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‘ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है’—ट्रंप की ज़िद के खिलाफ फूटा जनसैलाब, आर्कटिक की बर्फ में भी नहीं ठंडा पड़ा गुस्सा

news desk
Last updated: January 18, 2026 11:57 am
news desk
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ग्रीनलैंड ट्रंप विरोध प्रदर्शन
ग्रीनलैंड ट्रंप विरोध प्रदर्शन
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नुक, ग्रीनलैंड : बर्फ से ढकी सड़कों और कड़ाके की ठंड के बीच शनिवार को नुुक में ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जो ग्रीनलैंड के इतिहास में पहले कभी नहीं दिखा। हजारों लोग सड़कों पर उतर आए और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बढ़ते दबाव के खिलाफ खुलकर आवाज़ उठाई, जिसमें वे ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की बात दोहरा रहे हैं। इसे अब तक का सबसे बड़ा समन्वित विरोध प्रदर्शन माना जा रहा है। हाथों में राष्ट्रीय ध्वज, “ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है” लिखे पोस्टर और ग्रीनलैंडिक भाषा में नारे—पूरे शहर में एक ही संदेश गूंज रहा था।

जब सड़कों पर उतरा पूरा नुक

पुलिस और आयोजकों के मुताबिक, नुुक की कुल आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा इस मार्च में शामिल हुआ, जो 20 हजार से भी कम आबादी वाले शहर के लिए ऐतिहासिक माना जा रहा है। लोग शहर के केंद्र से अमेरिकी वाणिज्य दूतावास तक मार्च करते नजर आए। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन भी इस विरोध में शामिल हुए और एक मौके पर बर्फीली ढलान पर चढ़कर झंडा फहराया, जिस पर भीड़ ने तालियों के साथ उनका समर्थन जताया। इसी तरह के प्रदर्शन ग्रीनलैंड के अन्य शहरों में भी हुए, जबकि कोपेनहेगन और डेनमार्क के दूसरे शहरों में भी एकजुटता रैलियां निकाली गईं।

“हम बिकाऊ नहीं हैं” — लोगों का साफ संदेश

प्रदर्शन में शामिल 43 वर्षीय इलेक्ट्रीशियन इसाक बर्थेलसेन ने कहा, “हमने पिछले साल भी कहा था और अब भी वही कह रहे हैं—हम बिकाऊ नहीं हैं।” कई प्रदर्शनकारियों का कहना था कि ट्रंप के बार-बार दिए गए बयान, जिनमें अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड को “एक तरीके से या दूसरे तरीके से” लेने की बात कही गई, अब सहनशक्ति की सीमा पार कर चुके हैं। सेवानिवृत्त बढ़ई क्रिस्टियन जोहानसेन, जो प्रदर्शन के आयोजकों में शामिल थे, बोले, “हर नया बयान हालात को और बिगाड़ देता है।” नुुक पुलिस के अधिकारी टॉम ओलसेन ने कहा कि यह प्रदर्शन दिखाता है कि यूरोप इस मुद्दे पर एकजुट है और बिना लड़े पीछे हटने वाला नहीं है।

टैरिफ, नाटो और बढ़ता वैश्विक तनाव

इसी बीच, विरोध प्रदर्शन के खत्म होते ही खबर आई कि ट्रंप ने डेनमार्क और कुछ अन्य यूरोपीय देशों से आयातित सामानों पर फरवरी से 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है। यह सुनकर 21 वर्षीय प्रदर्शनकारी मलिक डॉलेरुप-शेइबेल ने कहा, “मुझे लगा था कि दिन इससे ज्यादा खराब नहीं हो सकता, लेकिन हो गया।” हालांकि आर्थिक असर की चिंता के बावजूद, कई लोगों ने कहा कि ग्रीनलैंड की स्वायत्तता सबसे ऊपर है। पूर्व सांसद टिली मार्टिनुसेन ने इसे “आजादी की लड़ाई” बताया।

ट्रंप का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अमेरिका को ग्रीनलैंड की जरूरत है, खासकर आर्कटिक में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा को देखते हुए। व्हाइट हाउस ने भी इस रुख को दोहराया है। इसी दबाव के बीच आर्कटिक में सैन्य गतिविधियां तेज़ हो गई हैं। फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन और नॉर्वे जैसे नाटो देशों ने डेनमार्क के नेतृत्व में ग्रीनलैंड में सैनिक तैनाती की घोषणा की है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसेन ने इसे “गंभीर मामला” बताते हुए कहा कि सुरक्षा पर एक कार्यकारी समूह बनाया जाएगा। वहीं ग्रीनलैंड के उप-प्रधानमंत्री म्यूट एगेडे ने कहा कि आने वाले दिनों में नाटो की मौजूदगी और बढ़ सकती है।

कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड से लेकर डेनमार्क तक एक ही संदेश सामने आ रहा है—लोग अपने भविष्य का फैसला खुद करना चाहते हैं। सड़कों पर उतरी भीड़ ने साफ कर दिया है कि ग्रीनलैंड अपनी पहचान और स्व-शासन के मुद्दे पर किसी भी दबाव के आगे झुकने के मूड में नहीं है।

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