अक्रा/हरारे। वैश्विक राजनीति में अब सिर्फ सैन्य या आर्थिक ताकत ही नहीं, बल्कि डेटा की ताकत भी निर्णायक बनती जा रही है। इसी बीच United States की एक हेल्थ फंडिंग रणनीति को अफ्रीकी देशों से बड़ा झटका लगा है। Ghana और Zimbabwe ने अमेरिकी प्रस्तावित हेल्थ डील को ठुकराकर साफ संदेश दिया है कि “फंडिंग के बदले डेटा” उन्हें मंजूर नहीं।
क्या थी डील और क्यों उठा विवाद?
जानकारी के मुताबिक, अमेरिका हेल्थ सेक्टर में फंडिंग देने के बदले देशों से संवेदनशील हेल्थ डेटा तक एक्सेस चाहता था।
घाना ने इस प्रस्ताव को इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि इसमें ऐसे प्रावधान थे, जिनसे अमेरिकी संस्थाओं को नागरिकों के डेटा तक बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के पहुंच मिल सकती थी।
घाना के अधिकारियों का कहना है कि
- मांगा गया डेटा जरूरत से ज्यादा था
- डेटा इस्तेमाल के लिए स्पष्ट सहमति और सीमाएं तय नहीं थीं
- इससे नागरिकों की पहचान और निजी जानकारी उजागर होने का खतरा था
“डेटा संप्रभुता” बना बड़ा मुद्दा
यह मामला अब सिर्फ एक डील का नहीं, बल्कि डेटा सॉवरेनिटी (Data Sovereignty) का बन गया है।
घाना के डेटा प्रोटेक्शन अधिकारियों ने साफ कहा कि किसी भी विदेशी फंडिंग के बदले देश अपने नागरिकों की संवेदनशील जानकारी से समझौता नहीं करेगा।
करीब 300 मिलियन डॉलर के इस प्रस्ताव में घाना को पांच साल में लगभग 109 मिलियन डॉलर मिलने थे, लेकिन इसके बावजूद देश ने जोखिम को देखते हुए पीछे हटना बेहतर समझा।
जिम्बाब्वे ने भी दिखाया था यही रुख
इससे पहले फरवरी में Zimbabwe भी इसी तरह की डील को ठुकरा चुका है। वहीं, Zambia ने भी प्रस्ताव के कुछ हिस्सों पर रोक लगा दी है, जिससे संकेत मिलता है कि अफ्रीकी देशों में इस मुद्दे पर सतर्कता बढ़ रही है।
ट्रंप नीति पर उठे सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि Donald Trump के “America First” दृष्टिकोण के तहत अमेरिका वैश्विक स्तर पर ऐसे समझौते कर रहा है, जिनमें रणनीतिक फायदे छिपे हो सकते हैं। हालांकि, अब छोटे देश भी इन शर्तों को लेकर ज्यादा सजग नजर आ रहे हैं।