काठमांडू: नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने हजारों परिवारों को ऐसा जख्म दिया है, जिसे भरना आसान नहीं होगा। किसी ने अपना घर खो दिया तो किसी की जिंदगी भर की जमा पूंजी मलबे में तब्दील हो गई। इस आपदा में 1,100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग अब भी लापता हैं। पानी उतरने और राहत-बचाव अभियान खत्म होने के बाद प्रभावित परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल होगा कि उजड़े घर और बर्बाद हुई संपत्ति को दोबारा खड़ा करने का खर्च कौन उठाएगा? ऐसे में इंश्योरेंस से उम्मीद बंधती है, लेकिन हर नुकसान का मुआवजा मिलना इतना आसान नहीं है।
NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, Elephant.in यानी एलायंस इंश्योरेंस ब्रोकर्स के बिजनेस डेवलपमेंट के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट चेतन वासुदेवा का कहना है कि अगर बाढ़ की वजह से कोई घर पूरी तरह तबाह हो गया है तो उस पर इंश्योरेंस क्लेम मिल सकता है। हालांकि, इसके लिए जरूरी है कि घर के मालिक के पास पहले से ऐसी एक्टिव पॉलिसी हो, जिसमें प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान का कवरेज शामिल हो।
वासुदेवा के मुताबिक, जिन लोगों के पास पहले से पर्याप्त बीमा कवर है और उनकी पॉलिसी में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं शामिल हैं, उनके लिए इंश्योरेंस नुकसान की भरपाई में बड़ी मदद कर सकता है।
हालांकि, क्लेम के तौर पर कितनी रकम मिलेगी, यह पूरी तरह पॉलिसी की शर्तों और बीमा राशि पर निर्भर करेगा। सिर्फ होम इंश्योरेंस होना इस बात की गारंटी नहीं है कि हर प्राकृतिक आपदा से हुआ नुकसान कवर हो जाएगा। पॉलिसी में बाढ़, जलभराव, भूस्खलन या तूफान जैसे जोखिमों का स्पष्ट तौर पर शामिल होना जरूरी हो सकता है।
यही वह जगह है जहां कई पॉलिसीधारकों को गलतफहमी हो सकती है। किसी घर की पॉलिसी कुछ खास जोखिमों को कवर कर सकती है, लेकिन हर तरह की प्राकृतिक आपदा को नहीं।
कुछ पॉलिसी में बाढ़, जमीन खिसकने या पानी भरने से हुए नुकसान का कवरेज होता है, जबकि कुछ में इन जोखिमों को शामिल नहीं किया जाता। इसलिए सिर्फ यह मान लेना सही नहीं होगा कि होम इंश्योरेंस खरीदने के बाद घर हर तरह की आपदा से सुरक्षित हो गया है।
क्लेम मिलेगा या नहीं, इसका फैसला पॉलिसी में शामिल जोखिमों और उसकी शर्तों के आधार पर होता है। यानी सवाल केवल यह नहीं है कि बाढ़ में घर बर्बाद हुआ है या नहीं, बल्कि यह भी देखना होगा कि जिस बाढ़ से नुकसान हुआ, क्या वह आपकी पॉलिसी में कवर है?
अगर बाढ़ में किसी प्रॉपर्टी को पूरी तरह नुकसान पहुंचा है और उसे ‘टोटल लॉस’ माना जाता है, तो क्लेम पर विचार आम तौर पर बीमा की कुल राशि यानी ‘सम इंश्योर्ड’ और पॉलिसी की शर्तों के अनुसार किया जाएगा।
यहां बीमा की रकम बेहद अहम हो जाती है। अगर किसी व्यक्ति ने अपनी प्रॉपर्टी की वास्तविक कीमत से काफी कम राशि का बीमा कराया है, तो क्लेम मिलने के बावजूद वह रकम घर को दोबारा बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती।
इसके अलावा घर के ढांचे और उसके अंदर रखे सामान का बीमा एक जैसा होना जरूरी नहीं है। इसलिए प्रभावित परिवारों को यह भी देखना होगा कि उनकी पॉलिसी में किन-किन चीजों को शामिल किया गया था।
किसी पॉलिसी में घर के स्ट्रक्चर का बीमा हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि उसके अंदर रखा हर सामान भी उसी कवरेज का हिस्सा हो।
फर्नीचर, टीवी, फ्रिज, दूसरे घरेलू उपकरण, गहने और जरूरी दस्तावेजों जैसे सामान के लिए अलग से ‘कंटेंट्स कवरेज’ की जरूरत हो सकती है। कुछ मामलों में पॉलिसी में इन चीजों का अलग से उल्लेख करना भी जरूरी हो सकता है।
इसी तरह बाढ़ के बाद परिवार को कुछ समय के लिए दूसरी जगह रहने पर होने वाला खर्च भी हर पॉलिसी में अपने आप शामिल नहीं होता। यह सुविधा भी पॉलिसी की शर्तों पर निर्भर करती है।
इसलिए अगर बीमा कंपनी घर के ढांचे को हुए नुकसान का क्लेम स्वीकार भी कर लेती है, तो यह जरूरी नहीं कि बाढ़ में बहा हर सामान भी उसी क्लेम के तहत कवर हो।
आपदा के बाद बीमा क्लेम के लिए सबूत और दस्तावेज बेहद अहम हो सकते हैं। चेतन वासुदेवा के मुताबिक, पॉलिसीधारकों को सबसे पहले अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए और इसके बाद जितनी जल्दी संभव हो, अपनी बीमा कंपनी या ब्रोकर को नुकसान की जानकारी देनी चाहिए।
इसके साथ ही जो भी सबूत सुरक्षित बचे हैं, उन्हें संभालकर रखना चाहिए। इनमें नुकसान की तस्वीरें और वीडियो, जगह की जानकारी, घर या संपत्ति के मालिकाना हक का प्रमाण, बीमा पॉलिसी और पॉलिसी शेड्यूल, सामान खरीदने की रसीदें और नुकसान हुए सामान की सूची शामिल हो सकती है।
अगर किसी आपदा में पूरी इमारत पानी और मलबे में दब गई हो तो भौतिक सबूत जुटाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में जो भी रिकॉर्ड या प्रमाण उपलब्ध हों, उन्हें सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण है।
वासुदेवा के मुताबिक, बीमा कंपनी को जल्द सूचना देने और नुकसान से जुड़े रिकॉर्ड संभालकर रखने से क्लेम प्रक्रिया में मदद मिल सकती है।
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