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अलविदा नाना पाटेकर… 35 रुपये की नौकरी से ‘नटसम्राट’ तक, ऐसे बदली भारतीय सिनेमा में अभिनय की भाषा

Nana Patekar Death: नाना पाटेकर का निधन 75 साल की उम्र में गोवा में हुआ। रंगमंच से निकले इस अभिनेता ने ‘अंकुश’, ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘प्रहार’, ‘नटसम्राट’ और ‘अब तक छप्पन’ जैसी फिल्मों से अभिनय की अपनी अलग भाषा गढ़ी

गोवा/मुंबई। भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जिनकी पहचान उनकी फिल्मों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके अभिनय की उस शैली से होती है जिसे उनके बाद आने वाली पीढ़ियां भी याद रखती हैं। नाना पाटेकर उन्हीं कलाकारों में से एक थे। 75 साल की उम्र में गोवा में उनके निधन के साथ हिंदी और मराठी सिनेमा ने सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि अभिनय की एक विशिष्ट परंपरा खो दी है।

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Nana Patekar Death: नाना पाटेकर का निधन 75 साल की उम्र में गोवा में हुआ। रंगमंच से निकले इस अभिनेता ने ‘अंकुश’, ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘प्रहार’, ‘नटसम्राट’ और ‘अब तक छप्पन’ जैसी फिल्मों से अभिनय की अपनी अलग भाषा गढ़ी35 रुपये और एक वक्त के खाने से शुरू हुआ सफररंगमंच ने सिखाया कि संवाद सिर्फ शब्द नहीं होतेनाना की सबसे बड़ी ताकत थी ‘विराम’‘गमन’ से शुरू हुआ फिल्मी सफर‘प्रहार’ में अभिनेता ही नहीं, निर्देशक भी दिखा‘क्रांतिवीर’ ने नाना को जन-आवाज बना दिया‘खामोशी’ ने साबित किया कि नाना को संवादों की जरूरत नहीं‘नटसम्राट’: जब नाना खुद रंगमंच बन गए‘अब तक छप्पन’ से ‘वेलकम’ तक, हर दुनिया में अपनी छापसिर्फ हिंदी सिनेमा नहीं, मराठी फिल्मों में भी बड़ा योगदानअभिनय से आगे समाज से जुड़ा रहा नाना का जीवनपद्मश्री और राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानितनाना पाटेकर की सबसे बड़ी विरासत क्या है?

नाना पाटेकर को गोवा स्थित उनके घर में बेहोशी की हालत में पाया गया था। उन्हें डोना पाउला स्थित मणिपाल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने करीब 45 मिनट तक सीपीआर देकर उन्हें बचाने की कोशिश की। अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें सुबह करीब 5:20 बजे मृत घोषित किया गया।

लेकिन नाना पाटेकर की कहानी को केवल उनके निधन की खबर तक सीमित करना उनके पूरे रचनात्मक जीवन को छोटा कर देना होगा। उनकी असली विरासत यह सवाल है कि एक अभिनेता बिना पारंपरिक हीरो की छवि के भी करोड़ों दर्शकों के दिलों पर कैसे राज कर सकता है।

35 रुपये और एक वक्त के खाने से शुरू हुआ सफर

नाना पाटेकर का जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। उनका बचपन आर्थिक संघर्षों के बीच बीता। परिवार पर आर्थिक संकट आया तो कम उम्र में ही उन्हें यह समझ आ गया था कि जिंदगी केवल सपनों से नहीं चलती।

मुंबई के सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से पढ़ाई के दौरान उन्होंने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए सिनेमा के पोस्टर और बैनर पेंट किए। उस दौर में उन्हें कथित तौर पर महीने के करीब 35 रुपये और एक वक्त का खाना मिलता था।

यही मुंबई थी जहां उन्होंने फिल्मों के पोस्टर बाहर से बनाए और धीरे-धीरे उसी दुनिया के भीतर अपनी जगह बनाई।

