भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर अधिकारियों के कामकाज और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर उठा विवाद एक बार फिर चर्चा में है।
सूचना का अधिकार (RTI) के तहत सामने आए दस्तावेजों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 29 जुलाई 2026 को कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखकर वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज पर आपत्ति जताई थी और उचित कार्रवाई की मांग की थी।
दोनों आयुक्तों की शिकायत कार्य आवंटन में किए गए बदलाव से संबंधित थी। कैबिनेट सचिवालय ने शिकायतों को गंभीरता से लेने की बात कही, लेकिन यह भी माना कि निर्वाचन आयोग की ओर से औपचारिक शिकायत या आधिकारिक पत्राचार के अभाव में सीधे कार्रवाई करना संवैधानिक संस्था के कामकाज में कार्यपालिका का हस्तक्षेप माना जा सकता है। इसलिए पत्रों की प्राप्ति स्वीकार करते हुए मामले की जानकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को भेजी गई।
कैसे शुरू हुआ विवाद?
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, निर्वाचन आयोग के प्रशासनिक प्रभाग के प्रभारी उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु 27 जुलाई से 9 अगस्त 2026 तक अवकाश पर थे। इस दौरान वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग को प्रशासनिक प्रभाग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था।
आरोप है कि अतिरिक्त जिम्मेदारी संभालने के कुछ ही घंटों के भीतर गर्ग ने 28 जुलाई को वरिष्ठ अधिकारियों के बीच काम के बंटवारे में बदलाव का आदेश जारी कर दिया। संधू और जोशी ने आपत्ति जताई कि यह बदलाव आयोग या संबंधित अधिकारियों के साथ पहले चर्चा किए बिना किया गया।
दोनों आयुक्तों ने अपने पत्रों में कहा कि अधिकारियों को पहले भी निर्देश दिए गए थे कि आयोग से चर्चा या मंजूरी के बिना इस तरह के बदलाव नहीं किए जाएं। उनका आरोप था कि इसके बावजूद कार्य आवंटन में संशोधन किया गया।
विवेक जोशी ने फाइल नहीं देने का भी लगाया आरोप
विवेक जोशी ने अपनी शिकायत में यह भी कहा कि जब उन्होंने प्रशासनिक प्रभाग से संबंधित फाइल मांगी, तो उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई। वहीं, संधू ने भी कार्य आवंटन के फैसले की प्रक्रिया और आयोग को जानकारी दिए जाने को लेकर आपत्ति जताई।
इस विवाद का एक अहम पहलू मतदाता सूची से जुड़े आईटी सिस्टम की निगरानी और प्रशासनिक नियंत्रण भी रहा है। पहले प्रकाशित रिपोर्टों में सवाल उठाया गया था कि कार्य आवंटन में बदलाव से चुनावी सूची के सॉफ्टवेयर और निगरानी व्यवस्था पर किस तरह असर पड़ सकता था। हालांकि, इन आशंकाओं को वास्तविक डेटा सुरक्षा उल्लंघन का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
कैबिनेट सचिवालय ने सीधे कार्रवाई क्यों नहीं की?
RTI के तहत सामने आई फाइल नोटिंग के मुताबिक, कैबिनेट सचिवालय में 3 और 4 अगस्त को इस मामले पर विचार किया गया। अधिकारियों ने कहा कि निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और उसके कामकाज में कार्यपालिका का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
फाइल नोटिंग में यह भी कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्र उनकी व्यक्तिगत हैसियत में भेजे गए थे। इन्हें पूरे आयोग की ओर से आधिकारिक शिकायत नहीं माना जा सकता। ऐसे में सीधे कार्रवाई करना अनुचित हो सकता था और इसे संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता था।
5 अगस्त को कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन ने दोनों आयुक्तों के पत्रों की प्राप्ति स्वीकार की। पत्रों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के संबंधित अधिकारियों को भी भेजी गईं।
मनीष गर्ग के मामले में आगे क्या हुआ?
कैबिनेट सचिवालय की फाइल नोटिंग में कहा गया कि मनीष गर्ग की नियुक्ति नियुक्ति संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति (ACC) के माध्यम से हुई थी, लेकिन निर्वाचन आयोग में उनकी कार्यप्रणाली और आचरण आयोग के नियमों एवं दिशानिर्देशों के अधीन हैं।
दस्तावेजों में यह भी संकेत दिया गया कि मामले को रिकॉर्ड पर रखा जाए, ताकि भविष्य में अधिकारी से जुड़े प्रशासनिक फैसलों के समय इसे ध्यान में रखा जा सके।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि शिकायतों के बाद किसी भी स्तर पर कोई प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, कैबिनेट सचिवालय ने सीधे कार्रवाई नहीं की, लेकिन मामले को मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के संज्ञान में भेजा।
निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता पर क्यों अहम है यह मामला?
यह विवाद केवल अधिकारियों के बीच कार्य आवंटन तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी उठाता है कि निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के भीतर प्रशासनिक फैसलों पर आपत्ति दर्ज कराने और उनका निपटारा करने की प्रक्रिया किस तरह काम करती है।
एक तरफ अधिकारियों के कामकाज में जवाबदेही और पारदर्शिता जरूरी है, तो दूसरी तरफ आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखना भी संवैधानिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है। RTI से सामने आए दस्तावेज इस मामले में शिकायत, प्रशासनिक विचार-विमर्श और पत्राचार की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हैं, लेकिन अपने आप में किसी अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित नहीं करते।
संधू और जोशी की शिकायतों के बाद कैबिनेट सचिवालय ने सीधे कार्रवाई करने के बजाय मामला निर्वाचन आयोग के नेतृत्व और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के संज्ञान में भेजा। अब इस प्रकरण में किसी आगे की कार्रवाई या अंतिम निष्कर्ष के बारे में दावा करने के लिए निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड की पुष्टि जरूरी है।