राजनीति में यूं तो आरोप प्रत्यारोप को आम चलन माना जाता है. लेकिन सामने चुनाव हो तो सरकार पर लगने वाला हर आरोप नेताओं की धड़कन बढ़ाने वाला होता है. ऐसा ही इन दिनों बिहार में देखा जा रहा है. टिकट बंटवारे को लेकर तो दोनों दलों के बीच रार ठनी ही हुई थी अब प्रशांत कुमार के ताबड़तोड़ आरोपों के हमले का असर भी बीजेपी और जेडीयू पर दिखने लगा है.
सबसे ज्यादा सवाल नीतीश कुमार पर उठ रहे हैं. नीतीश कुमार की छवि भ्रष्टाचार मुक्त नेता की रही है. उनकी पार्टी जेडीयू बिहार में सुशासन सरकार देने का दावा करती हैं. ऐसे में बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी पर लगे गंभीर आरोपों से जेडीयू असहज दिख रही है. सूत्रों की माने तो नीतीश कुमार चाहते हैं कि सम्राट चौधरी या तो अपना पक्ष साफ करें या फिर इस्तीफा दें. क्योंकि बिहार में माना जा रहा है कि नवंबर या दिसंबर में चुनाव हो सकते हैं. ऐसे में इतने आरोपों के साथ चुनाव में जाना अच्छा संकेत नहीं होगा.
PK ने यह भी कहा कि अगर नीतीश वाकई संतुलन चाहते हैं, तो उन्हें ऐसे चेहरों से दूरी बनानी चाहिए. जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा था कि ‘गंभीर आरोपों पर बिंदूवार जवाब देना चाहिए’. अब सवाल ये है कि क्या सम्राट चौधरी के मुद्दे पर दवाब बना कर जेडीयू सीटों के बंटवारे में अपनी चलानी चाहती है या बीजेपी को प्रेशर में लेकर बिहार की बागडोर अपने ही हाथों में रखना चाहती है. हाल ही में नीतीश कुमार और गृहमंत्री अमित शाह के बीच पटना में बंद कमरे में बातचीत हुई थी. लेकिन सीटों की घोषणा नहीं होने से ये माना जा रहा है कि बात अभी बनी नहीं है.
आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी का कहना है कि ‘बीजेपी और जेडीयू के बीच नीति बनाने को लेकर अब खुलकर मतभेद सामने आ रहे हैं. जेडीयू खुद को गठबंधन में “बड़ा खिलाड़ी” साबित करना चाहती है, जबकि बीजेपी भी पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रही’.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि JDU का यह आक्रामक रुख एनडीए के अंदर शक्ति संतुलन बदलने का संकेत है. हालांकि दोनों पार्टियां बाहर से साथ दिखने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन अंदरूनी हालात कुछ और ही इशारा कर रहे हैं. जेडीयू की बढ़ती शर्तें, बीजेपी में अंदरूनी खींचतान और सम्राट की बयानबाज़ी यह बता रहे हैं कि इस बार सीटों की लड़ाई आसान नहीं होने वाली और सबकी नजर बिहार के सीएम नीतीश कुमार पर टिकी हुई है.