नई दिल्ली: सड़क पार करते समय वाहन की चपेट में आने से होने वाले हादसों में अक्सर सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि गलती पैदल यात्री की थी या वाहन चालक की। लेकिन हर मामले में पहले से यह तय नहीं किया जा सकता कि जिम्मेदार कौन है। हादसा किस परिस्थिति में हुआ, पैदल यात्री सड़क कहां से पार कर रहा था, वाहन की रफ्तार कितनी थी और चालक ने कितनी सावधानी बरती, जैसे कई तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय की जाती है।
भारत में सड़क पर पैदल यात्रियों की सुरक्षा को लेकर नियम मौजूद हैं। हादसे के मामलों में चालक के साथ पैदल यात्री की भूमिका और परिस्थितियों को भी जांच का हिस्सा बनाया जाता है।
पैदल यात्री को लेकर क्या कहते हैं नियम?
2017 में लागू मोटर व्हीकल्स (ड्राइविंग) रेगुलेशन्स के मुताबिक वाहन चालक और उसमें सवार लोगों को पैदल यात्रियों के साथ-साथ साइकिल सवारों, बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांग लोगों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
जहां पैदल यात्री सड़क पार कर रहे हों और वहां ट्रैफिक सिग्नल न हो, वहां वाहन चालक को पहुंचते समय रफ्तार कम करनी चाहिए। जरूरत पड़ने पर वाहन रोककर पैदल यात्री को पहले सड़क पार करने का अवसर देना चाहिए।
अगर सड़क के किनारे पैदल यात्रियों के लिए फुटपाथ या साइकिल सवारों के लिए अलग रास्ता बना हुआ है, तो सामान्य स्थिति में उस हिस्से पर वाहन चलाने की अनुमति नहीं होती। पुलिस की अनुमति या ट्रैफिक सिग्नल की व्यवस्था के मुताबिक कुछ परिस्थितियों में अलग नियम लागू हो सकते हैं।
जेब्रा क्रॉसिंग पर ड्राइवर की जिम्मेदारी क्या है?
जेब्रा क्रॉसिंग पैदल यात्रियों को सड़क पार करने के लिए निर्धारित जगह होती है। ऐसे स्थानों के पास वाहन चालक को विशेष सावधानी बरतनी होती है।
ट्रैफिक सिग्नल पर वाहन को पेडेस्ट्रियन क्रॉसिंग से पहले रोकना होता है। अगर हरी बत्ती होने के बावजूद कोई पैदल यात्री पहले से चौराहे या संबंधित क्रॉसिंग पर मौजूद है, तो चालक को उसे रास्ता देना होता है।
हादसे की जांच में यह भी देखा जाता है कि पैदल यात्री उस समय कहां मौजूद था और वाहन किस तरह चलाया जा रहा था।
गलत जगह से सड़क पार करने पर भी मामला इतना सीधा नहीं
अगर कोई व्यक्ति जेब्रा क्रॉसिंग या निर्धारित जगह के बजाय किसी दूसरी जगह से सड़क पार कर रहा था, तो भी सिर्फ इसी आधार पर हादसे की पूरी जिम्मेदारी तय नहीं हो जाती।
जांच में यह देखा जाता है कि पैदल यात्री कहां से सड़क पार कर रहा था, वहां कोई निर्धारित क्रॉसिंग या सिग्नल था या नहीं, वाहन कितनी रफ्तार से आ रहा था और चालक के पास वाहन को नियंत्रित करने या हादसा रोकने का पर्याप्त समय था या नहीं।
अगर हादसे में पैदल यात्री की भी लापरवाही सामने आती है, तो अदालत पूरे घटनाक्रम और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय कर सकती है। इसलिए हर मामले में केवल ड्राइवर या केवल पैदल यात्री को पहले से दोषी मान लेना सही नहीं है।
ड्राइवर की लापरवाही पर क्या हो सकता है?
अगर जांच में सामने आता है कि चालक ने लापरवाही या खतरनाक तरीके से वाहन चलाया और इससे किसी की जान को खतरा पैदा हुआ या किसी को चोट पहुंची, तो भारतीय न्याय संहिता की धारा 281 के तहत कार्रवाई हो सकती है।
वहीं, अगर चालक की लापरवाही से किसी व्यक्ति की मौत होती है और मामला गैर-इरादतन हत्या की श्रेणी में नहीं आता, तो भारतीय न्याय संहिता की धारा 106(1) के तहत कार्रवाई का प्रावधान है। इसमें पांच साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।
हादसे के बाद ड्राइवर की क्या जिम्मेदारी है?
मोटर वाहन अधिनियम की धारा 134 के तहत हादसे में किसी व्यक्ति को चोट लगने या संपत्ति को नुकसान होने की स्थिति में चालक या वाहन के प्रभारी व्यक्ति को घायल को जल्द से जल्द चिकित्सा सहायता दिलाने के लिए उचित कदम उठाने होते हैं।
जरूरत पड़ने पर घायल को नजदीकी डॉक्टर या अस्पताल पहुंचाना भी जिम्मेदारी का हिस्सा है। इसके अलावा पुलिस की ओर से मांगी गई जानकारी उपलब्ध करानी होती है और हादसे की सूचना जल्द से जल्द, अधिकतम 24 घंटे के भीतर, नजदीकी पुलिस थाने को देनी होती है।
हादसे में पीड़ित परिवार को कितना मुआवजा मिल सकता है?
मोटर वाहन अधिनियम में सड़क हादसों के पीड़ितों के लिए मुआवजे का प्रावधान भी है। धारा 164 के तहत वाहन के इस्तेमाल से हुए हादसे में मौत होने पर कानूनी वारिसों को पांच लाख रुपये और गंभीर चोट के मामले में ढाई लाख रुपये मुआवजे का प्रावधान है।
इस प्रावधान के तहत दावा करने वाले को वाहन मालिक या वाहन से जुड़ी गलती साबित करना जरूरी नहीं होता। इसके अलावा मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण यानी एमएसीटी के जरिए भी सड़क हादसे में मौत या चोट से जुड़े मुआवजे का दावा किया जा सकता है। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 165 ऐसे न्यायाधिकरणों के गठन का प्रावधान करती है।
तो आखिर जिम्मेदार कौन होता है?
सड़क पार करते समय हादसा होने पर यह तय नहीं है कि हर बार गलती पैदल यात्री की होगी या ड्राइवर की। कानून हादसे की पूरी परिस्थितियों और दोनों पक्षों के व्यवहार को ध्यान में रखता है।
पैदल यात्री की जिम्मेदारी है कि वह सुरक्षित तरीके से सड़क पार करे, वहीं वाहन चालक पर सड़क पर मौजूद लोगों की सुरक्षा को लेकर विशेष सावधानी बरतने की जिम्मेदारी होती है। किसी हादसे में अंतिम जिम्मेदारी घटनास्थल के साक्ष्यों, ट्रैफिक नियमों और पूरे घटनाक्रम की जांच के आधार पर तय होती है।