उन्होंने विज्ञापन जगत में विजुअलाइजर के तौर पर भी काम किया, लेकिन उनकी मंजिल अंततः रंगमंच बनी। यहीं से उस कलाकार का निर्माण शुरू हुआ जिसे बाद में भारतीय सिनेमा नाना पाटेकर के नाम से पहचानने लगा।

रंगमंच ने सिखाया कि संवाद सिर्फ शब्द नहीं होते

नाना पाटेकर की अभिनय यात्रा को समझने के लिए उनके मराठी थिएटर के दौर को समझना जरूरी है।

रंगमंच पर काम करते हुए उन्होंने संवाद, विराम, शरीर की भाषा और चेहरे के भावों के जरिए किरदार को जीवंत करना सीखा। ‘हमीदाबाईची कोठी’, ‘पुरुष’, ‘कथा’ और दूसरे मराठी नाटकों ने उनके अभिनय को वह आधार दिया जिसने बाद में कैमरे के सामने उनकी शैली को अलग पहचान दी।

‘पुरुष’ में गुलाबराव का किरदार हो या दूसरे सामाजिक और राजनीतिक पात्र, नाना ने मंच पर ऐसे चरित्र गढ़े जो केवल कहानी का हिस्सा नहीं रहते थे, बल्कि दर्शक के सामने एक सामाजिक सच्चाई की तरह खड़े हो जाते थे।

यही रंगमंच की ट्रेनिंग आगे चलकर उनकी फिल्मों में दिखाई दी।

नाना की सबसे बड़ी ताकत थी ‘विराम’

नाना पाटेकर की संवाद अदायगी को केवल उनकी भारी आवाज से समझना गलत होगा। उनकी असली ताकत शब्दों के बीच का ठहराव था।

वे संवादों को कई बार छोटे-छोटे हिस्सों में तोड़ते थे। अचानक रुकते, सामने वाले को देखते, फिर शब्दों पर जोर देते। इस शैली ने उनके किरदारों में बेचैनी, गुस्सा, व्यंग्य और असहजता पैदा की।

यही वजह रही कि नाना का एक साधारण संवाद भी दूसरे कलाकार के लंबे भाषण से ज्यादा प्रभाव छोड़ जाता था।

उनकी अभिनय शैली में थिएटर की ऊर्जा थी, लेकिन कैमरे की जरूरत के हिसाब से उसका नियंत्रण भी था। क्लोजअप में आंखों का इस्तेमाल हो या पूरे फ्रेम में शरीर की भाषा, वे किरदार के सामाजिक और मानसिक स्तर को अभिनय के जरिए सामने रखते थे।

‘गमन’ से शुरू हुआ फिल्मी सफर

नाना पाटेकर ने 1978 में मुजफ्फर अली की फिल्म ‘गमन’ से हिंदी सिनेमा में कदम रखा। इसके बाद उन्होंने समानांतर और मुख्यधारा दोनों तरह के सिनेमा में काम किया।

‘अंकुश’ ने उन्हें अलग पहचान दी। फिल्म में बेरोजगार और असंतुष्ट युवाओं का गुस्सा था और नाना की अदायगी ने उस गुस्से को पर्दे पर वास्तविक चेहरा दिया।

फिर आई ‘परिंदा’।

विदु विनोद चोपड़ा की इस फिल्म में अन्ना सेठ के रूप में नाना पाटेकर ने ऐसा खतरनाक और अस्थिर किरदार निभाया जिसने हिंदी फिल्मों के विलेन को एक नई मनोवैज्ञानिक परत दी। उनके प्रदर्शन को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

‘प्रहार’ में अभिनेता ही नहीं, निर्देशक भी दिखा

1991 की ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ नाना पाटेकर के करियर का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव रही।

