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एक तरफ 100 साल का जश्न, दूसरी तरफ विरोध! मोहन भागवत के UK दौरे पर क्यों मचा घमासान?

एक तरफ आरएसएस अपने 100 साल पूरे होने के मौके पर दुनिया भर में अपनी विचारधारा और काम को पहुंचाने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ ब्रिटेन में संघ प्रमुख मोहन भागवत के दौरे को लेकर विरोध के सुर तेज हो गए हैं। 2 सितंबर को ब्रिटेन पहुंचे भागवत के कार्यक्रमों को लेकर 20 सिविल सोसाइटी संगठनों ने लंदन के मेयर सादिक खान से अपील की है कि इन कार्यक्रमों को अनुमति न दी जाए। साथ ही, मेयर कार्यालय से जुड़े लोगों से भी इन आयोजनों से दूरी बनाने की मांग की गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भागवत के खिलाफ यह विरोध क्यों हो रहा है और इस पर RSS का क्या कहना है?

क्यों हो रहा है भागवत के खिलाफ विरोध?

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों के दौरों के दौरान अलग-अलग मानवाधिकार, अल्पसंख्यक और प्रवासी समूहों की ओर से विरोध दर्ज कराया गया है। विरोध करने वाले कुछ संगठनों का आरोप है कि आरएसएस की विचारधारा फासीवाद से प्रभावित है और भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों तथा दलितों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर संगठन की भूमिका विवादित रही है।


भागवत का मौजूदा विदेश दौरा आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित वैश्विक आउटरीच कार्यक्रम का हिस्सा बताया जा रहा है। वहीं, कुछ स्थानीय राजनीतिक समूहों, खालिस्तान समर्थक संगठनों और अन्य विरोधी समूहों ने भी उनके कार्यक्रमों के खिलाफ प्रदर्शन किया है।

विरोध पर RSS ने क्या दिया जवाब?

मोहन भागवत के ब्रिटेन और अन्य देशों में हो रहे विरोध पर आरएसएस ने कहा है कि लोकतंत्र में अलग-अलग राय और आवाजों का उठना सामान्य बात है। संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि आरएसएस इस विरोध को कोई बड़ी घटना नहीं मानता।


उन्होंने कहा कि संगठन विरोध करने वालों से भी संवाद और वैचारिक आदान-प्रदान के लिए तैयार है। संघ का कहना है कि उसकी विचारधारा और दुनिया को देखने का नजरिया सार्वजनिक है और उसे अपनी बात रखने में कोई संकोच नहीं है।
साथ ही, आरएसएस का दावा है कि विदेशों में कई स्थानीय संगठन और लोग भागवत के कार्यक्रमों का स्वागत और समर्थन भी कर रहे हैं।

मोहन भागवत के ब्रिटेन दौरे ने आरएसएस की विचारधारा को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। जहां कुछ संगठन उनके कार्यक्रमों का विरोध कर रहे हैं, वहीं RSS इसे लोकतांत्रिक असहमति का हिस्सा मानता है और संवाद की बात कर रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि भागवत के दौरे और उनके कार्यक्रमों को लेकर ब्रिटेन में यह राजनीतिक और सामाजिक बहस किस दिशा में आगे बढ़ती है।

news desk

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