भारत और ब्रिटेन के ट्रेड रिलेशन में एक गेम-चेंजिंग मोड़ आ गया है। दोनों देशों के बीच मोस्ट-अवेडेट फ्री ट्रेड एग्रीमेंट FTA यानी कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड पार्टनरशिप CETA ऑफिशियल तौर पर लागू हो गया है। मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स के मुताबिक, इस मेगा डील का टारगेट अगले 3-4 सालों में बाइलेटरल ट्रेड को 60 अरब डॉलर से बढ़ाकर सीधे 100 अरब डॉलर (लगभग 8.3 लाख करोड़ रुपए) के पार ले जाना है।
ग्लोबल ट्रेड मार्केट में इसे भारत की एक बहुत बड़ी डिप्लोमैटिक और इकोनॉमिक जीत माना जा रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस डील के बाद ब्रिटिश मार्केट में सालों से डॉमिनेट कर रहे चीन और बांग्लादेश जैसे देशों को कड़ी टक्कर मिलेगी और चीन के हाथ से अरबों डॉलर के एक्सपोर्ट ऑर्डर्स निकलकर भारत के पाले में आ सकते हैं।
यूके का सालाना इम्पोर्ट मार्केट करीब 949 अरब डॉलर का है, लेकिन इस बड़े बाजार में भारत का शेयर फिलहाल 2% से भी कम है। भारत की इसी कमजोरी का फायदा अब तक चीन उठाता आ रहा था। मिसाल के तौर पर, यूके के 28.8 अरब डॉलर के टेक्सटाइल मार्केट में अकेले चीन 25% हिस्सेदारी के साथ बैठा है, जबकि भारत सिर्फ 6.6% पर है।
लेकिन अब पासा पलटने वाला है। इस समझौते के तहत ब्रिटेन ने भारत के 99.5% एक्सपोर्ट वैल्यू पर से कस्टम ड्यूटी ‘टैक्स’ को पूरी तरह हटा दिया है। भारतीय कंपनियों को वहां जीरो-टैरीफ का सीधा फायदा मिलेगा, जिससे हमारे प्रोडक्ट्स चीन के मुकाबले काफी सस्ते और कॉम्पिटिटिव हो जाएंगे। नतीजा यह होगा कि ब्रिटिश बायर्स अब चीन को छोड़कर भारत का रुख करेंगे, जिसका सीधा फायदा तिरुपुर, सूरत, लुधियाना और पानीपत जैसे घरेलू टेक्सटाइल हब्स को मिलेगा।
ब्रिटेन ने अपने केवल 117 सेंसिटिव प्रोडक्ट्स को छोड़कर भारत के लगभग सभी लेबर-इंटेंसिव और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स के लिए अपना मार्केट खोल दिया है:
लेबर-इंटेंसिव इंडस्ट्रीज: टेक्सटाइल्स, रेडीमेड गारमेंट्स, लेदर, फुटवियर और कारपेट जैसे सेक्टर्स पर पहले जो 12% से 16% तक टैक्स लगता था, वह अब सीधे 0% हो गया है।
इंजीनियरिंग और फार्मा: यूके हर साल 193 अरब डॉलर से ज्यादा के इंजीनियरिंग सामान का इम्पोर्ट करता है, जिसमें भारत का शेयर अभी सिर्फ 4.28 अरब डॉलर है। ड्यूटी-फ्री एंट्री मिलने से इस सेक्टर में ग्रोथ की भारी संभावनाएं हैं। इसके अलावा भारतीय दवाओं और सी-फूड को भी यूके मार्केट का सीधा एक्सेस मिलेगा।
सर्विस और आईटी सेक्टर: डील में शामिल ‘डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन’ (DCC) की वजह से भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और स्किल्ड वर्कफोर्स के लिए यूके के टेक और फाइनेंशियल मार्केट में काम करने के रास्ते आसान हो जाएंगे।
इस डील के बदले भारत ने भी अपने करीब 12,000 प्रोडक्ट्स में से 89.4% ब्रिटिश गुड्स पर ड्यूटी कम या खत्म करने का फैसला किया है, लेकिन पूरी प्लानिंग के साथ:
सस्ती होंगी लग्जरी कारें और स्कॉच: भारत आने वाली ब्रिटिश लग्जरी कारों जैसे जगुआर लैंड रोवर पर लगने वाला 110% का भारी टैक्स, कोटा सिस्टम के तहत धीरे-धीरे घटकर सिर्फ 10% रह जाएगा। इसके अलावा ब्रिटिश स्कॉच व्हिस्की पर भी 150% का टैक्स पहले साल घटकर 110% और अगले 10 सालों में 40% पर आ जाएगा।
किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं: घरेलू कृषि बाजार को सुरक्षित रखने के लिए भारत सरकार ने डेयरी प्रोडक्ट्स, गेहूं, चावल, बाजरा, खाद्य तेल और सेंसिटिव सब्जियों को इस समझौते से पूरी तरह बाहर रखा है, ताकि भारतीय किसानों को कोई नुकसान न हो।
ईवी मार्केट को सेफ जोन: भारतीय इलेक्ट्रिक व्हीकल इंडस्ट्री को प्रोटेक्ट करने के लिए शुरुआती 5 सालों तक ब्रिटिश इलेक्ट्रिक कारों को इन रियायतों से दूर रखा गया है, ताकि लोकल कंपनियों को मजबूत होने का पूरा टाइम मिल सके।
इस डील की एक सबसे दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटिश कंपनियों को पहली बार भारत के केंद्रीय सरकारी खरीद बाजार में बोली लगाने की मंजूरी मिली है, जिसका सालाना साइज लगभग 38 अरब पाउंड है। हालांकि, इसके लिए एक सख्त रूल है, वही ब्रिटिश कंपनियां इसमें हिस्सा ले सकेंगी जो अपने इक्विपमेंट्स या सर्विसेज का कम से कम 20% हिस्सा यूके से लाती हों। इसके बदले में भारत को भी यूके के सरकारी खरीद सिस्टम में लीगल और सेफ एक्सेस मिला है।
भारत-यूके का यह एफटीए सिर्फ टैक्स कटौती की कोई मामूली डील नहीं है, बल्कि यह चीन पर ग्लोबल डिपेंडेंसी को कम करने की दिशा में भारत का एक बड़ा स्ट्रैटेजिक मूव है। अगर भारतीय मैन्युफैक्चरर्स अपनी क्वालिटी और सप्लाई चेन को मेंटेन रखते हैं, तो आने वाले समय में ब्रिटिश सुपरमार्केट्स में ‘मेड इन चाइना’ को पछाड़कर ‘मेड in इंडिया’ का जलवा साफ देखने को मिलेगा।
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