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चीन के मकड़जाल में फंसी रेयर अर्थ मैटेरियल पर निर्भर दुनिया! अमेरिका से छीन कर चीन ने कैसे बनाई माइनिंग मोनोपोली?

news desk
Last updated: October 30, 2025 3:36 pm
news desk
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रेयर अर्थ मैटेरियल का तिलिस्म!
रेयर अर्थ मैटेरियल का तिलिस्म!
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सोचिए, अगर कल आपका स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक कार या MRI मशीन अचानक बंद हो जाए — तो क्या होगा? डरावना लगता है न? लेकिन यही हकीकत है क्योंकि भविष्य की हर टेक्नोलॉजी इस वक्त चीन के कंट्रोल में है. यानी मोनोपोली की कस्टडी में.

दरअसल, चीन ने अमेरिका के साथ चल रहे ट्रेड वॉर के बीच 12 Rare Earth Elements पर नए एक्सपोर्ट प्रतिबंध लगाए थे. 1 दिसंबर से यह नियम लागू होना था, जिससे पूरी दुनिया की सप्लाई चेन हिल सकती थी. लेकिन ट्रंप और शी जिनपिंग की हालिया मुलाकात के बाद दुनिया ने फिलहाल राहत की सांस ली है. बुसान में ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका चीन से आयातित वस्तुओं पर लगने वाले शुल्क को लगभग 57% से घटाकर 47% करने पर सहमत हुआ है. जवाब में चीन ने भरोसा दिया कि Rare Earth Minerals के निर्यात में अब कोई बाधा नहीं होगी. ट्रंप के शब्दों में — “All the rare earths has been settled.”

तो आखिर ये Rare Earths हैं क्या जिस पर दुनिया की नजर है?


धरती के भीतर पाई जाने वाली 17 विशेष धातुएं, जिन्हें हम Rare Earth Elements (REEs) कहते हैं. इनका इस्तेमाल आधुनिक टेक्नोलॉजी की लगभग हर चीज़ में होता है जैसे मैग्नेट्स और बैटरियां, स्मार्टफोन और टीवी स्क्रीन, विंड टर्बाइन और इलेक्ट्रिक वाहन, F-35 फाइटर जेट्स और पनडुब्बियां. सिर्फ़ एक F-35 जेट में लगभग 500 किलो Rare Earth Elements का इस्तेमाल होता है.

“Rare” नाम होने के बावजूद, ये धातुएं धरती में पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं. मुश्किल यह है कि इन्हें निकालना बेहद महंगा, प्रदूषणकारी और तकनीकी रूप से जटिल काम है. रेडियोएक्टिव कचरा, ज़हरीला पानी और भारी प्रदूषण के कारण पश्चिमी देशों ने धीरे-धीरे यह काम छोड़ दिया और यहीं से चीन की Rare Earth Monopoly की शुरुआत हुई.

1970 से आज तक: अमेरिका से चीन तक की यात्रा

1970 के दशक में Rare Earth उत्पादन में अमेरिका अग्रणी था. लेकिन जब पर्यावरणीय नियम सख्त हुए, अमेरिका ने धीरे-धीरे यह माइनिंग और प्रोसेसिंग चीन को सौंप दी. चीन ने कम नियमों, सस्ती लेबर और सरकारी सपोर्ट के ज़रिए इस क्षेत्र पर कब्ज़ा जमा लिया. आज चीन दुनिया के 60% Rare Earths की माइनिंग करता है और 90% से ज़्यादा की प्रोसेसिंग सिर्फ़ वही करता है. कुछ मेटल्स में तो चीन का कंट्रोल 100% तक है.

“The Middle East has oil, China has rare earths.” — Deng Xiaoping

1992 में चीन के नेता Deng Xiaoping ने यह ऐतिहासिक बात कही थी कि “मिडल ईस्ट के पास तेल है, और चीन के पास Rare Earths हैं”. आज वही भविष्यवाणी हकीकत बन चुकी है। चीन के पास दुनिया के लगभग 50% Rare Earth रिज़र्व्स हैं. लेकिन उसकी असली ताकत सिर्फ़ खदानों में नहीं — बल्कि पूरे सिस्टम में है. विश्वविद्यालयों में हज़ारों इंजीनियर हर साल Rare Earth टेक्नोलॉजी पर प्रशिक्षण लेते हैं. देशभर में कारखाने, रिसर्च लैब्स और इन धातुओं पर आधारित प्रोडक्ट्स का विशाल नेटवर्क है. यानी चीन के पास सिर्फ़ मटेरियल नहीं बल्कि पूरा इकोसिस्टम है।

क्या अमेरिका और यूरोप इसे तोड़ पाएंगे?

तकनीकी रूप से यह संभव है लेकिन राजनीतिक और पर्यावरणीय रूप से बेहद कठिन.
अमेरिका में कोई भी नागरिक अपने शहर के पास रेडियोएक्टिव वेस्ट नहीं चाहेगा और नई रिफाइनिंग तकनीक विकसित करने में कम से कम 10 साल लगेंगे.

हालांकि MP Materials जैसी अमेरिकी कंपनियां इस दिशा में काम कर रही हैं, और Pentagon ने इनमें निवेश भी किया है. लेकिन जब तक चीन सस्ता और स्थिर सप्लाई देता रहेगा, बाकी दुनिया उसी पर निर्भर रहेगी जैसा कि 2010 के जापान संकट के दौरान हुआ था. तब चीन ने एक्सपोर्ट रोक दिया, कीमतें आसमान छू गईं थी. कुछ महीनों बाद बाकी देशों ने वैकल्पिक स्रोत ढूंढे, पर अंततः फिर से चीन पर निर्भर हो गए क्योंकि चीन सबसे सस्ता और सबसे तेज़ सप्लायर था.

Rare Earths पर चीन की पकड़ सिर्फ़ मेटल्स की कहानी नहीं बल्कि भविष्य की सत्ता, तकनीकी श्रेष्ठता और भू-राजनीति की कहानी है. जो देश Rare Earths पर राज करेगा — वही भविष्य की टेक्नोलॉजी, रक्षा और अर्थव्यवस्था पर राज करेगा. आज चीन ने अमेरिका को अपने ही बनाए “मेटल ट्रैप” में फंसा लिया है. एक ऐसा जाल, जो Periodic Table से शुरू होकर White House तक फैल चुका है.

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