नासा ड्रैगनफ्लाई मिशन टाइटन
वाशिंगटन: साइंस और टेक्नोलॉजी की दुनिया में एक ऐतिहासिक कदम! NASA का महत्वाकांक्षी Dragonfly mission अब एक अहम चरण में पहुंच गया है। मिशन का उड़ने वाला रोबोट यानी रोटरक्राफ्ट अब इंटीग्रेशन और टेस्टिंग स्टेज में है। इस मिशन के तहत शनि ग्रह के सबसे बड़े चंद्रमा Titan पर एक कार के आकार का ड्रोन भेजा जाएगा, जो वहां की झीलों, रेत के टीलों, नदियों और बर्फीली जमीन की जांच करेगा। खास बात यह है कि यह पहली बार होगा जब कोई स्पेसक्राफ्ट किसी दूसरे ग्रह या चंद्रमा पर उड़ते हुए कई जगहों पर जाकर वैज्ञानिक अध्ययन करेगा।
टाइटन सौर मंडल का बेहद अनोखा चंद्रमा माना जाता है। इसका वातावरण घना नाइट्रोजन बेस्ड है और यह पृथ्वी के मुकाबले लगभग चार गुना ज्यादा घना है। यहां मीथेन और ईथेन की तरल झीलें और समुद्र हैं, मीथेन की बारिश होती है और नदियां भी बहती हैं। यह सब सुनने में पृथ्वी जैसा लगता है, लेकिन यहां का तापमान करीब माइनस 179 डिग्री सेल्सियस होता है।
वैज्ञानिकों के लिए टाइटन इसलिए भी खास है क्योंकि यहां बड़ी मात्रा में ऑर्गेनिक कंपाउंड्स पाए जाते हैं, जिन्हें जीवन के शुरुआती निर्माण ब्लॉक माना जाता है। कई वैज्ञानिक मानते हैं कि टाइटन किसी “नेचुरल लैब” की तरह है, जहां हम यह समझ सकते हैं कि पृथ्वी पर जीवन शुरू होने से पहले हालात कैसे रहे होंगे। यहां की बर्फीली सतह के नीचे महासागर होने की संभावना भी जताई जाती है।
ड्रैगनफ्लाई असल में एक ऑक्टोकॉप्टर ड्रोन होगा, यानी इसमें आठ रोटर लगे होंगे और इसका आकार लगभग एक छोटी कार जितना होगा। टाइटन की घनी हवा और कम गुरुत्वाकर्षण के कारण यह आसानी से उड़ सकेगा।
यह रोबोट हर उड़ान में करीब 8 से 10 किलोमीटर तक उड़कर नई जगहों पर लैंड करेगा और पूरे मिशन के दौरान लगभग 175 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय कर सकता है, जो मंगल ग्रह पर चलने वाले रोवर्स से भी ज्यादा है। इसकी पहली लैंडिंग शांगरी-ला नाम के ड्यून फील्ड में होगी, जो Selk crater के पास स्थित है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यहां पुराने पानी और ऑर्गेनिक मटेरियल के संकेत मिल सकते हैं।
रोबोट मीथेन की झीलों, नदियों और कैन्यॉन्स का अध्ययन करेगा, साथ ही कार्बनिक रेत के टीलों और संभावित क्रायोवोल्केनो यानी बर्फीले ज्वालामुखियों के निशान भी खोजेगा। इसके अलावा यह “प्रीबायोटिक केमिस्ट्री” यानी जीवन से पहले की रासायनिक प्रक्रियाओं का भी विश्लेषण करेगा, जिससे यह पता लगाया जा सके कि क्या यहां जीवन के शुरुआती संकेत मौजूद हैं।
ड्रैगनफ्लाई पर हाई-रेजोल्यूशन कैमरे, सैंपल लेने के लिए ड्रिल, स्पेक्ट्रोमीटर और कई वैज्ञानिक उपकरण लगाए जाएंगे। यह सौर ऊर्जा से नहीं बल्कि न्यूक्लियर पावर सिस्टम (RTG) से चलेगा, क्योंकि टाइटन पर सूरज की रोशनी बहुत कम पहुंचती है।
मौजूदा योजना के मुताबिक यह मिशन जुलाई 2028 में Falcon Heavy रॉकेट के जरिए लॉन्च किया जाएगा। लगभग छह साल की यात्रा के बाद यह 2034 में टाइटन तक पहुंचेगा। वहां पहुंचने के बाद इसका वैज्ञानिक मिशन करीब 3.3 साल तक चलेगा।
2026 में मिशन का रोटरक्राफ्ट इंटीग्रेशन और टेस्टिंग शुरू हो चुकी है। इसका असेंबली काम Johns Hopkins Applied Physics Laboratory में किया जा रहा है, जबकि रोटर्स के शुरुआती टेस्ट NASA Langley Research Center में पूरे हो चुके हैं। 2027 में फाइनल टेस्टिंग के बाद इसे लॉन्च के लिए तैयार किया जाएगा।
वैज्ञानिकों का मानना है कि ड्रैगनफ्लाई मिशन न सिर्फ टाइटन की सतह और केमिस्ट्री को समझने में मदद करेगा, बल्कि यह भी पता लगाने में मदद कर सकता है कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई थी। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक चलता है, तो यह मिशन अंतरिक्ष अन्वेषण के एक नए युग की शुरुआत कर सकता है—जहां रोबोट सिर्फ चलेंगे नहीं, बल्कि दूसरे ग्रहों और चंद्रमाओं पर उड़कर नई-नई जगहों की खोज भी करेंगे।
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