नई दिल्ली: आज भारत में शादी की कानूनी उम्र लड़कों के लिए 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह उम्र तय होने के पीछे करीब एक सदी पुराना इतिहास है? एक समय भारत में बाल विवाह सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा था और कम उम्र में बच्चों की शादी कर दी जाती थी। इसके खिलाफ सामाजिक सुधार की आवाजें उठीं और इसी दिशा में 1929 में एक महत्वपूर्ण कानून सामने आया, जिसे शारदा ऐक्ट के नाम से जाना गया।
यह कानून केवल विवाह की उम्र तय करने तक सीमित नहीं था, बल्कि बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथा पर रोक लगाने की दिशा में एक अहम कदम था। समय के साथ इसमें बदलाव किए गए और बाद में इसे नए कानून ने प्रतिस्थापित कर दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि शारदा ऐक्ट क्या था, इसे किसने आगे बढ़ाया और आज बाल विवाह को लेकर कानून क्या कहता है?
क्या था शारदा ऐक्ट?
शारदा ऐक्ट का आधिकारिक नाम बाल विवाह रोकथाम अधिनियम, 1929 (Child Marriage Restraint Act, 1929) था। यह ब्रिटिश भारत में बनाया गया कानून था, जिसका उद्देश्य बाल विवाह की प्रथा पर रोक लगाना था।
इस कानून के तहत लड़कों और लड़कियों के विवाह के लिए न्यूनतम उम्र निर्धारित की गई थी। तय उम्र से कम में विवाह करने या करवाने वालों के लिए जुर्माने और जेल का प्रावधान भी किया गया था।
बाल विवाह रोकने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
19वीं और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में बाल विवाह को एक गंभीर सामाजिक समस्या माना जाता था। कम उम्र में शादी और गर्भधारण से लड़कियों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता था। उस दौर में मातृ और शिशु मृत्यु की समस्या भी बड़ी थी।
बाल विवाह का असर बच्चों की शिक्षा पर भी पड़ता था। खासतौर पर लड़कियों की पढ़ाई कम उम्र में ही छूट जाती थी, जिससे उनके आगे बढ़ने के अवसर सीमित हो जाते थे।
इसके अलावा, कम उम्र में विवाह होने के कारण कई लड़कियां बहुत छोटी उम्र में विधवा हो जाती थीं और उन्हें लंबे समय तक सामाजिक भेदभाव और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था। इन परिस्थितियों ने बाल विवाह के खिलाफ कानून बनाने की जरूरत को मजबूत किया।
हरबिलास शारदा के प्रयास से आया कानून
इस कानून को आगे बढ़ाने में हरबिलास शारदा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वह अजमेर से जुड़े शिक्षाविद, जज और राजनेता थे। उन्होंने 1927 में केंद्रीय विधानसभा में बाल विवाह के खिलाफ एक विधेयक पेश किया था।
सामाजिक सुधारकों के समर्थन और विरोध के बीच यह विधेयक आगे बढ़ा और 1929 में कानून बना। हरबिलास शारदा के नाम की वजह से यह कानून लोकप्रिय रूप से ‘शारदा ऐक्ट’ कहलाया।
इस प्रयास को डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी और सरोजिनी नायडू जैसी समाज सुधारकों का भी समर्थन मिला था।
शुरुआत में लड़कियों के लिए 14 और लड़कों के लिए 18 साल थी उम्र
शारदा ऐक्ट की शुरुआत के समय विवाह की न्यूनतम उम्र लड़कियों के लिए 14 साल और लड़कों के लिए 18 साल तय की गई थी।
बाद में समय के साथ कानून में संशोधन किए गए। 1978 में संशोधन के बाद लड़कियों के लिए न्यूनतम विवाह उम्र 18 साल और लड़कों के लिए 21 साल कर दी गई।
आज भी भारत में सामान्य कानूनी व्यवस्था के तहत विवाह की न्यूनतम उम्र महिलाओं के लिए 18 साल और पुरुषों के लिए 21 साल है।
2006 में आया बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम
शारदा ऐक्ट के बाद बाल विवाह रोकने के लिए कानून को और मजबूत किया गया। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 ने पुराने बाल विवाह रोकथाम अधिनियम, 1929 की जगह ली।
इस कानून का उद्देश्य बाल विवाह को रोकना, उससे जुड़े लोगों पर कानूनी कार्रवाई करना और नाबालिगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
बाल विवाह कराने पर क्या सजा हो सकती है?
