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मालवीय नगर अग्निकांड: 21 मौतों के बाद उठे बड़े सवाल, जिम्मेदार सिर्फ होटल मालिक या ‘सब चलता है’ वाला सिस्टम?

नई दिल्ली: दिल्ली के मालवीय नगर में हुए भीषण होटल अग्निकांड ने 21 लोगों की जान ले ली, लेकिन आग बुझने के बाद अब कई ऐसे सवाल सामने खड़े हैं जिनका जवाब तलाशा जा रहा है। इस हादसे के बाद पुलिस की गिरफ्त में आए होटल मालिक लवकेश बजाज के खुलासों ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। उनके बयानों से यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या इस त्रासदी के लिए केवल होटल प्रबंधन जिम्मेदार है या फिर वर्षों से चली आ रही ‘सब चलता है’ वाली व्यवस्था भी इसके लिए उतनी ही दोषी है।

होटल बनाने के लिए खरीदी थी पुरानी इमारत

पुलिस पूछताछ में लवकेश बजाज ने बताया कि उसने करीब तीन साल पहले यह संपत्ति खरीदी थी। उस समय यहां होटल नहीं बल्कि खादी की एक दुकान संचालित होती थी। इमारत काफी जर्जर हालत में थी, जिसके बाद उसकी मरम्मत कराकर होटल शुरू करने की योजना बनाई गई। लवकेश का दावा है कि उसने यह जिम्मेदारी जय मिश्रा नामक व्यक्ति को सौंपी थी, जिसे बाद में होटल का प्रबंधक बनाया गया।

6 कमरों की अनुमति, बना दिए 25 कमरे

जानकारी के मुताबिक जय मिश्रा के नाम पर बेड एंड ब्रेकफास्ट नीति के तहत केवल 6 कमरों का लाइसेंस लिया गया था। हालांकि पुलिस को दिए बयान में लवकेश ने स्वीकार किया कि उसे सलाह दी गई थी कि होटल में कमरों की संख्या बढ़ा ली जाए क्योंकि “दिल्ली में सब चलता है”। इसी सोच के तहत 6 कमरों की अनुमति होने के बावजूद होटल में 25 कमरे तैयार कर दिए गए।

21 लोगों की मौत के लिए कौन जिम्मेदार?

लवकेश बजाज ने यह भी बताया कि आग लगने के समय वह होटल परिसर में मौजूद था, लेकिन बाद में वहां से निकल गया। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 21 लोगों की जान लेने वाले इस हादसे के लिए केवल होटल मालिक और प्रबंधन को जिम्मेदार माना जाए या फिर उस व्यवस्था को भी कटघरे में खड़ा किया जाए जिसने नियमों के उल्लंघन को समय रहते नहीं रोका।

जब 6 कमरों की अनुमति वाले भवन में 25 कमरे बनाए जा रहे थे, तब निर्माण कार्य भी हुआ होगा और उसका विस्तार भी दिखाई दिया होगा। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या संबंधित विभागों और स्थानीय प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं थी। इसी वजह से एक बार फिर “सब चलता है” वाली कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

हादसे के बाद शुरू हुई जांच

21 लोगों की मौत के बाद अब संबंधित विभाग सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। इलाके के अन्य होटलों की जांच की जा रही है और सुरक्षा मानकों की समीक्षा की जा रही है। बताया जा रहा है कि क्षेत्र में ऐसे कई अन्य प्रतिष्ठान भी मौजूद हैं, जहां नियमों के पालन को लेकर सवाल उठ सकते हैं।

26 घंटे बाद घायलों से मिलने पहुंचीं मुख्यमंत्री

हादसे के लगभग 26 घंटे बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता साकेत स्थित अस्पताल पहुंचीं और घायलों का हालचाल जाना। मुख्यमंत्री के अस्पताल पहुंचने में हुई देरी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि राजधानी में हुई इतनी बड़ी घटना के बाद राहत और संवेदना का यह दौरा पहले क्यों नहीं हुआ।

एक परिवार के 8 लोगों की मौत ने झकझोरा

इस हादसे की सबसे दर्दनाक कहानियों में से एक गुरुग्राम निवासी अग्रवाल परिवार की है। राधेश्याम अग्रवाल का इलाज साकेत के एक अस्पताल में चल रहा था। उनके बेटे विवेक अग्रवाल अपने परिवार और रिश्तेदारों के साथ अस्पताल के पास ठहरने के लिए इसी होटल में रुके थे।

आग लगने के बाद परिवार के 8 सदस्य इसकी चपेट में आ गए और उनकी मौत हो गई। बताया जाता है कि विवेक अग्रवाल ने आग में फंसने के दौरान अपने एक रिश्तेदार को फोन कर यह आशंका जताई थी कि शायद वह जीवित नहीं बच पाएंगे।

सबसे दुखद पहलू यह है कि अस्पताल में भर्ती राधेश्याम अग्रवाल को शायद अभी तक यह भी पूरी तरह पता नहीं है कि जिन परिजनों के सहारे वह जीवन की लड़ाई लड़ रहे थे, वे अब इस दुनिया में नहीं रहे। हादसे में उनकी पत्नी हेमलता अग्रवाल, बेटे विवेक अग्रवाल, बहू, पोती और अन्य रिश्तेदारों की जान चली गई।

मुआवजे से नहीं भर पाएगा नुकसान

सरकार ने मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। हालांकि जिन परिवारों ने एक साथ कई अपनों को खो दिया, उनके लिए यह नुकसान किसी भी आर्थिक मदद से पूरा नहीं किया जा सकता। मालवीय नगर अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक “सब चलता है” की मानसिकता सुरक्षा नियमों पर भारी पड़ती रहेगी।

मुजफ्फरपुर अस्पताल हादसे ने भी बढ़ाई चिंता

दिल्ली के इस अग्निकांड के बीच बिहार के मुजफ्फरपुर में भी एक निजी अस्पताल में आग लगने की घटना सामने आई। अस्पताल के आईसीयू में लगी आग में 5 मरीजों की मौत हो गई, जबकि 20 से अधिक लोग झुलस गए।

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार आग शॉर्ट सर्किट की वजह से लगी। आरोप यह भी है कि हादसे के समय मरीजों को सुरक्षित निकालने के लिए अस्पताल का पर्याप्त स्टाफ मौजूद नहीं था और परिजनों को खुद मरीजों को स्ट्रेचर पर लेकर बाहर भागना पड़ा। घटना के बाद अस्पताल संचालक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश दिए गए हैं और जांच शुरू कर दी गई है।

दिल्ली से लेकर मुजफ्फरपुर तक सामने आई इन घटनाओं ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा किया है कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी कब तक “सब चलता है” के भरोसे जारी रहेगी और हर बड़े हादसे के बाद ही व्यवस्था क्यों जागती है।

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