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नहीं रहे ‘अंग्रेजों के जमाने के जेलर’. जब असरानी ने एक तानाशाह के अंदाज में कॉमेडी कर दुनिया को चौंकाया!

मुंबई: अपने अभिनय से दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छेड़ने वाले, अपनी संवाद अदायगी से पीढ़ियों को हंसाने वाले मशहूर अभिनेता असरानी नहीं रहे. अभिनेता और निर्देशक गोवर्धन रामचंद्र असरानी, जिन्हें दुनिया प्यार से ‘असरानी’ कहकर पुकारती थी, बीते सोमवार को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया. दीवाली की शाम, लगभग 3:45 बजे मुंबई के भारतीय आरोग्य निधि अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके निधन की खबर ने बॉलीवुड जगत और प्रशंसकों को गहरा सदमा पहुंचा, खासकर इसलिए क्योंकि निधन से महज कुछ घंटे पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर दीवाली की शुभकामनाएं साझा की थीं.

शांत विदाई की आखिरी इच्छा

असरानी के परिवार ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए ही उनका अंतिम संस्कार कराया. मुंबई के संत एक्रूज क्रेमेटोरियम में शाम 8 बजे इलेक्ट्रिक क्रेमेशन किया गया, जिसमें केवल परिवारजन और निकटतम मित्र ही मौजूद रहे. उनके मैनेजर बाबूभाई थिबा ने बताया, “असरानी जी ने अपनी पत्नी मंजू से कहा था कि उनका निधन किसी आयोजन में न बदले जाए. वो शांति से जाना चाहते थे, इसलिए हमने बिना किसी हलचल के अंतिम संस्कार किया” परिवार ने खबर को अंतिम संस्कार के बाद ही सार्वजनिक किया, जिससे प्रशंसक स्तब्ध रह गए.

कैसे हुआ निधन ?

असरानी पिछले 15 दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे, चार-पांच दिनों से वो फेफड़ों से जुड़ी सांस लेने की समस्या के कारण अस्पताल में भर्ती थे. उनके भतीजे अशोक असरानी ने पुष्टि करते हुए कहा, “जो इंसान सबको हंसाता था, आज वह हमें रुला गया” बॉलीवुड के कई सितारे, जैसे अक्षय कुमार, ने सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि दी. अक्षय ने लिखा, “असरानी जी के जाने से स्तब्ध हूं, एक हफ्ता पहले ही हमने ‘हैवान’ की शूटिंग पर गले मिले थे. वो बहुत प्यारे इंसान थे”

असरानी का सिनेमाई सफर

असरानी का जन्म 1 जनवरी 1941 को जयपुर (राजस्थान) के एक सिंधी परिवार में हुआ. असरानी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सेंट जेवियर्स स्कूल, जयपुर से पूरी की. 1960-62 के बीच साहित्य कलभाई ठक्कर के मार्गदर्शन में उन्होने अभिनय सीखा. 1964 में पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से प्रशिक्षण लिया. मुंबई आकर उन्होंने 1967 में ‘हरे कांच की चूड़ियां’ से डेब्यू किया. शुरुआत में छोटे-मोटे रोल्स मिले, लेकिन ऋषिकेश मुखर्जी की ‘गुड्डी’ (1971) में जया बच्चन के साथ उनकी जोड़ी ने उन्हे शोहरत और पहचान दी. फिल्म शोले में उनका बोला गया डॉयलॉग ‘हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं’ कालजयी साबित हुआ. बहुत कम लोग जानते हैं कि असरानी ने शोले फिल्म में जेलर का किरदार निभाने के लिए हिटलर का अंदाज लिया था. यानी एक तानाशाह को कॉमिक किरदार में बदल दिया था. शोले में छोटे से रोल और बड़े स्टार्स के बावजूद असरानी अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे.

असरानी का करियर 50 वर्ष से अधिक लंबा रहा. उन्होंने 350 से ज्यादा हिंदी और गुजराती फिल्मों में काम किया, जिसमें लीड रोल्स से लेकर सपोर्टिंग और कॉमिक किरदार शामिल हैं. 1972-84 तक वो लीड रोल्स में नजर आए, जबकि 1985-2012 तक कैरेक्टर आर्टिस्ट के रूप में सक्रिय रहे. उन्होंने छह फिल्में निर्देशित भी कीं. उनकी आखिरी फिल्म 2023 की ‘नॉन स्टॉप धमाल’ और 2023 में ‘ड्रीम गर्ल 2’ थी. रियल लाइफ में सादगी पसंद असरानी अपनी पत्नी अभिनेत्री मंजू असरानी के साथ रहते थे. उनकी कोई संतान नहीं थी, लेकिन बहन और भतीजे उनके साथ थे.

news desk

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