मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष का आज दिल्ली में मार्च प्रस्तावित है। कांग्रेस पार्टी के झंडों की जगह तिरंगा, दूसरे विपक्षी दलों की भागीदारी और वकीलों-सामाजिक संगठनों को आमंत्रण देकर आंदोलन को व्यापक रूप देने की कोशिश की जा रही है।
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर INDIA गठबंधन ने अपने विरोध प्रदर्शन की रणनीति में बदलाव किया है।
सोमवार, 12 अक्टूबर को दिल्ली में प्रस्तावित ‘चलो दिल्ली, मार्च फॉर डेमोक्रेसी’ के जरिए विपक्ष इस मुद्दे को केवल राजनीतिक दलों के आंदोलन तक सीमित रखने के बजाय व्यापक लोकतांत्रिक विरोध का रूप देना चाहता है।
इसके लिए पार्टी के झंडों की जगह तिरंगा लेकर मार्च निकालने और छात्र संगठनों, वकीलों तथा सामाजिक संगठनों को शामिल करने की योजना बनाई गई है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शन की रणनीति में यह बदलाव पिछले कुछ दिनों में दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों और उनमें युवाओं, वकीलों तथा अलग-अलग संगठनों की भागीदारी को देखते हुए किया गया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी वीडियो संदेश जारी कर सामाजिक संगठनों और अन्य लोगों से प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की है।
पार्टी के झंडों की जगह तिरंगा क्यों?
विपक्ष के प्रदर्शन की रणनीति में सबसे अहम बदलाव प्रतीकों को लेकर किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस की ओर से गठबंधन के नेताओं को संदेश दिया गया है कि वे पार्टी के झंडों के बजाय हाथों में तिरंगा लेकर मार्च में शामिल हों।
इसके पीछे उद्देश्य आंदोलन को किसी एक पार्टी के कार्यक्रम के बजाय लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े व्यापक अभियान के रूप में प्रस्तुत करना है। विपक्ष की कोशिश है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के समर्थकों के अलावा आम नागरिक, युवा और सामाजिक संगठनों के लोग भी जुड़ें।
पिछले प्रदर्शनों में कांग्रेस के झंडे अधिक दिखाई देने को लेकर INDIA गठबंधन के दूसरे दलों के बीच असहजता की चर्चा भी सामने आई थी। ऐसे में तिरंगे को केंद्र में रखकर प्रदर्शन की साझा पहचान बनाने की कोशिश की जा रही है।
TMC, सपा और वाम दलों की भागीदारी पर जोर
प्रदर्शन को व्यापक बनाने के लिए कांग्रेस ने INDIA गठबंधन के सहयोगी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी शामिल होने के लिए कहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस (TMC), समाजवादी पार्टी और वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं की भागीदारी पर जोर दिया गया है।
इस कदम का राजनीतिक महत्व भी है। पिछले कुछ दिनों के विरोध प्रदर्शनों में विपक्षी एकता को लेकर सवाल उठे थे, क्योंकि कई बड़े नेता प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए थे। ऐसे में सोमवार के मार्च के जरिए गठबंधन के भीतर एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की जा रही है।
हालांकि, अलग-अलग दलों की वास्तविक भागीदारी और नेताओं की मौजूदगी ही बताएगी कि विपक्ष इस साझा मंच को कितना प्रभावी बना पाता है।
युवाओं, वकीलों और सामाजिक संगठनों को जोड़ने की कोशिश
विपक्ष की बदली रणनीति का दूसरा बड़ा पहलू आंदोलन में गैर-राजनीतिक समूहों की भागीदारी बढ़ाना है। रिपोर्ट के मुताबिक, वकीलों और सामाजिक संगठनों को भी मार्च में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया है।
पिछले दिनों दिल्ली में अलग-अलग समूहों के विरोध प्रदर्शन और CJP के प्रदर्शन के आह्वान के बाद युवाओं की भागीदारी को लेकर चर्चा हुई थी। विपक्ष अब इसी तरह के व्यापक जनसमर्थन को अपने अभियान से जोड़ना चाहता है।
खास तौर पर Gen-Z यानी युवा वर्ग की भागीदारी पर जोर दिया जा रहा है। विपक्ष का उद्देश्य यह संदेश देना है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता, लोकतांत्रिक अधिकार और विरोध प्रदर्शन की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक दलों के नहीं, बल्कि आम नागरिकों से जुड़े मुद्दे हैं।
क्या है ‘चलो दिल्ली, मार्च फॉर डेमोक्रेसी’ का कार्यक्रम?
NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, INDIA गठबंधन का मार्च सोमवार दोपहर 2 बजे दिल्ली के बाराखंबा रोड से सुप्रीम कोर्ट की ओर प्रस्तावित है। इस प्रदर्शन का प्रमुख मुद्दा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग है।
कांग्रेस और उसके सहयोगी दल लोकतांत्रिक अधिकारों के कथित दमन, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई और चुनाव आयोग से जुड़े सवालों को लेकर सरकार तथा संबंधित संस्थाओं पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च निकालने और अदालत के समक्ष किसी मुद्दे को कानूनी रूप से उठाने के बीच अंतर है। प्रदर्शन का आयोजन अपने आप में किसी न्यायिक कार्यवाही या अदालत के हस्तक्षेप की गारंटी नहीं देता।
विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
विपक्ष की रणनीति में बदलाव का मकसद आंदोलन का दायरा बढ़ाना और इसे व्यापक नागरिक भागीदारी से जोड़ना है। लेकिन इसके सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, क्या INDIA गठबंधन के सभी प्रमुख दल एक मंच पर पर्याप्त संख्या में जुट पाएंगे? दूसरी, क्या युवा, वकील और सामाजिक संगठन इसे अपने मुद्दे के रूप में स्वीकार करके सक्रिय भागीदारी करेंगे?
यदि अलग-अलग विपक्षी दल साझा प्रतीकों और साझा मांगों के साथ आगे आते हैं, तो यह प्रदर्शन गठबंधन की एकजुटता दिखाने का अवसर बन सकता है। वहीं, यदि भागीदारी सीमित रहती है, तो रणनीति में बदलाव के बावजूद आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाना चुनौती बना रहेगा।
फिलहाल, ‘मार्च फॉर डेमोक्रेसी’ विपक्ष की उस कोशिश का हिस्सा है, जिसके जरिए चुनाव आयोग से जुड़े विवाद को राजनीतिक विरोध से आगे ले जाकर लोकतांत्रिक अधिकारों की बहस के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।