लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रहरी चुनाव आयोग की एक लापरवाही पर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद तल्ख रुख अपनाया है। एक चुनावी विवाद की सुनवाई के दौरान जब आयोग के वकील ने टेबल पर यह चौंकाने वाली बात रखी कि री-काउंटिंग (पुनर्गणना) की मूल वीडियो रिकॉर्डिंग ही नहीं मिल रही है, तो सुप्रीम कोर्ट का पारा चढ़ गया। चुनाव कराने की जिम्मेदारी संभालने वाली संस्था अपने ही रिकॉर्ड को कैसे खो सकती है? अदालत ने आयोग की इस ढिलाई पर तीखे सवाल उठाते हुए न केवल कड़ी फटकार लगाई, बल्कि एक सख्त अल्टीमेटम भी दे दिया है कि अगर अगली तारीख तक पूरा रिकॉर्ड पेश नहीं हुआ, तो आयोग के खिलाफ ही प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) निकाल लिया जाएगा।
क्या है पूरा मामला
यह पूरा विवाद कर्नाटक की शृंगेरी विधानसभा सीट (2023) का है, जहाँ कांग्रेस के टीडी राजेगौड़ा ने बीजेपी के डीएन जीवराजा को 201 वोटों से हराया था। जीवराजा ने इस नतीजे को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी और डाक मतपत्रों (Postal Ballots) की गिनती में नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया।
6 अप्रैल 2026 को हाई कोर्ट ने खारिज किए गए 279 डाक मतपत्रों के री-वेरिफिकेशन और सभी डाक मतपत्रों की री-काउंटिंग का निर्देश दिया। मई में जब दोबारा गिनती हुई, तो बाजी ही पलट गई—राजेगौड़ा के 255 वैध वोट अमान्य कर दिए गए, और जीवराजा 52 वोटों की बढ़त के साथ विजेता घोषित हो गए।
सुप्रीम कोर्ट का दखल और राजेगौड़ा की बहाली
री-काउंटिंग के इस अप्रत्याशित फैसले के खिलाफ टीडी राजेगौड़ा सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। उनके वकीलों ने दलील दी कि रिटर्निंग ऑफिसर (RO) ने हाई कोर्ट के आदेश के दायरे से बाहर जाकर काम किया; कोर्ट ने सिर्फ खारिज मतपत्रों की जांच का आदेश दिया था, लेकिन अधिकारियों ने पहले से वैध घोषित मतपत्रों को भी अमान्य कर दिया।
11 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने माना कि रिटर्निंग ऑफिसर ने आदेश के दायरे से बाहर जाकर कदम उठाया। शीर्ष अदालत ने री-काउंटिंग के प्रभाव पर रोक लगाते हुए पहले वाली स्थिति बहाल कर दी, जिससे टीडी राजेगौड़ा फिलहाल विधायक के रूप में बहाल हो गए हैं। इस मामले में राजेगौड़ा के चुनाव एजेंट की शिकायत पर जीवराजा और कुछ अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) भी दर्ज हुई थी, जिस पर बाद में कर्नाटक हाई कोर्ट ने आगे की जांच पर रोक लगा दी थी।
रिकॉर्ड गायब होने पर कोर्ट की सख्त चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव कराना आयोग का मुख्य काम है और मतगणना/री-काउंटिंग की वीडियो रिकॉर्डिंग जैसे दस्तावेज बेहद महत्वपूर्ण साक्ष्य होते हैं, जिनसे प्रक्रिया की पारदर्शिता का पता चलता है।
अदालत ने आयोग के इस जवाब पर सख्त नाराजगी जताई कि ‘रिकॉर्ड खोजने की कोशिश की जा रही है’।अदालत ने कहा कि ऐसे कमजोर बहाने स्वीकार नहीं किए जाएंगे और आयोग को अगली सुनवाई पर उपलब्ध सभी रिकॉर्ड पेश करने का अंतिम निर्देश दिया।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की अहमियत को रेखांकित करती है। शृंगेरी विधानसभा सीट के नतीजे और री-काउंटिंग से जुड़े विवाद के बीच अब चुनाव आयोग को लापता वीडियो रिकॉर्डिंग समेत सभी उपलब्ध दस्तावेज पेश करने होंगे। अगली सुनवाई में रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किए जाने पर आयोग के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जा सकता है। अब सबकी नजर अदालत की अगली सुनवाई और चुनाव आयोग के जवाब पर है।