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ईरान-अमेरिका तनाव के बीच ‘तेल की जियोपॉलिटिक्स’ का खुलासा, Lindsey Graham के एक बयान ने खड़े किए बड़े सवाल

मिडिल-ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान को लेकर एक नई बहस तेज हो गई है। हाल ही में आए एक बयान के बाद कई राजनीतिक एक्सपर्ट यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या ईरान को लेकर दशकों से चल रहा टकराव सिर्फ सुरक्षा चिंताओं से जुड़ा है, या इसके पीछे वैश्विक ऊर्जा संसाधनों और तेल की जियो-पॉलिटिक्स भी बड़ी वजह है।

दरअसल, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर पिछले करीब तीन दशकों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद बना हुआ है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और कई अमेरिकी नेताओं ने अलग-अलग समय पर दावा किया कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के बेहद करीब है।

1990 के दशक से लेकर 2000 तक कई बार यह कहा गया कि ईरान जल्द ही न्यूक्लियर बम बना सकता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्टों में अब तक ईरान के पास परमाणु हथियार होने की कोई ठोस पुष्टि नहीं हुई है। इसी वजह से अब ये बहस फिर तेज हो गई है कि आखिर इतने सालो तक ईरान को लेकर रणनीति क्यों अपनाई गई।

इसी बीच अमेरिकी राजनीति के प्रमुख नेता Lindsey Graham का एक बयान चर्चा में आ गया। एक टीवी इंटरव्यू के दौरान ग्राहम ने कहा कि वेनेजुएला और ईरान जैसे देशों के पास दुनिया के बड़े तेल भंडार हैं और अगर इन संसाधनों में रणनीतिक साझेदारी हो जाए, तो यह वैश्विक शक्ति संतुलन और खासकर चीन के लिए बड़ा चुनौतीपूर्ण परिदृश्य बन सकता है।

इस बयान के सामने आने के बाद कई विशेषज्ञों ने कहा कि मध्य-पूर्व की राजनीति को तेल और ऊर्जा संसाधनों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। दुनिया की बड़ी शक्तियों की रणनीतियों में ऊर्जा सुरक्षा हमेशा एक अहम फैक्टर रही है।

इतिहास में भी ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब किसी सैन्य कार्रवाई के पीछे बताए गए कारणों पर बाद में सवाल उठे। साल 2003 में अमेरिका ने इराक पर हमला किया था। उस समय दावा किया गया था कि इराक के पास ‘Weapons of Mass Destruction’ यानी सामूहिक विनाश के हथियार मौजूद हैं। उस दौर में इराक के राष्ट्रपति Saddam Hussein को सत्ता से हटाया गया और बाद में उन्हें फांसी दे दी गई।

हालांकि बाद में कई जांच रिपोर्टों में यह सामने आया कि इराक में ऐसे हथियारों के ठोस सबूत नहीं मिले। इस मुद्दे को लेकर उस समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे Tony Blair को भी भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था।

अब ईरान को लेकर भी कुछ विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह टकराव सिर्फ परमाणु कार्यक्रम को लेकर है, या इसके पीछे मध्य-पूर्व के तेल भंडार, ऊर्जा बाजार और वैश्विक शक्ति संतुलन की राजनीति भी काम कर रही है।

ईरान की राजनीति में सर्वोच्च धार्मिक नेता Ali Khamenei की भूमिका भी इस बहस का अहम हिस्सा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की मौजूदा व्यवस्था पश्चिमी प्रभाव को सीमित रखने की कोशिश करती रही है, जबकि पश्चिमी देश ईरान की नीतियों को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती मानते हैं।

इस पूरे तनाव का असर सिर्फ मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारत जैसे देशों पर भी पड़ता है, जहां पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतें वैश्विक बाजार से प्रभावित होती हैं।

फिलहाल अमेरिका-ईरान विवाद को लेकर दुनिया भर में अलग-अलग राय सामने आ रही है। एक पक्ष इसे सुरक्षा और परमाणु प्रसार को रोकने की रणनीति मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे वैश्विक शक्ति संतुलन और ऊर्जा संसाधनों की जियो-पॉलिटिक्स से जोड़कर देख रहा है।

news desk

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