बेंगलुरु: 23 अगस्त 2023 का वह ऐतिहासिक दिन आज भी भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है, जब चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सफल सॉफ्ट लैंडिंग की थी। लैंडिंग के बाद इसरो प्रमुख एस. सोमनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संदेश दिया था- ‘सर, चंद्रयान-3 ने चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग कर ली है… इंडिया इज ऑन द मून।’ उस ऐतिहासिक उपलब्धि के तीन साल बाद भारत अब अगले बड़े लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है। चंद्रयान-4 से लेकर गगनयान, लूपेक्स, शुक्रयान, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्री को चांद की सतह पर उतारने की योजना पर काम आगे बढ़ रहा है।
23 अगस्त 2023 को विक्रम लैंडर ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सफल सॉफ्ट लैंडिंग की थी। इस उपलब्धि के साथ भारत चंद्रमा के इस चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बना और चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतरने वाला चौथा राष्ट्र बना। इसी ऐतिहासिक उपलब्धि की याद में हर साल 23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस मनाया जाता है।
शिव शक्ति पॉइंट पर उतरने के बाद विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर ने करीब 14 दिनों तक चंद्रमा की सतह पर वैज्ञानिक प्रयोग किए। इस दौरान सतह के तापमान और कंपन से जुड़ी जानकारी जुटाई गई तथा दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सल्फर समेत कई तत्वों की मौजूदगी की पुष्टि हुई। चंद्रयान-3 की सफलता ने भारत की अंतरिक्ष तकनीक को नई पहचान देने के साथ भविष्य के महत्वाकांक्षी अभियानों का रास्ता भी खोला।
चंद्रयान-3 की सफलता के बाद भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम केवल चांद तक सीमित नहीं रहा। आने वाले वर्षों में कई ऐसे मिशन प्रस्तावित हैं, जिनका मकसद चंद्रमा की सतह से नमूने वापस लाने, वहां पानी की तलाश करने, शुक्र ग्रह का अध्ययन करने और इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता को मजबूत करना है।
चंद्रयान-4 भारत के अगले बड़े चंद्र मिशनों में शामिल है। इसका सबसे अहम लक्ष्य चंद्रमा की सतह से नमूने एकत्र कर उन्हें सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाना है। मौजूदा अद्यतन योजना के मुताबिक इसकी लॉन्चिंग अक्टूबर 2027 में हो सकती है।
यह मिशन चंद्रयान-3 की तुलना में काफी जटिल होगा। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार करीब 9,200 किलोग्राम के इस मिशन के लिए दो अलग-अलग एलवीएम-3 प्रक्षेपणों की जरूरत पड़ सकती है। इसमें पांच मॉड्यूल होंगे और मिशन के दौरान पृथ्वी तथा चंद्र कक्षा में कई बार डॉकिंग और अनडॉकिंग की प्रक्रिया होगी।
चंद्रमा की सतह से नमूने लेने के बाद उन्हें पुनः प्रवेश मॉड्यूल के जरिए पृथ्वी पर लाने की योजना है। यह तकनीक भविष्य में मानव चंद्र मिशन की तैयारी के लिहाज से भी बेहद अहम मानी जा रही है।
इसके बाद भारत और जापान मिलकर चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों का अध्ययन करने की तैयारी में हैं। भारत और जापान की अंतरिक्ष एजेंसियों का संयुक्त लूपेक्स मिशन अप्रैल 2026 के रोडमैप के मुताबिक सितंबर 2028 में लॉन्च किया जा सकता है।
इस अभियान का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा पर पानी की मात्रा, उसकी स्थिति और वहां से उसके इस्तेमाल की संभावनाओं का पता लगाना है। इसके साथ ही चंद्रमा के भूगर्भीय इतिहास को समझने की कोशिश भी की जाएगी।
मिशन में जापान प्रक्षेपण यान और रोवर से जुड़ी प्रमुख जिम्मेदारियां संभालेगा, जबकि भारत लैंडर विकसित करेगा। प्रस्तावित रोवर का वजन चंद्रयान-3 के 26 किलोग्राम के रोवर की तुलना में करीब 350 से 400 किलोग्राम रखा जाना है।
