलते नाम या अलग और संदिग्ध डोमेन का इस्तेमाल करते हैं। बहुत आकर्षक इनाम, भारी छूट, नकद लाभ या क्रेडिट कार्ड की सीमा बढ़ाने जैसे लालच वाले संदेश भी सावधानी का संकेत हैं।

अगर किसी लिंक पर जाने के बाद आपको किसी अनजान पेज से ऐप डाउनलोड करने के लिए कहा जाता है, तो विशेष सावधानी बरतें। खासकर किसी अज्ञात एपीके फाइल को डाउनलोड करने से बचना चाहिए। बैंकिंग ऐप हमेशा आधिकारिक ऐप स्टोर से ही डाउनलोड करना सुरक्षित विकल्प है।

‘Android God Mode’ मैलवेयर कितना खतरनाक है?

सरकारी चेतावनी के अनुसार, ‘Android God Mode’ जैसे मैलवेयर एंड्रॉयड की Accessibility सुविधाओं का दुरुपयोग कर सकते हैं। ये बैंकिंग, सरकारी या दूसरी जरूरी सेवाओं के नाम पर बनाए गए संदिग्ध ऐप के रूप में सामने आ सकते हैं।

एक बार उपयोगकर्ता ऐसा ऐप डाउनलोड कर उसे संवेदनशील अनुमतियां दे देता है, तो मैलवेयर फोन पर काफी हद तक नियंत्रण हासिल कर सकता है। यही वजह है कि ऐसे मैलवेयर केवल डाटा चोरी तक सीमित नहीं रहते, बल्कि बैंकिंग से जुड़ी गतिविधियों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं।

मैलवेयर फोन में आने के बाद क्या करता है?

ठग अक्सर किसी बैंक या सरकारी सेवा से जुड़े ऐप का रूप देकर संदिग्ध ऐप को फोन में पहुंचाते हैं। इसके बाद उपयोगकर्ता को Accessibility Services या दूसरी संवेदनशील अनुमतियां चालू करने के लिए किसी तरह राजी किया जाता है।

अनुमति मिलने के बाद मैलवेयर स्क्रीन पर दिखाई देने वाली गतिविधियों पर नजर रख सकता है। कुछ मामलों में बैंकिंग ऐप खुलने पर असली स्क्रीन के ऊपर नकली स्क्रीन दिखाने या उपयोगकर्ता की ओर से दर्ज की जा रही जानकारी को पकड़ने की कोशिश की जा सकती है।

इसके अलावा ऐसे मैलवेयर फोन पर आने वाले संदेशों और ओटीपी तक पहुंच बनाने का प्रयास कर सकते हैं। चोरी की गई जानकारी को अपराधियों के नियंत्रण वाले डाटाबेस तक भेजा जा सकता है। इससे पीड़ित को पता चलने से पहले ही उसके खाते से जुड़ी धोखाधड़ी का खतरा बढ़ जाता है।

सरकारी योजनाओं के नाम पर भी ठगी का नया तरीका

साइबर ठग अब केवल बैंक और क्रेडिट कार्ड के नाम का इस्तेमाल नहीं कर रहे। लोगों का भरोसा जीतने के लिए सरकारी योजनाओं को भी निशाना बनाया जा रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, एक मामले में पीएम-किसान योजना के नाम का इस्तेमाल किया गया। फर्जी वेबसाइट पर सरकारी भुगतान हासिल करने में मदद का दावा किया गया और इसके लिए एक ऐप डाउनलोड करने को कहा गया।

सरकारी योजना का नाम देखकर उपयोगकर्ता को यह भरोसा हो सकता है कि भुगतान पाने, स्थिति देखने या आवेदन से जुड़ी किसी प्रक्रिया के लिए नया ऐप जरूरी है। लेकिन असली खतरा संदिग्ध ऐप डाउनलोड करने के बाद शुरू हो सकता है।

ऐसे फर्जी ऐप के जरिए उपयोगकर्ता की जानकारी अपराधियों के नियंत्रण वाले Firebase डेटाबेस तक पहुंचाने और फोन में मौजूद दूसरी जानकारी या ऐप तक पहुंच बनाने की कोशिश की जा सकती है।

57 वेबसाइट हटाने के बाद भी नेटवर्क पर रोक मुश्किल क्यों?