कानून में बाल विवाह में शामिल अलग-अलग लोगों के लिए दंड का प्रावधान है।
वयस्क पुरुष द्वारा बच्चे से विवाह: धारा 9 के तहत 18 साल से अधिक उम्र का कोई पुरुष यदि बच्चे से विवाह करता है, तो उसे 2 साल तक की कठोर कैद, 1 लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
विवाह कराने या उसमें सहयोग करने वाले: धारा 10 के तहत बाल विवाह कराने, आयोजित करने, संचालित करने या उसमें सहयोग करने वाले व्यक्ति को भी 2 साल तक की कठोर कैद और 1 लाख रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। इसमें विवाह कराने वाले पुरोहित-पंडित या आयोजन से जुड़े अन्य लोग भी परिस्थितियों के अनुसार शामिल हो सकते हैं।
माता-पिता और अभिभावक: धारा 11 के तहत माता-पिता, अभिभावक या बच्चे की देखभाल करने वाला व्यक्ति यदि बाल विवाह को बढ़ावा देता है, अनुमति देता है या उसे रोकने में विफल रहता है, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई का प्रावधान है। इसमें 2 साल तक की कठोर कैद और 1 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
बाल विवाह से जुड़े अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम के तहत अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती हैं। इसका मतलब है कि पुलिस संबंधित मामले में बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है और जमानत स्वतः अधिकार के रूप में नहीं मिलती।
क्या बाल विवाह होते ही पूरी तरह अमान्य हो जाता है?
कानून के तहत बाल विवाह हर स्थिति में शुरुआत से ही स्वतः शून्य नहीं माना जाता। कई मामलों में यह उस व्यक्ति के विकल्प पर निर्भर करता है जो विवाह के समय बच्चा था। वह जिला अदालत में याचिका देकर विवाह को अमान्य घोषित कराने की मांग कर सकता है।
दिए गए प्रावधान के मुताबिक, विवाह के समय नाबालिग रहे पक्ष को निर्धारित समय सीमा के भीतर यह याचिका दायर करनी होती है। लड़की के लिए यह अवधि 18 साल की उम्र पूरी करने के बाद 2 साल तक और लड़के के लिए 21 साल की उम्र पूरी करने के बाद 2 साल तक बताई गई है।
आज के कानून को समझने के लिए शारदा ऐक्ट क्यों महत्वपूर्ण है?
1929 का शारदा ऐक्ट उस दौर में बाल विवाह के खिलाफ कानूनी हस्तक्षेप की एक महत्वपूर्ण शुरुआत था। इसके बाद कानून में कई बदलाव हुए और अंततः 2006 में मौजूदा बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम लागू हुआ। यानी आज बाल विवाह को रोकने के लिए मौजूद कानूनी व्यवस्था की ऐतिहासिक कड़ी शारदा ऐक्ट से जुड़ी हुई है।
डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध कानूनी और ऐतिहासिक जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। विवाह की कानूनी उम्र, बाल विवाह की वैधता, सजा और अदालत में याचिका से जुड़े प्रावधान मामले की परिस्थितियों के अनुसार अलग तरह से लागू हो सकते हैं। किसी विशेष मामले में कानूनी सलाह के लिए योग्य वकील या संबंधित कानूनी प्राधिकरण से संपर्क करें।