सियासी

कर्नाटक MLC चुनाव: डीके शिवकुमार की ‘चाणक्य नीति’ से भाजपा-JDS पस्त, क्रॉस वोटिंग से बीजेपी को झटका!

Highlights

  • 7 में से 5 सीटों पर कांग्रेस का कब्ज़ा, विपक्षी खेमे में भारी क्रॉस वोटिंग
  • डीके शिवकुमार के सीएम बनने के बाद पहला बड़ा मुकाबला, कांग्रेस को मिले उम्मीद से 11 वोट ज्यादा
  • JDS उम्मीदवार गोविंदराजू की करारी हार, वोक्कालिगा बेल्ट में शिवकुमार का दबदबा साबित

बेंगलुरु। कर्नाटक की सियासत से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार (DK Shivakumar) के नेतृत्व में नई कांग्रेस सरकार के गठन के बाद हुए पहले ही बड़े चुनावी इम्तिहान में कांग्रेस ने विपक्ष को चारों खाने चित कर दिया है।

विधानसभा सदस्यों (MLAs) द्वारा चुने जाने वाले विधान परिषद (MLC) की 7 सीटों के चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने 5 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की है। वहीं, भाजपा-जेडीएस (BJP-JDS) गठबंधन को केवल 2 सीटों से संतोष करना पड़ा है।

इस चुनाव ने कर्नाटक की राजनीति में एक नया मोड़ ला दिया है, क्योंकि नतीजों से साफ है कि भाजपा और जेडीएस के कुनबे में बड़ी सेंधमारी हुई है।

‘ऑपरेशन हस्त’: आंकड़ों के खेल में उलझा विपक्ष

इस चुनाव में सबसे बड़ा उलटफेर आंकड़ों ने दिखाया है। कांग्रेस के पास विधानसभा में जितने वोट होने की उम्मीद थी, पार्टी को उससे कहीं ज्यादा समर्थन मिला।

  • कांग्रेस की ताकत: विधानसभा में गणित के हिसाब से कांग्रेस को 140 वोट मिलने की उम्मीद थी।
  • मिले कुल वोट: काउंटिंग के बाद कांग्रेस के खाते में 151 वोट आए।
  • क्रॉस वोटिंग का झटका: विपक्ष के 11 विधायकों ने पाला बदलकर कांग्रेस उम्मीदवारों के पक्ष में सीक्रेट वोटिंग की।

इस क्रॉस वोटिंग के कारण जेडीएस (JDS) के इकलौते उम्मीदवार गोविंदराजू को करारी हार का सामना करना पड़ा। वहीं कांग्रेस के सभी 5 उम्मीदवार थिप्पन्नप्पा कामकनूर, पी.वी. मोहन, बी.के. हरिप्रसाद, शिवन्ना बी.एस. और विनय कार्तिक प्रकाश आसानी से जीत गए। भाजपा की तरफ से केवल लिंगराज पाटिल और रघु आर ही अपनी सीट बचा पाए।

डीके शिवकुमार का बढ़ता कद और JDS का संकट

इस चुनावी नतीजे के दो सबसे बड़े राजनीतिक मायने हैं, जो आने वाले दिनों में कर्नाटक की राजनीति तय करेंगे:

1. ‘ट्रबलशूटर’ शिवकुमार की पहली अग्निपरीक्षा सफल

सिद्धारमैया के बाद मुख्यमंत्री की कमान संभालने वाले डीके शिवकुमार के लिए यह प्रतिष्ठा की लड़ाई थी। उन्होंने न सिर्फ अपनी पार्टी के विधायकों को एकजुट रखा, बल्कि विपक्ष के खेमे में ऐसी सेंध लगाई कि भाजपा-जेडीएस गठबंधन की रणनीति पूरी तरह ध्वस्त हो गई। इसे शिवकुमार की ‘चाणक्य नीति’ के रूप में देखा जा रहा है।

2. वोक्कालिगा राजनीति पर जेडीएस की ढीली होती पकड़

जेडीएस (JDS) पारंपरिक रूप से वोक्कालिगा समुदाय की लीडर मानी जाती रही है। लेकिन डीके शिवकुमार भी इसी प्रभावशाली समुदाय से आते हैं। जेडीएस उम्मीदवार की इस हार से साफ है कि शिवकुमार अब कर्नाटक में वोक्कालिगा समुदाय के सबसे बड़े चेहरे के रूप में स्थापित हो रहे हैं, जो जेडीएस के भविष्य के लिए एक बड़ा रेड सिग्नल है।

राजनीतिक गलियारों से: इस करारी हार के बाद भाजपा और जेडीएस के भीतर असंतोष और गुटबाजी खुलकर सामने आने की आशंका बढ़ गई है। जहां कांग्रेस इसे सरकार पर जनता और विधायकों के भरोसे के रूप में देख रही है, वहीं भाजपा आलाकमान के लिए अपने विधायकों की ‘भीतरघात’ बड़ी सिरदर्दी बन गई है।

news desk

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