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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला! अब देश में ‘पैदल चलना’ नागरिकों का मौलिक अधिकार, लापरवाही पर नगर निगमों पर होगी सख्त कार्रवाई

सड़कों पर गाड़ियों की रफ्तार और बढ़ते ट्रैफिक के बीच सुप्रीम कोर्ट ने देश के पैदल यात्रियों के हक में एक बेहद ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सड़कों के किनारे बने फुटपाथों पर सुरक्षित चलना कोई सरकारी खैरात या सुविधा नहीं, बल्कि नागरिकों का ‘मौलिक अधिकार’ है। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि सड़कों पर दौड़ने वाली चमचमाती गाड़ियों की तुलना में फुटपाथ पर चलने वाले राहगीरों का हक कहीं ज्यादा बड़ा और प्राथमिक है।

संविधान के तहत मिला कानूनी कवच


जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस चांदुरकर की पीठ ने इस अधिकार को सीधे देश के संविधान से जोड़ते हुए कहा कि ‘राइट टू वॉक’ “Right to Walk” संविधान के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों के अंतर्गत आता है:

अनुच्छेद 19(1)(d): देश के भीतर कहीं भी बिना किसी डर और बाधा के घूमने की आजादी।

अनुच्छेद 21: सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन जीने का अधिकार (Right to Life)।

नगर पालिकाओं और स्थानीय प्रशासन की तय हुई जवाबदेही

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगर पालिकाओं और पंचायतों को उनके कानूनी कर्तव्य की याद दिलाई है। कोर्ट ने कहा कि: अगर कहीं कोई सड़क मौजूद है, तो वहां पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ होना ही चाहिए। फुटपाथ का सीमांकन करना, उसे अतिक्रमण मुक्त रखना और उसका सही रखरखाव करना स्थानीय प्रशासन की अनिवार्य कानूनी जिम्मेदारी है।

हादसे या लापरवाही पर सीधे प्रशासन से मिलेगा मुआवजा


इस फैसले की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी बात यह है कि कोर्ट ने ‘मुआवजे का अधिकार’ तय कर दिया है। अब तक सड़कों या फुटपाथों की खराबी से होने वाले हादसों में सिर्फ गाड़ियों के खिलाफ मोटर व्हीकल एक्ट “MV Act” के तहत कार्रवाई होती थी।

लेकिन अब, अगर प्रशासन फुटपाथ मुहैया नहीं कराता या उसकी लापरवाही जैसे खुला मैनहोल, अतिक्रमण या टूटा फुटपाथ के कारण किसी नागरिक के ‘चलने के अधिकार’ का उल्लंघन होता है या कोई दुर्घटना होती है, तो पीड़ित व्यक्ति सीधे नगर निगम या संबंधित प्रशासन के खिलाफ कानूनी कदम उठा सकता है और भारी मुआवजे की मांग कर सकता है।

एक दर्दनाक हादसे ने हिलाकर रख दिया


अदालत के सामने यह मामला एक बेहद दुखद हादसे के बाद आया। एक 5 साल का मासूम बच्चा अपने पिता के साथ स्कूल जा रहा था, लेकिन सड़क पर फुटपाथ न होने के कारण उसे मजबूरन मुख्य सड़क पर चलना पड़ा, जहां एक टैंकर ने उसे कुचल दिया। इस दर्दनाक हादसे पर गहरी चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 11.44 लाख रुपए किया, बल्कि प्रशासन की इस गंभीर लापरवाही को हमेशा के लिए खत्म करने का फैसला भी किया।

जल्द बन सकता है नया कानून


पैदल यात्रियों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट इस कदर गंभीर है कि उसने इस फैसले की कॉपी सीधे देश के लॉ कमीशन और संबंधित मंत्रालयों को भेजने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि देश में राहगीरों के अधिकारों और सुरक्षा को जमीन पर लागू करने के लिए एक नया और मजबूत केंद्रीय कानून तैयार किया जाए।

news desk

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