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Iran Sanctions: ट्रंप के नए प्लान से ईरान की बढ़ेगी मुश्किल? तेल से बैंकिंग तक चारों तरफ शिकंजा कसने की तैयारी

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अब सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रह गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन अब तेहरान की अर्थव्यवस्था को निशाना बनाने के लिए प्रतिबंधों का दायरा और बढ़ाने की तैयारी में है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के संकेतों के बाद माना जा रहा है कि वॉशिंगटन ईरान की तेल कमाई, बैंकिंग नेटवर्क, शिपिंग और प्रतिबंधों से बचने वाली कंपनियों पर एक साथ दबाव बढ़ा सकता है।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका ईरान के लिए समुद्र, जमीन और वित्तीय व्यवस्था—तीनों रास्तों को एक साथ मुश्किल बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है?

तेल से बैंकिंग तक ईरान पर बढ़ेगा दबाव

अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के तहत काम करने वाले ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) ने ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ईरान से जुड़े बड़ी संख्या में लोगों, जहाजों और विमानों को प्रतिबंधों के दायरे में लाया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान से जुड़े करीब 50 करोड़ डॉलर के क्रिप्टो एसेट्स को भी फ्रीज किया जा चुका है। वहीं, होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल परिवहन को लेकर तनाव ने ईरान के सबसे अहम आर्थिक स्रोतों में से एक पर दबाव और बढ़ा दिया है।

अब अमेरिकी रणनीति का अगला निशाना उन नेटवर्क को बताया जा रहा है, जिनके जरिए ईरान प्रतिबंधों के बावजूद अपना तेल बेचता और भुगतान हासिल करता है।

चीन की ‘टीपॉट रिफाइनरी’ पर अमेरिका की नजर

ईरान के तेल कारोबार में चीन की भूमिका सबसे अहम है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, ईरान के कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा चीन पहुंचता है। इसमें चीन की छोटी और स्वतंत्र रिफाइनरियां, जिन्हें ‘टीपॉट रिफाइनरी’ कहा जाता है, महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इनमें से कई कंपनियों का अमेरिकी वित्तीय सिस्टम से सीधा संपर्क नहीं है। यही वजह है कि अमेरिकी प्रतिबंधों का इन पर असर सीमित रहा है।

अब वॉशिंगटन इन रिफाइनरियों और ईरानी तेल खरीदने वाले नेटवर्क पर सेकेंडरी सैंक्शंस के जरिए दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो ईरान के सबसे बड़े तेल बाजार पर सीधा असर पड़ने की संभावना है।

चीन के बड़े बैंकों को भी चेतावनी

अमेरिका ने पहले ही चीन और हांगकांग की कुछ संस्थाओं पर कार्रवाई की है, जिन पर ईरान के तेल से जुड़े वित्तीय लेनदेन और अन्य गतिविधियों में मदद करने के आरोप लगे थे।

अब अमेरिकी अधिकारियों की नजर चीन के बड़े वित्तीय संस्थानों पर भी है। रिपोर्ट के मुताबिक, दो बड़े चीनी बैंकों को चेतावनी दी गई है कि अगर उनके जरिए ईरानी फंड का लेनदेन हुआ तो उन पर भी कार्रवाई हो सकती है।

हालांकि, इस कदम में अमेरिका के सामने एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती भी है। चीन जवाब में महत्वपूर्ण खनिजों और रणनीतिक कच्चे माल के निर्यात पर प्रतिबंध या नियंत्रण बढ़ा सकता है।

फर्जी कंपनियों और छिपे नेटवर्क पर भी कार्रवाई

ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए कंपनियों, व्यापारिक नेटवर्क और वित्तीय माध्यमों का इस्तेमाल करता रहा है।

अमेरिका अब ऐसे फ्रंट कंपनियों, बिचौलियों और वित्तीय नेटवर्क पर कार्रवाई तेज कर सकता है, जो ईरान के तेल राजस्व को दूसरे देशों तक पहुंचाने में मदद करते हैं।

अमेरिकी रणनीति का मकसद सिर्फ ईरान की किसी एक कंपनी को प्रतिबंधित करना नहीं, बल्कि उस पूरे नेटवर्क को कमजोर करना है जिसके जरिए प्रतिबंधों के बावजूद पैसा ईरान तक पहुंचता है।

होर्मुज के बाद हवाई रास्ते पर भी नजर

ईरान के लिए समुद्री रास्ते पहले ही तनाव का केंद्र बने हुए हैं। ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंधों का अगला मोर्चा हवाई परिवहन और एविएशन नेटवर्क भी हो सकता है।

अगर ईरान से जुड़े विमानों, एयर कार्गो नेटवर्क और संबंधित कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए जाते हैं तो इससे व्यापार और जरूरी सामान की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।

जमीन से ईरान को घेरना कितना संभव?

अमेरिका और उसके सहयोगी ईरान के पड़ोसी देशों के जरिए जमीनी व्यापार पर दबाव बढ़ाने की संभावनाओं पर भी विचार कर सकते हैं।

ईरान की सीमाएं इराक, तुर्की, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान और आर्मेनिया से लगती हैं। इनमें से कुछ देशों के साथ ईरान का महत्वपूर्ण व्यापारिक संपर्क है।

अगर इन रास्तों पर भी कड़े प्रतिबंध या निगरानी लागू होती है तो ईरान के लिए खाद्य पदार्थ, ऊर्जा, औद्योगिक सामान और अन्य जरूरी वस्तुओं का आयात मुश्किल हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक इतनी व्यापक जमीनी नाकेबंदी को लागू करना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।

ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर भी खतरा

ट्रंप प्रशासन उन देशों पर भी दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है जो ईरान के साथ व्यापार जारी रखते हैं।

इसके लिए सेकेंडरी टैरिफ और प्रतिबंधों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका मतलब यह होगा कि ईरान के साथ कारोबार करने वाली विदेशी कंपनियों और देशों को अमेरिकी बाजार में कारोबार की कीमत चुकानी पड़ सकती है।

अगर यह नीति बड़े पैमाने पर लागू होती है तो इसका असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चीन समेत कई देशों की कंपनियां भी अमेरिकी दबाव में आ सकती हैं।

अब ईरान के सामने क्या चुनौती?

अमेरिका की रणनीति अगर एक साथ तेल, बैंकिंग, शिपिंग, विमानन और जमीनी व्यापार नेटवर्क पर लागू होती है तो ईरान की विदेशी मुद्रा आय और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर बड़ा दबाव पड़ सकता है।

लेकिन इसके साथ अमेरिका के सामने भी जोखिम हैं। चीन के साथ तनाव बढ़ना, वैश्विक तेल बाजार पर असर और क्षेत्रीय देशों के साथ कूटनीतिक समीकरण बिगड़ना वॉशिंगटन के लिए बड़ी चुनौती हो सकती है।

फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर है कि अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट की आगामी घोषणा में ईरान के खिलाफ कितने नए प्रतिबंधों का ऐलान होता है। अगर प्रतिबंधों का दायरा उम्मीद से ज्यादा व्यापक हुआ तो ईरान-अमेरिका संघर्ष का आर्थिक मोर्चा और ज्यादा आक्रामक हो सकता है।

news desk

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