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“El Nino” और Ethanol का डबल अटैक! क्या अगले कुछ सालों तक भारत से गायब हो जाएगा चीनी का निर्यात?

भारत, जो कभी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी एक्सपोर्टर हुआ करता था, अब आने वाले कुछ सालों के लिए वैश्विक चीनी बाजार से पूरी तरह गायब हो सकता है। मौसम के बदलते मिजाज ‘एलनिनो’ El Nino और सरकार की ‘इथेनॉल ब्लेंडिंग’ नीति के दोहरे दबाव के कारण देश में चीनी का संकट गहराता जा रहा है। रॉयटर्स और आर्थिक विशेषज्ञों की ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह संकट सिर्फ इस साल का नहीं, बल्कि अगले तीन सालों तक खिंच सकता है।

30 साल के निचले स्तर पर स्टॉक


आंकड़े बताते हैं कि भारत में इस सीज़न में चीनी का कुल उत्पादन घटकर 2.79 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जबकि देश की अपनी घरेलू खपत ही 2.85 करोड़ टन तक पहुंच चुकी है। यानी देश में चीनी की पैदावार, उसकी मांग से भी कम है।

स्थिति कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस सीज़न के अंत तक चीनी मिलों के पास बचा हुआ पुराना स्टॉक घटकर महज 35 लाख टन रह जाएगा। यह पिछले 30 सालों में भारतीय चीनी उद्योग का सबसे निचला स्तर है।

गन्ने से बनाई दूरी


गन्ने की खेती में भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। लेकिन मानसून की अनिश्चितता और एलनिनो के कारण कम बारिश के डर से देश के किसान अब गन्ने की खेती से तौबा कर रहे हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों के किसान अब गन्ने की जगह कम पानी लेने वाली फसलों, जैसे सोयाबीन और अरहर की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। गन्ने की बुवाई घटने का सीधा मतलब है कि आने वाले सालों में भी चीनी का उत्पादन सुधरने की उम्मीद बेहद कम है।

इथेनॉल ब्लेंडिंग का ‘स्वीट’ प्रेशर


इस संकट के पीछे दूसरा बड़ा कारण है पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का सरकार का महत्वाकांक्षी लक्ष्य। कच्चे तेल के आयात को कम करने और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सरकार गन्ने के रस और शीरे से इथेनॉल बनाने पर जोर दे रही है। ऑटोमोबाइल कंपनियां भी फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां बाजार में उतार रही हैं। नतीजा यह है कि जो गन्ना पहले चीनी बनाने के काम आता था, उसका एक बड़ा हिस्सा अब ईंधन बनाने में इस्तेमाल हो रहा है।

‘पहले देश, फिर विदेश’


चीनी भारत में एक बेहद संवेदनशील राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा है। गरीब परिवारों के लिए यह ऊर्जा का एक सस्ता और मुख्य जरिया है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, मंत्रियों ने चीनी मिलों को साफ संदेश दे दिया है कि वे निर्यात की अनुमति के लिए सरकार पर दबाव न बनाएं। सरकार किसी भी कीमत पर घरेलू बाजार में चीनी की कीमतें बढ़ने नहीं देना चाहती। सरकार लंबी अवधि के बैन के बजाय ‘सीज़न दर सीज़न’ की स्थिति देखकर फैसला लेगी।

वैश्विक बाजार में मचेगी खलबली

दुनिया की कुल चीनी सप्लाई में भारत की हिस्सेदारी लगभग 10% “सालाना औसतन 68 लाख टन” रही है। भारत के बाजार से हटने के कारण एशिया, अफ्रीका और मिडिल ईस्ट के देशों में चीनी की भारी किल्लत हो सकती है, जिससे न्यूयोर्क और लंदन के कमोडिटी बाजारों में चीनी के दाम आसमान छू सकते हैं।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर हालात और बिगड़े, तो पिछले 10 सालों में पहली बार भारत को चीनी का इम्पोर्ट करना पड़ सकता है। इससे पहले साल 2009-10 में जब भारत ने बड़े पैमाने पर चीनी आयात की थी, तब वैश्विक बाजार में चीनी के दाम तीन गुना बढ़ गए थे। इस बार भी दुनिया के बाजारों पर वैसा ही खतरा मंडरा रहा है।

news desk

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