कोलकाता हाई कोर्ट ने बीरभूम जिले की दो महिलाओं और उनके परिवारों को बांग्लादेश भेजने के केंद्र सरकार के फैसले पर रोक लगा दी है. अदालत ने केंद्र को निर्देश दिया है कि इन छह नागरिकों को एक महीने के भीतर भारत वापस लाया जाए. साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपील को भी खारिज कर दिया. अदालत ने यह आदेश भोदू शेख की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया. याचिका में आरोप लगाया गया था कि उसकी गर्भवती बेटी सोनाली, दामाद दानेश शेख और उनके पांच साल के बेटे को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लेकर बांग्लादेश भेज दिया. इसी दौरान बीरभूम के ही निवासी आमिर ने याचिका दायर कर बताया कि उसकी बहन स्वीटी बीबी और उसके दोनों बच्चों को भी पुलिस ने अवैध बांग्लादेशी मानते हुए हिरासत में लिया और सीमा पार भेज दिया.
रोहिणी में मजदूरी कर रहे थे परिवार
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, ये दोनों परिवार दिल्ली के रोहिणी सेक्टर-26 में लंबे समय से दिहाड़ी मजदूरी करके जीवनयापन कर रहे थे. लेकिन 18 जून को पुलिस ने इन्हें अवैध बांग्लादेशी समझकर हिरासत में ले लिया और 27 जून को बांग्लादेश भेज दिया. बाद में बांग्लादेश पुलिस ने भी इन्हें अपनी कस्टडी में ले लिया. परिवार वालों का कहना है कि सोनाली गर्भवती है और अगर उसने बांग्लादेश में बच्चे को जन्म दिया तो बच्चे की नागरिकता को लेकर गंभीर समस्या खड़ी हो सकती है. बता दें कि वकीलों ने अदालत को बताया कि प्रभावित परिवारों के पास आधार कार्ड, भूमि स्वामित्व के कागजात, माता-पिता और दादा-दादी के पहचान पत्र जैसे सभी जरूरी नागरिकता दस्तावेज मौजूद थे. इसके बावजूद इन्हें जबरन देश से बाहर भेज दिया गया.
याचिका के विरोध में सरकार की दलील
सरकार ने हलफनामा दाखिल करते हुए कहा कि कोलकाता हाईकोर्ट में दाखिल की गई यह याचिका विचार योग्य ही नहीं है. वजह यह बताई गई कि इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट में ही एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल हो चुकी थी, जिसमें आरोप था कि कुछ लोगों को अवैध तरीके से हिरासत में लिया गया है. इसके अलावा, उन निर्वासनों को चुनौती देने वाली एक और याचिका भी पहले से ही दाखिल थी. केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अशोक कुमार चक्रवर्ती ने दलील दी कि इस मामले में कोलकाता हाईकोर्ट को दखल देने का अधिकार नहीं है, क्योंकि जिन व्यक्तियों को दिल्ली से बाहर भेजा गया था, उन्हें दिल्ली में ही हिरासत में लिया गया था. सरकार ने यह भी कहा कि जब दिल्ली हाईकोर्ट में इस मुद्दे पर याचिकाएं पहले से लंबित हैं, तो कोलकाता हाईकोर्ट में दाखिल याचिका का कोई औचित्य नहीं बनता. इसलिए दोनों जगह दाखिल याचिकाओं के तथ्यों को सामने रखते हुए इसका विरोध किया गया.