इस फिल्म में उन्होंने अभिनय के साथ निर्देशन भी किया। सैन्य जीवन को पर्दे पर दिखाने के लिए उन्होंने भारतीय सेना के साथ प्रशिक्षण लिया और सैनिकों की जिंदगी को मेलोड्रामा के बजाय अधिक वास्तविक तरीके से प्रस्तुत करने की कोशिश की।

यह फिल्म इस बात का प्रमाण थी कि नाना केवल अभिनेता नहीं थे, बल्कि कहानी और किरदार की दुनिया को भीतर से समझने वाले कलाकार भी थे।

‘क्रांतिवीर’ ने नाना को जन-आवाज बना दिया

1994 में आई ‘क्रांतिवीर’ ने नाना पाटेकर को मुख्यधारा के सिनेमा में एक अलग मुकाम दिया।

प्रताप नारायण तिलक का किरदार गुस्से, व्यवस्था से टकराव और सामाजिक बेचैनी से भरा था। फिल्म में उनके संवाद लंबे समय तक लोगों की जुबान पर रहे।

यही वह दौर था जब नाना की आवाज केवल किसी फिल्मी किरदार की आवाज नहीं रह गई थी। वह पर्दे पर आम आदमी के गुस्से, असंतोष और सवालों की आवाज बन चुकी थी।

‘क्रांतिवीर’ के लिए नाना पाटेकर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

‘खामोशी’ ने साबित किया कि नाना को संवादों की जरूरत नहीं

नाना पाटेकर की अभिनय क्षमता का एक अलग उदाहरण 1996 की ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ थी।

संजय लीला भंसाली की इस फिल्म में उन्होंने एक मूक-बधिर पिता का किरदार निभाया। यहां वह अभिनेता, जो अपनी तेज आवाज और संवाद अदायगी के लिए जाना जाता था, लगभग बिना बोले दर्शकों तक भावनाएं पहुंचाता दिखाई दिया।

आंखों की बेचैनी, चेहरे का दर्द और शरीर की भाषा उनके अभिनय का माध्यम बन गई।

यह भूमिका उनके करियर की उस खूबी को सामने लाती है जिसे अक्सर उनके तेज संवादों के पीछे छिपा दिया जाता है—नाना पाटेकर एक बेहद सूक्ष्म अभिनेता भी थे।

‘नटसम्राट’: जब नाना खुद रंगमंच बन गए

मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’ में गणपतराव ‘अप्पासाहेब’ बेलवलकर का किरदार उनके करियर के सबसे चर्चित अभिनय प्रदर्शनों में गिना जाता है।

वी. वा. शिरवाडकर यानी कुसुमाग्रज के प्रसिद्ध नाटक पर आधारित इस कहानी में एक महान रंगमंच अभिनेता के जीवन के अकेलेपन, अहंकार, टूटते रिश्तों और मानसिक संघर्ष को दिखाया गया।

नाना ने इस किरदार में रंगमंच के अभिनेता की पूरी जिंदगी को उतार दिया। उनके लिए मंच केवल अभिनय की जगह नहीं था, बल्कि जीवन का हिस्सा था और ‘नटसम्राट’ में यही भाव सबसे ज्यादा दिखाई दिया।

‘अब तक छप्पन’ से ‘वेलकम’ तक, हर दुनिया में अपनी छाप

नाना पाटेकर की खासियत यह भी रही कि वे किसी एक तरह के सिनेमा में बंद होकर नहीं रहे।

‘अब तक छप्पन’ में पुलिस अधिकारी साधु आगाशे की भूमिका हो या ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी का हास्यपूर्ण गैंगस्टर, उन्होंने गंभीर और हल्के-फुल्के दोनों तरह के किरदारों को अपनी पहचान दी।

‘वेलकम’ ने नाना को नई पीढ़ी के दर्शकों तक पहुंचाया। उनकी संवाद शैली और टाइमिंग ने कॉमेडी में भी उन्हें अलग पहचान दी।

यानी एक तरफ ‘क्रांतिवीर’ और ‘परिंदा’ का तीखा अभिनेता था, तो दूसरी तरफ ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी भी उसी कलाकार की पहचान बन गया।

