जिस नक्शे को हमने बचपन से किताबों में देखा, स्कूल में पढ़ा और दुनिया समझने के लिए इस्तेमाल किया… क्या वह दुनिया को उसकी असली तस्वीर दिखाता ही नहीं था? करीब 450 साल बाद दुनिया के नक्शे को लेकर ऐसा बड़ा बदलाव हुआ है, जिसने एक बार फिर पुराने मैप पर सवाल खड़े कर दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा यानी UNGA ने दुनिया के एक नए नक्शे को अपनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। लेकिन सवाल है कि आखिर पुराने नक्शे में ऐसी क्या कमी थी कि उसे बदलने की जरूरत पड़ी? और नए नक्शे में दुनिया कितनी अलग नजर आएगी? आइए समझते हैं पूरा मामला।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पुराने ‘मर्केटर प्रोजेक्शन’ की जगह ‘इक्वल अर्थ कार्टोग्राफिक प्रोजेक्शन’ को अपनाने का प्रस्ताव पास किया है। इसकी बड़ी वजह यह बताई गई कि मर्केटर प्रोजेक्शन में देशों और महाद्वीपों का क्षेत्रफल वास्तविक आकार से अलग दिखाई देता है।
1569 में गेरार्डस मर्केटर द्वारा तैयार किए गए इस नक्शे में धरती के गोल आकार को सपाट कागज पर दिखाने की वजह से ध्रुवों के करीब के इलाके, जैसे यूरोप और उत्तरी अमेरिका, वास्तविक आकार से काफी बड़े नजर आते हैं। वहीं भूमध्य रेखा के आसपास स्थित अफ्रीका जैसे महाद्वीप अपेक्षाकृत छोटे दिखाई देते हैं।
मर्केटर प्रोजेक्शन की सबसे चर्चित खामी अफ्रीका और ग्रीनलैंड के उदाहरण से समझी जा सकती है। पुराने नक्शे में दोनों लगभग एक जैसे आकार के दिखाई देते हैं।
जबकि वास्तविकता में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना ज्यादा है। ‘इक्वल अर्थ’ प्रोजेक्शन का उद्देश्य महाद्वीपों के क्षेत्रफल को ज्यादा वास्तविक अनुपात में दिखाना है।
‘इक्वल अर्थ’ नक्शे को अपनाने के प्रस्ताव पर अमेरिका ने इसका विरोध किया। अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सेविच ने तर्क दिया कि संयुक्त राष्ट्र को दुनिया की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि 16वीं सदी के नक्शे को बदलने जैसी बहसों पर।
उन्होंने इस पहल को एक वैचारिक एजेंडा बताया और कहा कि ऐसी बहसों से संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
‘इक्वल अर्थ’ नक्शे के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र महासभा में 164 देशों का समर्थन मिला, जिसमें भारत भी शामिल है। वहीं अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। इसके अलावा यूक्रेन, मोल्दोवा, जॉर्जिया, सर्बिया, लिथुआनिया और एस्टोनिया समेत 6 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।
यानी दुनिया नहीं बदली है, बल्कि दुनिया को दिखाने का नजरिया बदल रहा है। नया नक्शा यह समझाने की कोशिश है कि मानचित्र सिर्फ सीमाएं नहीं दिखाते, बल्कि दुनिया के आकार और उसकी भौगोलिक तस्वीर को देखने का हमारा नजरिया भी तय करते हैं।
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