कटनी: करवा चौथ का दिन जहां सुहाग की लंबी उम्र की कामना के लिए जाना जाता है, वहीं मध्य प्रदेश के कटनी में एक पत्नी ने अपने पति को खोने के गम के बीच ऐसा फैसला लिया, जिसने मानवता की मिसाल पेश की है। पति सुनील कुमार ताम्रकार के निधन के बाद उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए पत्नी तृप्ति ताम्रकार ने उनके अंगदान के लिए सहमति दी। इस मुश्किल घड़ी में उनके बच्चों कुमकुम ताम्रकार और यश ताम्रकार ने भी मां के फैसले का पूरा समर्थन किया। अपनों को खोने का दर्द असहनीय होता है, लेकिन तृप्ति के इस निर्णय ने यह संदेश दिया कि किसी के जाने के बाद भी दूसरों को जीवन देने की उम्मीद कायम रह सकती है।
पति की अंतिम इच्छा के लिए पत्नी ने दिखाई हिम्मत
सुनील कुमार ताम्रकार को खोने के बाद तृप्ति ताम्रकार के परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। ऐसे समय में उन्होंने अपने पति की अंतिम इच्छा को प्राथमिकता देते हुए अंगदान का फैसला लिया। यह निर्णय उनके लिए भावनात्मक रूप से बेहद कठिन रहा होगा, लेकिन उन्होंने दुख की इस घड़ी में दूसरों की जिंदगी बचाने की संभावना को महत्व दिया।
तृप्ति के इस फैसले में उनके बच्चों कुमकुम और यश ने भी साथ दिया। दोनों ने अंगदान के निर्णय का समर्थन करते हुए अपनी सहमति दी। परिवार के इस सामूहिक फैसले ने अंगदान के महत्व और जरूरतमंद लोगों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश दिया।
अंगदान से दूसरों को मिल सकती है नई जिंदगी
अंगदान उन लोगों के लिए जीवन की नई उम्मीद बन सकता है, जो गंभीर बीमारियों के कारण अंग प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे हैं। किसी प्रियजन को खोने के दुख के बीच इस तरह का निर्णय लेना आसान नहीं होता। इसके बावजूद तृप्ति ताम्रकार और उनके परिवार ने परोपकार की भावना को आगे रखा।
सुनील कुमार ताम्रकार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दिए जाने की जानकारी दी गई है। उनका अंतिम संस्कार 29 अक्टूबर 2026 को कटनी के मुक्तिधाम में संपन्न हुआ। उनके अंगदान के लिए परिवार की सहमति ने उनके जाने के बाद भी दूसरों के जीवन में उम्मीद जगाने का संदेश दिया।
दुख की घड़ी में लिया फैसला, समाज को दिया संदेश
तृप्ति ताम्रकार का यह कदम केवल एक परिवार के निजी फैसले तक सीमित नहीं है। यह अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने और जरूरतमंद मरीजों की मदद के लिए आगे आने का संदेश भी देता है।
पति के निधन के बाद जिस समय परिवार अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था, उसी समय तृप्ति ने उनकी अंतिम इच्छा को पूरा करने का निर्णय लिया। उनके बच्चों ने भी इस फैसले में साथ देकर यह दिखाया कि दुख की घड़ी में भी मानवता और दूसरों के प्रति संवेदना को प्राथमिकता दी जा सकती है।