लखनऊ। एक अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता है। इस मामले की खबर चलती है। जिसके बाद विभाग उस अधिकारी को निलंबित कर जांच बैठा देता है। लेकिन इसी बीच वो अधिकारी खबर चलाने वाले पत्रकारों पर झूठे आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज करवा देता है। है ना हैरतअंगेज खबर। पूरी कहानी और भी मजेदार है।
क्या है पूरा मामला?
नृपेंद्र बहादुर सिंह पर आरोप है कि आवास एवं विकास परिषद में संपत्ति अधिकारी के पद पर रहते हुए उन्होंने खुलेआम लूट-खसोट को अंजाम दिया। इन आरोपों से जुड़े कई ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। इन क्लिप में भ्रष्टाचार की बातचीत होने का दावा किया जा रहा है। ऑडियो क्लिप के अनुसार गाजियाबाद में तैनाती के दौरान ‘वह प्रति प्लॉट करीब 5 लाख 50 हजार रुपये की रिश्वत की मांग करते थे, जिसमें से पांच लाख रुपये खुद रखने और शेष रकम कर्मचारियों में बांटने की बात कही जाती थी’।
22 अगस्त को जब इंडियन प्रेस हाउस ने इस पूरे मामले को प्रमुखता से प्रकाशित किया, तो हलचल मच गई। मामले को गंभीरता से लेते हुए पहले नृपेंद्र बहादुर सिंह को मुख्यालय तलब किया गया और बाद में उन्हें निलंबित कर दिया गया।
मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ। आवास एवं विकास परिषद ने पूरे प्रकरण की जांच के लिए एक विशेष जांच समिति का गठन किया है। सरकार ने इस खबर को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार को लेकर उसकी नीति पूरी तरह साफ है और किसी भी स्तर पर गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
खबरों के मुताबिक उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद की सिद्धार्थ विहार योजना में बड़ी गड़बड़ियों का मामला सामने आया। उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक, संपत्ति प्रबंधन विभाग और जोनल कार्यालय से जुड़े कुछ अधिकारियों पर अधूरे टावरों की भी पूर्ण गणना कर एक निजी बिल्डर को करोड़ों रुपये का अनुचित लाभ पहुंचाने का आरोप है। मामले की जांच जोनल अधिकारी एवं अभियंता राजीव कुमार द्वारा की गई। खबरों के मुताबिक इसे गंभीर वित्तीय अनियमितता करार दिया गया है।
पूर्व संपत्ति अधिकारी नृपेंद्र बहादुर सिंह की वसुंधरा स्थित कार्यालय में कथित तौर पर लाखों रुपये के साथ ली गई तस्वीर भी सामने आई है, जो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। वहीं, मेरठ के पूर्व जोनल आयुक्त की एक गोपनीय चिट्ठी में संबंधित अधिकारियों पर निजी बिल्डर को लाभ पहुंचाने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। सूत्रों का दावा है कि यह तस्वीर उनके ही विभाग के एक कर्मचारी द्वारा ली गई थी, जिसे बाद में सार्वजनिक किया गया।
22 अगस्त 2025 को Indian Press House ने इस पूरे मामले को प्रमुखता से प्रकाशित किया और उसी दिन नृपेंद्र बहादुर सिंह को मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया।
23 अगस्त 2025 को अपर आवास आयुक्त नीरज शुक्ला ने पत्र संख्या 69 जारी करते हुए नृपेंद्र बहादुर सिंह को निलंबित कर दिया।
मीडिया पर एफआईआर का मामला
इसके बाद 23 दिसंबर 2025 को नृपेंद्र बहादुर सिंह ने लखनऊ के इंदिरानगर क्षेत्र स्थित गाजीपुर थाने में Indian Press House के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई, जिसे मीडिया की आवाज दबाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
अब सवाल है कि क्या ऐसे अधिकारी जो अनियमितता के आरोपों के चलते निलंबित कर दिए जा रहे हों वो अपना काम कितनी ईमानदारी से करते होंगे? क्या ऐसे अधिकारी भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति को सफल होने देंगे?







