OTT की दुनिया में इन दिनों एक नाम सबसे ज्यादा बज क्रिएट कर रहा है वो है ‘Maa Behen’ नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई सुरेश त्रिवेणी की इस ब्लैक-कॉमेडी में माधुरी दीक्षित, तृप्ति डिमरी और डिजिटल स्टार धारणा दुर्गा की तिगड़ी नजर आ रही है।
फिल्म का टाइटल भले ही एक आम भारतीय गाली पर तंज हो, पर कहानी तीन ऐसी महिलाओं की है जो अपनी जिंदगी की ‘ऐसी-तैसी’ होने से बचाने के लिए एक मरे हुए पड़ोसी की लाश को ठिकाने लगाने की तरकीब में हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्टार कास्ट और उनके अनोखे किरदार हैं। यह फिल्म बॉलीवुड की उस घिसी-पिटी ‘पवित्र, त्यागी और संस्कारी मां’ वाले स्टीरियोटाइप को बीच तोड़ते हुए पेश की गयी है।
इस फिल्म में माधुरी दीक्षित “रेखा” के रोल में है, वह कोई सीधी-सादी, आंसू बहाने वाली मां नहीं है, स्लीवलेस ब्लाउज पहनती है, खुलेआम पैसे कमाने के जुगाड़ ढूंढती है और पूरे मोहल्ले के लिए गॉसिप का अड्डा है। वह एक ऐसी ‘फ्लॉड’ महिला है जो मुसीबत आने पर सबसे पहले खुद की जान बचाना जानती है।
“जया” रेखा की बड़ी बेटी जिसके रोल में है “तृप्ति डिमरी”, जो एक चालाक पति से परेशान है। वह एक ऐसी दबी हुई घरेलू महिला है जो जिंदगी भर गोल रोटियां बना-बनाकर थक चुकी है और अब इस मर्डर मिस्ट्री के बहाने अपनी मर्जी से जीना चाहती है।
“सुषमा” रेखा की छोटी बेटी है जिसका किरदार “धारणा दुर्गा” ने निभाया है, जो एक रील्स-ऑब्सेस्ड सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर है। घर में लाश पड़ी है, पुलिस का डर है, लेकिन उसका दिमाग इस बात पर चल रहा है कि इस सिचुएशन से ‘लाइक्स और व्यूज’ कैसे बटोरे जाएं।
जब ये तीनों अलग-अलग मिजाज की औरतें एक मरे हुए पड़ोसी की लाश को ठिकाने लगाने के लिए एक छत के नीचे आती हैं, तो उनके बीच की नोकझोंक, ड्रामा और अजीबोगरीब तरकीबें कहानी को आगे बढ़ाती हैं।
फिल्म का कोर कांसेप्ट काफी तगड़ा है। यह समाज के उस हिप्पोक्रेट चेहरे पर तंज कसती है, जो अकेले रहने वाली या अपनी शर्तों पर जीने वाली औरतों को तुरंत जज करने लगता है। फिल्म के बीच में आने वाला टीवी क्राइम शो का मजाक सबसे ज्यादा एंटरटेनिंग है।
क्रिटिक्स का मानना है कि फिल्म ‘Andhadhun‘ या ‘Darlings‘ जैसा थ्रिलर और कॉमेडी का परफेक्ट बैलेंस नहीं बना पाती। फिल्म में लॉजिक की भारी कमी है, तीनों औरतें घर में चीख-चीखकर मर्डर छुपाने का प्लान बनाती हैं, और पड़ोसियों को भनक तक नहीं लगती और फिल्म का सेट किसी असली छोटे शहर जैसा लगने के बजाय एक बनावटी ‘सिटकॉम सेट’ जैसा वाइब देता है, जिससे फिल्म की सिचुएशनल टेंशन खत्म हो जाती है।
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