DNA के हिस्सों के “फ्लिप” होने से बन सकते हैं Supergenes, जो Evolution की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं।
विकास (Evolution) की प्रक्रिया को लेकर वैज्ञानिकों ने एक बेहद दिलचस्प खोज की है। रिसर्च में पता चला है कि DNA के कुछ हिस्से अपने आप “फ्लिप” यानी उलट सकते हैं, और यही बदलाव जीवों के विकास की गति को कई गुना तेज कर सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्रक्रिया कई नई प्रजातियों के तेजी से बनने के पीछे एक बड़ा कारण हो सकती है।
हमारे शरीर का DNA एक लंबी निर्देश पुस्तिका की तरह होता है, जिसमें जीन एक खास क्रम में लगे रहते हैं। लेकिन कभी-कभी DNA का कोई हिस्सा अपने स्थान पर ही उलट (reverse) जाता है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में Chromosomal Inversion कहा जाता है।
इसे आसान तरीके से समझें तो मान लीजिए DNA का क्रम है –
ABCDEF
अगर बीच का हिस्सा फ्लिप हो जाए तो यह बन सकता है –
ABEDCF
अक्षर वही रहते हैं, लेकिन उनका क्रम बदल जाता है। इससे जीन के काम करने का तरीका बदल सकता है और नए गुण (traits) पैदा हो सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने पाया कि जब DNA का कोई बड़ा हिस्सा फ्लिप हो जाता है तो उसमें मौजूद कई जीन एक साथ जुड़े रह जाते हैं। ऐसे जीन समूह को Supergene कहा जाता है।
आमतौर पर प्रजनन के दौरान माता-पिता के जीन आपस में मिलकर नए संयोजन बनाते हैं। लेकिन अगर DNA में inversion हो जाए तो उस हिस्से के जीन अलग नहीं हो पाते। इसका फायदा यह होता है कि फायदेमंद जीनों का पूरा पैकेज पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रहता है।
इस खोज का मजबूत प्रमाण अफ्रीका की Lake Malawi की Cichlid मछलियों में मिला। वैज्ञानिकों ने पाया कि इन मछलियों की 800 से ज्यादा प्रजातियाँ बहुत कम समय में विकसित हो गईं।
जांच में पता चला कि इनके कई क्रोमोसोम में DNA के बड़े हिस्से फ्लिप हुए थे। इन फ्लिप्स की वजह से मछलियों में अलग-अलग गुण विकसित हुए जैसे:
यही कारण है कि एक ही पूर्वज से इतनी सारी नई प्रजातियाँ जल्दी बन गईं।
वैज्ञानिकों को यह भी पता चला कि कभी-कभी DNA का फ्लिप एक ही जीन के अंदर भी हो सकता है। इससे एक ही जीन से अलग-अलग तरह के प्रोटीन बन सकते हैं।
इस खोज ने उस पुराने विचार को चुनौती दी है कि एक जीन सिर्फ एक ही प्रोटीन बनाता है।
DNA फ्लिप की वजह से evolution कई तरीकों से तेज हो सकता है:
वैज्ञानिकों का मानना है कि DNA inversion सिर्फ मछलियों तक सीमित नहीं है। यह प्रक्रिया कीड़ों, पक्षियों, स्तनधारियों और इंसानों में भी पाई जाती है।
इसी वजह से यह खोज सिर्फ evolution को समझने के लिए ही नहीं, बल्कि बीमारियों के जीन, बैक्टीरिया के बदलते व्यवहार और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को समझने में भी मदद कर सकती है।
इस नई खोज से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली है कि evolution हमेशा धीरे-धीरे छोटे बदलावों से ही नहीं होता। कभी-कभी DNA के बड़े हिस्से के अचानक “फ्लिप” होने से भी जीवों में बड़े बदलाव आ सकते हैं, जो नई प्रजातियों के बनने की राह खोल देते हैं।
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