सिर्फ हिंदी सिनेमा नहीं, मराठी फिल्मों में भी बड़ा योगदान

नाना पाटेकर का योगदान हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं था। मराठी फिल्मों में भी उन्होंने लगातार ऐसे किरदार चुने जिनमें सामाजिक सरोकार, मनोवैज्ञानिक जटिलता और मानवीय संघर्ष दिखाई देता था।

‘सिंहासन’, ‘पाक पाक पकाक’, ‘डॉ. प्रकाश बाबा आमटे’, ‘नटसम्राट’ और ‘आपला मानूस’ जैसी फिल्मों ने उनकी बहुमुखी प्रतिभा को सामने रखा।

2014 की ‘डॉ. प्रकाश बाबा आमटे’ में उन्होंने समाजसेवी और चिकित्सक डॉ. प्रकाश आमटे का किरदार निभाया, जबकि ‘नटसम्राट’ में उन्होंने उम्रदराज रंगमंच अभिनेता के टूटते संसार को पर्दे पर उतारा।

अभिनय से आगे समाज से जुड़ा रहा नाना का जीवन

नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रही। किसानों और ग्रामीण महाराष्ट्र से जुड़े सामाजिक कार्यों में भी उनकी भूमिका चर्चा में रही।

2015 में महाराष्ट्र में सूखे और किसानों की समस्याओं के बीच उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ के जरिए सामाजिक काम शुरू किया। संस्था ने किसानों और उनके परिवारों की सहायता तथा ग्रामीण इलाकों में जल संरक्षण जैसे कामों पर ध्यान दिया।

यही पहल नाना की उस छवि को मजबूत करती है जिसमें कलाकार और सामाजिक सरोकार एक-दूसरे से अलग नहीं थे।

पद्मश्री और राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित

नाना पाटेकर को उनके अभिनय के लिए कई बड़े सम्मान मिले। ‘क्रांतिवीर’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला, जबकि ‘परिंदा’ और अन्य फिल्मों के लिए भी उनके अभिनय को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था।

चार दशक से ज्यादा लंबे करियर में उन्होंने हिंदी और मराठी सिनेमा के साथ-साथ थिएटर में भी अपनी अलग पहचान कायम की।

नाना पाटेकर की सबसे बड़ी विरासत क्या है?

नाना पाटेकर की सबसे बड़ी विरासत उनकी फिल्मों की सूची नहीं, बल्कि वह अभिनय भाषा है जिसे उन्होंने लोकप्रिय बनाया।

उन्होंने साबित किया कि नायक बनने के लिए पारंपरिक खूबसूरती जरूरी नहीं।

उन्होंने दिखाया कि संवाद की ताकत केवल आवाज में नहीं, उसके बीच के मौन में भी होती है।

उन्होंने थिएटर की ऊर्जा को कैमरे की संवेदनशीलता के साथ मिलाया।

उन्होंने किरदारों को ग्लैमर से नहीं, उनके सामाजिक और मानवीय संघर्ष से बड़ा बनाया।

और शायद यही कारण है कि नाना पाटेकर के जाने के बाद उनके प्रशंसक केवल उनकी फिल्मों को याद नहीं करेंगे, बल्कि उन किरदारों को याद करेंगे जो पर्दे से उतरकर वास्तविक जिंदगी का हिस्सा बन गए।

नाना पाटेकर का निधन भारतीय सिनेमा के एक ऐसे अध्याय का अंत है जिसमें अभिनेता स्टार से बड़ा होता था और किरदार अभिनेता से भी बड़ा।

‘नटसम्राट’ से ‘क्रांतिवीर’ तक, ‘परिंदा’ से ‘वेलकम’ तक नाना पाटेकर ने सिर्फ किरदार नहीं निभाए, उन्होंने उन्हें जीया। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान और भारतीय सिनेमा के लिए उनकी स्थायी विरासत रहेगी।

news desk

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