फीचर

हवा में 17,000 फीट पर इंडिगो फ्लाइट पर गिरी बिजली, टूट गई विमान की ‘नाक’; फिर भी 110 लोग रहे सुरक्षित, जानिए कैसे बची यात्रियों की जान

लखनऊ: पटना से लखनऊ जा रही इंडिगो की फ्लाइट 6E925 करीब 17,000 फीट की ऊंचाई पर खराब मौसम के बीच आकाशीय बिजली की चपेट में आ गई। बिजली गिरने से विमान के अगले हिस्से में मौजूद नोज कोन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। फ्लाइट में 104 यात्री और छह क्रू सदस्य सवार थे। विमान के अगले हिस्से में नुकसान के बावजूद फ्लाइट चौधरी चरण सिंह इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर तय समय से पहले सुरक्षित उतर गई और किसी यात्री को चोट नहीं आई। सवाल यह है कि विमान पर इतनी तेज बिजली गिरने के बाद भी अंदर बैठे यात्रियों को कुछ क्यों नहीं हुआ? इसकी वजह विमान की खास इंजीनियरिंग और फैराडे केज का सिद्धांत है।

क्या होता है फैराडे केज सिद्धांत?

कॉमर्शियल विमानों की सुरक्षा में फैराडे केज सिद्धांत अहम भूमिका निभाता है। विमान की बाहरी संरचना इस तरह तैयार की जाती है कि बिजली का आवेश उसके अंदर जाने के बजाय बाहरी सतह के साथ आगे बढ़ सके।

जब विमान पर आकाशीय बिजली गिरती है तो उसका विद्युत आवेश विमान के किसी बाहरी हिस्से, जैसे नोज कोन या विंगटिप से प्रवेश करता है। इसके बाद यह बाहरी धातु की परत या उसमें मौजूद तांबे की जाली के आसपास से होकर गुजरता है और विमान के पिछले हिस्से में लगे स्टैटिक डिस्चार्ज विक्स के जरिए बाहर निकल जाता है।

इस तरह विमान की बाहरी चालक परत बिजली के आवेश को यात्रियों वाले केबिन, संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और ईंधन टैंक से दूर रखती है।

फैराडे केज बिजली से कैसे बचाता है?

फैराडे केज पर जब विद्युत आवेश पड़ता है तो उसके भीतर मौजूद मुक्त इलेक्ट्रॉन बाहरी सतह पर फैल जाते हैं। इससे केज के अंदर विद्युत क्षेत्र को प्रभावी रूप से शून्य रखने में मदद मिलती है और अंदर मौजूद चीजें बाहरी विद्युत प्रभाव से सुरक्षित रहती हैं।

इसी सिद्धांत का इस्तेमाल विमान में भी किया जाता है। फैराडे केज का नाम प्रसिद्ध वैज्ञानिक माइकल फैराडे के नाम पर पड़ा और इसका आविष्कार वर्ष 1836 में हुआ था।

कार से लेकर MRI कक्ष तक में होता है इस्तेमाल

फैराडे केज सिद्धांत का इस्तेमाल सिर्फ विमानों में ही नहीं होता। अस्पतालों में MRI कक्ष को बाहरी रेडियो तरंगों से बचाने के लिए फैराडे केज जैसी संरचना का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि जांच के दौरान सटीक आंकड़े मिल सकें।

इसी तरह आकाशीय बिजली के दौरान कार की धातु की बॉडी भी फैराडे केज की तरह काम कर सकती है और उसके अंदर बैठे लोगों को बाहरी विद्युत प्रभाव से सुरक्षा मिल सकती है। संवेदनशील वैज्ञानिक उपकरणों और आंकड़ों को विद्युतचुंबकीय हस्तक्षेप से बचाने में भी इस सिद्धांत का इस्तेमाल किया जाता है।

विमान की ‘नाक’ ही क्यों हुई क्षतिग्रस्त?

विमान के सबसे आगे मौजूद नोज कोन को तकनीकी भाषा में रेडोम कहा जाता है। यह हिस्सा विमान के बाकी ढांचे से कुछ अलग होता है और आकाशीय बिजली की स्थिति में यहां नुकसान होने की आशंका अधिक हो सकती है।

विमान के अन्य हिस्सों में धातु की मिश्रधातु या चालक तांबे की जाली वाली मिश्रित सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं रेडोम को गैर-धातु फाइबरग्लास या मिश्रित सामग्री से बनाया जाता है, क्योंकि इसके ठीक अंदर मौसम का पता लगाने वाला रडार लगा होता है।

अगर रेडोम के आसपास धातु की परत लगा दी जाए तो वह माइक्रोवेव रडार संकेतों को रोक सकती है। इससे पायलटों के लिए तूफानी बादलों और खराब मौसम का पता लगाना मुश्किल हो सकता है।

रेडोम में विमान के मुख्य ढांचे जैसी लगातार चालक बाहरी परत नहीं होती। इसलिए बिजली गिरने पर इस हिस्से में अत्यधिक गर्मी से नुकसान, ढांचे के दबने या सतह में छेद होने जैसी क्षति हो सकती है। यही वजह है कि इंडिगो की फ्लाइट में बिजली गिरने के बाद विमान की ‘नाक’ यानी रेडोम को नुकसान हुआ, जबकि विमान का बाकी हिस्सा सुरक्षित रहा और सभी यात्री सुरक्षित उतर सके।

vineet verma

Recent Posts

ऑनलाइन दुल्हन की तलाश ने डुबोई मेहनत की कमाई! ग्वालियर में शादी का झांसा देकर साइबर ठगों ने दो परिवारों से ऐंठे 24,500 रुपये

ग्वालियर: मध्य प्रदेश के ग्वालियर में ऑनलाइन शादी का रिश्ता तलाशना दो परिवारों को भारी…

14 minutes ago

हार्ट अटैक आने से पहले शरीर देता है ये संकेत! सीने के दर्द से लेकर सांस फूलने तक, जानें सबसे कॉमन लक्षण और अस्पताल पहुंचने से पहले क्या करें

नई दिल्ली: हार्ट अटैक एक गंभीर चिकित्सकीय आपात स्थिति है, जिसमें हृदय की मांसपेशियों तक…

48 minutes ago

‘हीरो बनने के चक्कर में एक्टर मत खोना’, शाहरुख खान ने नाना पाटेकर को किया याद; भावुक पोस्ट में सुनाया पहली मुलाकात का किस्सा

मुंबई: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन से फिल्म इंडस्ट्री में शोक की…

53 minutes ago