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सीजफायर के बावजूद क्यों नहीं थम रही इजरायल-लेबनान जंग? जानिए अब तक कितनी हुई मौतें

नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में इजरायल और लेबनान के बीच जारी संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है। दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम (सीजफायर) की घोषणा होने के बावजूद जमीनी स्तर पर हमले जारी हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर सीजफायर के बाद भी युद्ध क्यों नहीं रुक रहा और इस संघर्ष में अब तक कितना नुकसान हो चुका है।

कैसे शुरू हुआ मौजूदा संघर्ष?

इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच तनाव कोई नया नहीं है, लेकिन मौजूदा युद्ध की शुरुआत मार्च 2026 में हुई। गाजा में जारी संघर्ष के बीच हिजबुल्लाह ने उत्तरी इजरायल पर रॉकेट हमले किए, जिसके जवाब में इजरायल ने लेबनान में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू कर दिया। बाद में यह टकराव हवाई हमलों से आगे बढ़कर जमीनी युद्ध में बदल गया।

युद्ध में अब तक कितना नुकसान?

इस संघर्ष ने दोनों देशों में भारी तबाही मचाई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक लेबनान में अब तक 3,500 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि हजारों लोग घायल हुए हैं। बड़ी संख्या में महिलाएं, बच्चे और आम नागरिक भी इसकी चपेट में आए हैं।

वहीं, युद्ध की वजह से करीब 12 लाख लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है। दूसरी तरफ इजरायल को भी सैन्य और नागरिक नुकसान झेलना पड़ा है। कई सैनिकों की मौत हुई है और सैकड़ों लोग घायल हुए हैं।

सीजफायर के बाद भी क्यों जारी है जंग?

अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान की सरकार के बीच युद्धविराम समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत दक्षिणी लेबनान में सरकारी सेना की तैनाती और हिजबुल्लाह की गतिविधियों पर नियंत्रण की बात कही गई थी।

हालांकि, समस्या यह है कि इस समझौते में हिजबुल्लाह सीधे तौर पर शामिल नहीं था। संगठन ने साफ कर दिया कि जब तक इजरायली सेना पूरी तरह पीछे नहीं हटती, तब तक वह अपने हथियार नहीं डालेगा। यही वजह है कि समझौते के बावजूद दोनों ओर से हमले जारी हैं।

हिजबुल्लाह और इजरायल की ताकत

इजरायल के पास आधुनिक सैन्य तकनीक, मजबूत खुफिया नेटवर्क और उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम हैं। वहीं हिजबुल्लाह के पास बड़ी संख्या में रॉकेट और मिसाइलें मौजूद हैं। इसके अलावा दक्षिणी लेबनान में सुरंगों का नेटवर्क उसे गुरिल्ला युद्ध में बढ़त देता है।

ईरान की भूमिका क्यों अहम है?

विश्लेषकों का मानना है कि यह संघर्ष केवल इजरायल और हिजबुल्लाह तक सीमित नहीं है। हिजबुल्लाह को ईरान का समर्थन हासिल है, जिससे यह टकराव क्षेत्रीय संकट का रूप ले चुका है। यही कारण है कि मिडिल ईस्ट के कई अन्य देशों पर भी इस युद्ध का असर दिखाई दे रहा है।

आगे क्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक हिजबुल्लाह, लेबनान सरकार और इजरायल के बीच किसी व्यापक समझौते पर सहमति नहीं बनती, तब तक स्थायी शांति की उम्मीद करना मुश्किल होगा। फिलहाल सीजफायर कागजों तक सीमित नजर आ रहा है, जबकि जमीन पर संघर्ष जारी है।

 

vineet verma

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