नई दिल्ली: अल नीनो का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए नई मौसमी चुनौती बन सकता है। मानसून में कम बारिश के बाद अब सर्दियों के तापमान, बारिश के पैटर्न और कृषि उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ रही है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, अल नीनो का प्रभाव 2026 के अंत तक और मजबूत हो सकता है तथा 2027 तक बना रह सकता है। यदि सर्दियों के आखिरी महीनों में तापमान सामान्य से अधिक रहता है, तो गेहूं की पैदावार पर भी असर पड़ने की आशंका है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव आने वाले महीनों की मौसमी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
2027 तक क्यों बना रह सकता है अल नीनो का असर?
अल नीनो प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ने से जुड़ी प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसका प्रभाव वैश्विक हवाओं, वायुमंडलीय परिसंचरण और बारिश के वितरण पर पड़ता है। इसी वजह से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कहीं सूखे, कहीं अत्यधिक गर्मी और कहीं असामान्य बारिश जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।
रिपोर्ट में WMO के आकलन का हवाला देते हुए कहा गया है कि अल नीनो 2026 के अंत तक अधिक तीव्र हो सकता है और उसका प्रभाव 2027 तक जारी रह सकता है। हालांकि, इसके असर की तीव्रता और अलग-अलग क्षेत्रों में मौसम की स्थिति एक जैसी नहीं होगी।
अल नीनो भारत के मानसून को कैसे प्रभावित करता है?
भारत में अल नीनो को लेकर खास सतर्कता बरती जाती है, क्योंकि इसके दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ने और बारिश में कमी आने की आशंका बढ़ सकती है। प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव से हवाओं और वायुमंडलीय परिसंचरण का वैश्विक पैटर्न प्रभावित होता है, जिसका असर भारतीय मानसून पर भी पड़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, बीते मानसून में देश में सामान्य से 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। बारिश की कमी का असर हर क्षेत्र में समान नहीं रहा। मध्य भारत में बारिश लगभग सामान्य रही, जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 26 प्रतिशत तथा दक्षिणी राज्यों में 24 प्रतिशत कम बारिश होने का उल्लेख किया गया है।
यदि आने वाले महीनों में गर्मी बढ़ती है और बारिश का वितरण भी असमान रहता है, तो जलाशयों, सिंचाई और खेती पर दबाव बढ़ सकता है।
सर्दियों में तापमान बढ़ने की आशंका, गेहूं पर क्या होगा असर?
अल नीनो को लेकर सबसे बड़ी चिंताओं में से एक सर्दियों के तापमान में संभावित बढ़ोतरी है। रिपोर्ट में दक्षिण एशियाई जलवायु परिदृश्य के आकलन का हवाला देते हुए कहा गया है कि अक्टूबर से दिसंबर 2026 के दौरान दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य या उससे अधिक रह सकता है।
यदि सर्दियों के अंतिम चरण में तापमान तेजी से बढ़ता है, तो गेहूं की फसल प्रभावित हो सकती है। गेहूं में दाने भरने के समय अधिक गर्मी पड़ने से पैदावार घटने का खतरा रहता है। इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले महीनों में तापमान कितना बढ़ता है और फसल के महत्वपूर्ण चरणों के दौरान मौसम कैसा रहता है।
जनवरी और फरवरी 2027 में मौसम की स्थिति पश्चिमी विक्षोभ जैसी प्रणालियों से भी प्रभावित होगी। इसलिए अभी से पूरे देश में सर्दियों के एक जैसे रहने या गेहूं की पैदावार में निश्चित गिरावट का दावा नहीं किया जा सकता।
दुनिया के कई हिस्सों में सूखा, बाढ़ और जंगलों में आग की चिंता
अल नीनो का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट में इंडोनेशिया में जंगलों की आग, पूर्वी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में सूखे और अन्य क्षेत्रों में बेमौसम भारी बारिश तथा बाढ़ जैसी स्थितियों का जिक्र किया गया है।
पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में उष्णकटिबंधीय तूफानों की गतिविधियों में बदलाव और अटलांटिक क्षेत्र में तूफान बनने की परिस्थितियों पर भी इसका असर पड़ सकता है। दक्षिण अमेरिका में अमेजन क्षेत्र के सूखे और कुछ निचले इलाकों में बाढ़ के खतरे को भी व्यापक जलवायु बदलावों से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि, इन सभी घटनाओं को केवल अल नीनो का परिणाम मानना सही नहीं होगा। स्थानीय मौसम प्रणालियां और अन्य जलवायु कारक भी इन परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
अल नीनो का संभावित प्रभाव भारत के लिए जल प्रबंधन, कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के लिहाज से अहम हो सकता है। यदि बारिश में कमी और सर्दियों में अधिक तापमान जैसी स्थितियां सामने आती हैं, तो किसानों को सिंचाई और फसल प्रबंधन में अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ सकती है।
ऐसे में मौसम के पूर्वानुमान के आधार पर समय पर कृषि सलाह जारी करना, पानी का बेहतर प्रबंधन करना और जरूरत के मुताबिक कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना उपयोगी कदम हो सकते हैं। फिलहाल सबसे जरूरी है कि मौसम संबंधी आधिकारिक पूर्वानुमानों पर नजर रखी जाए, क्योंकि अल नीनो का संभावित असर गंभीर चिंता जरूर है, लेकिन इसका वास्तविक रूप आने वाले महीनों की परिस्थितियों से स्पष्ट होगा।