ईरान में सत्ता परिवर्तन का भारत पर असर
ईरान के बड़े शहरों तेहरान, मशहद, इस्फहान, शिराज और कोम की गलियों में प्रदर्शनकारियों के नारों गूंज रहे हैं। सुरक्षाबलों के साथ झड़पों में कुछ लोगों की जानें भी गईं हैं, कई घायल हैं। सर्वोच्च शासक अयातुल्ला अली खामेनेई की जलती तस्वीरों से सिगरेट सुलगाती महिलाओं की तस्वीरें वायरल हैं। हालिया दिनों में हुए या हो रहे इन घटनाक्रमों से ये तो साफ है कि ईरान एक राजनीतिक संकट की तरफ बढ़ चुका है।
अयातुल्ला अली खामेनेई ने बयान दिया है कि इन प्रदर्शनों के पीछे मोसाद, सीआईए के एजेंट्स हैं और ईरान इनके आगे नहीं झुकेगा। वहीं कभी ईरान के शासक रहे शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बड़े बेटे क्राउन प्रिंस रजा पहलवी ने लोगों से अपील की है कि आगे बढ़ कर सत्ता अपने हाथ में लें। ये जाहिर दिख रहा है कि अगर ईरान में सत्ता परिवर्तन हुआ तो मुल्क की कमान रजा पहलवी के हाथ में ही आएगी। इस सत्ता परिवर्तन का वैश्विक रणनीति पर भी बड़ा प्रभाव पड़ेगा। लेकिन असली सवाल ये है कि भारत पर क्या रणनीतिक असर होगा?
1947 से भारत और ईरान के रिश्ते खट्ठे मीठे दौर से गुजरते हुए आगे बढ़े। 15 मार्च 1950 को दोनों देशों ने औपचारिक रूप से अपने राजनयिक संबंध स्थापित किए। लेकिन वो शीत युद्ध का दौर था लिहाजा दोनों के रिश्तों पर इसका असर साफ दिख रहा था। उस वक्त शाह मोहम्म्द रजा पहलवी का ईरान अमेरिका के करीब था और पाकिस्तान के भी। इतना करीब कि 1971 के भारत पाकिस्तान जंग में ईरान ने भारत के खिलाफ पाकिस्तान को सैन्य सहायता, ईधन और लड़ाकू विमान भी मुहैया कराया था। अमेरिकी परस्त नीति से ही ईरान भारत के साथ रणनीतिक रिश्ते को निभाता रहा।
1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान को बदल दिया साथ ही ईरान की विदेश नीति को भी। अमेरिका से दूर होते ईरान के साथ भारत के संबंधों में कुछ गर्माहट महसूस की जाने लगी। लेकिन 1980-88 के ईरान-इराक जंग में भारत ने इराक का साथ दिया। इससे दूरी बढ़ी लेकिन ज्यादा नहीं क्योंकि 1990 के बाद पश्चिम एशिया के बदले हालात ने दोनों देशों को करीब लाने में मदद की। अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत का भारत और ईरान दोनों ने विरोध किया। बदलते दौर में पाकिस्तान से दोनों देशों की दूरी और बढ़ी। सन 2000 के बाद जब ईरान रूस और चीन के साथ मिल कर एक नई धुरी बना रहा था तब भारत के साथ उसने नई रणनीतिक साझेदारियां की। जिसमें चाबहार समझौता मुख्य था। जिसे लेकर चीन की नाराजगी भी सामने आई
थी हालांकि डाबहार भारत की क्षेत्रीय रणनीतिक जरूरतों को पूरा करने में अहम साबित होने जा रहा था। इसी दौर में अमेरिकी दवाब को नजरअंदाज कर भारत और ईरान ने डॉलर के बजाए अपनी अपनी करेंसी में बिजनेस करना भी शुरू किया। लेकिन 2014 के बाद फिर भारत और ईरान की दूरी बढ़ी। अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भारत ने ईरान से गैस और ईधन को खरीदना कम दिया। जिस चाबहार को भारत की बड़ी रणनीतिक सफलता माना जा रहा था वो समझौता सुस्त पड़ने लगा।
अब बड़ा सवाल ये है कि अगर ईरान में सत्ता परिवर्तन हुआ तो ईरान एक बार फिर अमेरिका का पिछल्लगू बन जाएगा। उसकी नीतियां अमेरिकी नजरिए से बनेगी। फिर भारत को क्या मिलेगा? क्योंकि आज के दौर में भारत और अमेरिका के संबंध भी हिचकोले खा रहे हैं। ट्रंप की नीतियां भारत के खिलाफ हैं। तो क्या नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका के बाद अब एक मुल्क भारत का दोस्त नहीं रह जाएगा? फिलहाल भारत इन घटनाक्रमों पर अपनी नजर बनाए हुए है।
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