I4C की ओर से कम से कम 57 वेबसाइट और डेटाबेस हटाने के लिए कार्रवाई शुरू किए जाने के बावजूद ऐसे नेटवर्क को पूरी तरह रोकना आसान नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह क्लाउड आधारित सेवाओं पर नए खाते और डेटाबेस तैयार करना आसान होना है।

एक संदिग्ध लिंक या ढांचा बंद होने के बाद अपराधी नया लिंक या नया डेटाबेस तैयार कर सकते हैं। इसके अलावा ऐसे नेटवर्क अलग-अलग स्थानों से संचालित किए जा सकते हैं, जिससे इनकी पहचान और कार्रवाई की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण हो जाती है।

संदिग्ध लिंक पर 3 घंटे में कार्रवाई का प्रावधान

सरकार की ओर से नोटिस जारी किए जाने के बाद Google को संदिग्ध लिंक या डेटाबेस को तीन घंटे के भीतर ब्लॉक करना होगा। ऐसा नहीं होने पर कंपनी की कानूनी जवाबदेही तय हो सकती है।

Google का कहना है कि उसकी नीतियां फिशिंग और वित्तीय धोखाधड़ी के खिलाफ सख्त हैं। क्लाउड, होस्टिंग, डोमेन और ऐप स्टोर जैसी सेवाओं के स्तर पर स्वचालित पहचान प्रणालियों और I4C जैसी एजेंसियों के साथ मिलकर संदिग्ध खातों की पहचान कर उन्हें ब्लॉक करने की व्यवस्था की जाती है।

I4C क्या है और साइबर अपराध में इसकी क्या भूमिका है?

I4C यानी भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाली एजेंसी है। इसकी स्थापना 5 अक्टूबर 2018 को गृह मंत्रालय के साइबर और सूचना सुरक्षा प्रभाग के तहत की गई थी। 1 जुलाई 2024 से इसे गृह मंत्रालय का संबद्ध कार्यालय बनाया गया।

इसका मुख्य उद्देश्य साइबर अपराध के खिलाफ कार्रवाई के लिए समन्वय बढ़ाना और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल के लिए केंद्रीय व्यवस्था के रूप में काम करना है।

गृह मंत्रालय के मुताबिक, 31 जनवरी 2026 तक इस व्यवस्था के जरिए 24.65 लाख से ज्यादा शिकायतों में 8,690 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय राशि बचाई गई थी। वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की तत्काल सूचना देने के लिए 1930 हेल्पलाइन भी संचालित है।

vineet verma

Recent Posts

मनेर थाने के गेट पर फायरिंग से मचा हड़कंप, 12 KM तक पीछा कर पुलिस ने तीन आरोपियों को दबोचा

मनेर थाने के गेट पर फायरिंग से मचा हड़कंप, 12 KM तक पीछा कर पुलिस…

19 minutes ago

विदेश यात्रा करने वालों के लिए बड़ा बदलाव! 1 सितंबर से बोर्डिंग पास पर नहीं लगेगी इमिग्रेशन की मुहर, जानिए अब कैसे होगा क्लीयरेंस

नई दिल्ली: विदेश जाने वाले यात्रियों के लिए 1 सितंबर 2026 से इमिग्रेशन प्रक्रिया में…

35 minutes ago

चंद्रयान-3 के 3 साल बाद भारत का अगला मिशन क्या है? चांद से शुक्र और 2040 तक इंसान को चंद्रमा पर उतारने की ISRO की पूरी तैयारी

बेंगलुरु: 23 अगस्त 2023 का वह ऐतिहासिक दिन आज भी भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की सबसे…

38 minutes ago

यश के ‘टॉक्सिक’ इवेंट में अचानक मची भगदड़ जैसी स्थिति, स्पीकर स्टैंड गिरने से फैंस घायल; एक्टर ने तुरंत रुकवाया कार्यक्रम

हैदराबाद: यश की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ की रिलीज से पहले…

51 minutes ago

वाराणसी में गंगा का रौद्र रूप, मणिकर्णिका की छतों पर जल रहीं चिताएं; अंतिम संस्कार के लिए करना पड़ रहा लंबा इंतजार

वाराणसी: गंगा के बढ़ते जलस्तर ने वाराणसी में हालात मुश्किल कर दिए हैं। शनिवार को…

1 hour ago

यूपी में आरक्षण पर फिर गरमाई सियासत, ब्रजेश पाठक के छात्रों से मिलते ही अखिलेश-मायावती का सरकार पर बड़ा हमला

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले आरक्षण का मुद्दा…

1 hour ago