भारत की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षा अब शुक्र ग्रह तक पहुंचने की भी है। शुक्रयान के नाम से चर्चित वीनस ऑर्बिटर मिशन को मार्च 2028 में लॉन्च करने की योजना है।
इस मिशन के जरिए शुक्र के वातावरण, बादलों, एरोसोल, बिजली, आयनमंडल और सौर पवन के साथ उसकी प्रतिक्रिया का अध्ययन किया जाएगा। इसके अलावा ग्रह की सतह और उप-सतह की भी जांच की जाएगी। मिशन की प्रस्तावित अवधि पांच साल है।
शुक्र पृथ्वी के सबसे नजदीकी ग्रहों में है, लेकिन उसकी परिस्थितियां बेहद कठोर हैं। उसकी सतह का तापमान करीब 460 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है और वहां का वातावरण बेहद घना है। ऐसे में शुक्रयान से इस ग्रह को समझने के लिए महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है। इस अभियान में स्वीडन भी भारत के साथ है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, मिशन के जरिए शुक्र की उच्च-रिजॉल्यूशन मैपिंग करने की योजना है, जो पूरे ग्रह के स्तर पर पहले किए गए अभियानों से अलग और अधिक विस्तृत हो सकती है।
चंद्र और ग्रह मिशनों के साथ भारत की नजर अंतरिक्ष में अपना स्टेशन बनाने पर भी है। भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का पहला मॉड्यूल 2028 में लॉन्च करने का लक्ष्य रखा गया है। पांच मॉड्यूल वाले इस स्टेशन को 2035 तक पूरा करने की योजना है।
यह स्टेशन पृथ्वी से करीब 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर कक्षा में स्थापित किया जाएगा। इसका इस्तेमाल वैज्ञानिक प्रयोगों, सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण अनुसंधान और भविष्य के मानव अंतरिक्ष अभियानों के लिए किया जाना है।
भविष्य के भारी अंतरिक्ष अभियानों के लिए इसरो अगली पीढ़ी का प्रक्षेपण यान एनजीएलवी विकसित कर रहा है। मार्च 2026 तक की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इसका पहला विकासात्मक प्रक्षेपण सितंबर 2031 तक किया जा सकता है।
इसे निम्न पृथ्वी कक्षा में करीब 30 टन तक पेलोड पहुंचाने में सक्षम बनाने की योजना है। इसके पहले चरण में दोबारा इस्तेमाल की क्षमता भी विकसित करने का लक्ष्य है। इसकी क्षमता एलवीएम-3 से करीब तीन गुना अधिक रखने की योजना है, ताकि भारी पेलोड को अपेक्षाकृत कम लागत में अंतरिक्ष तक पहुंचाया जा सके।
भारत के मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम की सबसे अहम कड़ी गगनयान है। इसके तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को निम्न पृथ्वी कक्षा में भेजने और उन्हें सुरक्षित वापस लाने की तकनीक विकसित की जा रही है।
आगे चलकर गगनयान से हासिल अनुभव भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और मानव चंद्र मिशन के लिए आधार तैयार करेगा। 10 अप्रैल 2026 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में दूसरे एकीकृत एयर ड्रॉप परीक्षण को सफलतापूर्वक पूरा किया गया था। गगनयान को 2027 की पहली तिमाही में लॉन्च करने की योजना है।
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का सबसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य 2040 तक एक भारतीय को चंद्रमा की सतह पर उतारना है। इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए चंद्रयान-4 की नमूना वापसी तकनीक, लूपेक्स की ध्रुवीय खोज, गगनयान की मानव अंतरिक्ष उड़ान, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और एनजीएलवी जैसी क्षमताओं का विकसित होना जरूरी होगा।
इसके बाद 2047 तक चंद्रमा पर स्थायी आउटपोस्ट की दिशा में आगे बढ़ने की योजना है। हालांकि, इन सभी समय-सीमाओं को लक्ष्य के तौर पर देखा जाना चाहिए, इन्हें निश्चित या गारंटीकृत प्रक्षेपण तारीख नहीं माना गया है।
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