समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक बार फिर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर सवाल उठाए हैं। गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में अखिलेश यादव ने बिना नाम लिए मुख्य चुनाव आयुक्त पर निशाना साधते हुए लिखा, “मुंह नुचुआ तो सुना था अब ‘चुनाव मुचुआ’ आ गए हैं। अब एक देश का एक मत… भ्रष्ट ‘मुचुआ’ दें त्यागपत्र!” उन्होंने आगे लिखा कि बाकी मतलब समझने के लिए Gen-Z और जागरूक जनता समझदार है।
‘चुनाव मुचुआ’ वाले बयान की टाइमिंग क्यों अहम है?
अखिलेश यादव की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेदों का दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
रिपोर्ट में मतदाता सूची, नए मतदाताओं के Form-6, नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया और चुनावी डेटा से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर आपत्तियों का जिक्र किया गया है। एक मामले में बदलाव को लेकर “unauthorised” और “illegal” जैसे शब्दों के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया गया। ये संबंधित अधिकारियों की आपत्तियों में इस्तेमाल किए गए शब्द हैं, इन्हें चुनाव आयोग द्वारा किसी कार्रवाई के अवैध ठहराए जाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने कहा कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में लिखित टिप्पणियां, सुझाव और अलग-अलग विचार निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के मुताबिक, पिछले एक साल में लिए गए उसके सभी फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
यानी एक तरफ रिपोर्ट में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज आपत्तियों का जिक्र है, वहीं आयोग का आधिकारिक पक्ष है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
अखिलेश पहले भी उठा चुके हैं सवाल
इससे एक दिन पहले 23 सितंबर को अखिलेश यादव ने लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। उन्होंने रिपोर्ट में सामने आई 14 आपत्तियों का जिक्र करते हुए पूछा था कि अगर चुनाव आयोग के भीतर ही अधिकारी फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं तो आयोग किसके लिए काम कर रहा था।
अखिलेश ने यह भी आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी समर्थक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से व्यवस्थित तरीके से हटाए गए। यह उनका राजनीतिक आरोप है; चुनाव आयोग ने दूसरी ओर SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए जाने की बात कही है।
‘मुंह नुचुआ’ से ‘चुनाव मुचुआ’ तक
अखिलेश यादव के नए बयान में इस्तेमाल किया गया ‘मुंह नुचुआ’ शब्द उत्तर भारत में 1990 के दशक के अंत और 2000 के शुरुआती वर्षों में फैली एक अफवाह से जुड़ा है। उस समय उत्तर प्रदेश और बिहार के कई इलाकों में लोगों के बीच ऐसी अफवाह फैली थी कि कोई अज्ञात व्यक्ति रात में लोगों का चेहरा नोच रहा है।
इसी पुराने शब्द को राजनीतिक तंज में बदलते हुए अखिलेश यादव ने ‘चुनाव मुचुआ’ शब्द का इस्तेमाल किया है। उनके बयान का संदर्भ मौजूदा चुनाव आयोग विवाद और CEC ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवाल हैं।
विवाद का केंद्र क्या है?
मौजूदा विवाद में तीन बातें अलग-अलग समझना जरूरी है—दो चुनाव आयुक्तों की कथित लिखित आपत्तियां, चुनाव आयोग का सर्वसम्मति से फैसले लेने का दावा और विपक्ष की राजनीतिक प्रतिक्रिया।
इस पूरे मामले में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में सामने आए मतभेद अपने आप में किसी चुनावी प्रक्रिया को अवैध साबित नहीं करते। आयोग ने भी स्पष्ट किया है कि आंतरिक टिप्पणियां और असहमति निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती हैं।
