गिग इकोनॉमी भारत 2026
नई दिल्ली: आज पेश हुए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने भारत की गिग इकोनॉमी को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सर्वे के मुताबिक देश में इस समय करीब 1.2 करोड़ गिग वर्कर्स काम कर रहे हैं, जिनमें डिलीवरी पार्टनर्स, कैब ड्राइवर्स, फ्रीलांसर्स और ऐप-बेस्ड वर्कर्स शामिल हैं। यह संख्या देश की नॉन-एग्रीकल्चर वर्कफोर्स का लगभग 6.7 फीसदी है। अनुमान है कि 2030 तक गिग वर्कर्स की संख्या दोगुनी हो सकती है और यह सेक्टर GDP में करीब 2.35 लाख करोड़ रुपये का योगदान देगा।
लेकिन चमकदार आंकड़ों के पीछे हकीकत थोड़ी सख्त है। सर्वे बताता है कि करीब 40 फीसदी गिग वर्कर्स की मासिक कमाई 15 हजार रुपये से कम है। इनकम न तो स्थिर है और न ही सुरक्षित, ऊपर से प्लेटफॉर्म कंपनियों के मुकाबले वर्कर्स की ताकत बेहद कमजोर है।
अब सभी की निगाहें 1 फरवरी 2026 को पेश होने वाले यूनियन बजट पर टिकी हैं। पिछले कुछ सालों में सरकार ने गिग वर्कर्स को पहचान तो दी है—आयुष्मान भारत का दायरा बढ़ाया गया, e-Shram पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन शुरू हुआ—लेकिन ज़मीन पर इसका असर अभी सीमित दिखता है। इस बार उम्मीद है कि सरकार सोशल सिक्योरिटी फंड को असली फंडिंग देगी, ताकि पेंशन, हेल्थ इंश्योरेंस और मैटरनिटी बेनिफिट जैसे फायदे मिल सकें।
इनकम सिक्योरिटी भी बड़ा मुद्दा है। आर्थिक सर्वे में साफ कहा गया है कि गिग वर्क मजबूरी नहीं, एक विकल्प होना चाहिए। ऐसे में मिनिमम अर्निंग गारंटी, एक्सीडेंट इंश्योरेंस और गर्मी–बारिश जैसे क्लाइमेट रिस्क से सुरक्षा के ऐलान की उम्मीद की जा रही है।
हेल्थ इंश्योरेंस के मोर्चे पर भी नजरें टिकी हैं। आयुष्मान भारत के तहत कवरेज को और मजबूत करने, प्रीमियम में सरकार या प्लेटफॉर्म के योगदान और बिना को-पेमेंट इलाज की मांग तेज है। इसके साथ ही आसान क्रेडिट, सस्ते लोन, टैक्स में राहत और स्किल इंडिया के तहत गिग वर्कर्स के लिए अलग ट्रेनिंग मॉड्यूल भी चर्चा में हैं।
कुल मिलाकर, गिग वर्कर्स के लिए यह बजट सिर्फ घोषणाओं का नहीं बल्कि इम्प्लीमेंटेशन का टेस्ट होगा। अगर सोशल सिक्योरिटी फंड भरा गया और नियमों को व्यवहारिक बनाया गया, तो यह गिग वर्कर्स के लिए सच में गेम-चेंजर साबित हो सकता है। अब देखना यह है कि 1 फरवरी को वित्त मंत्री क्या बड़ा संदेश देती हैं।
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