तेहरान ने साफ किया कि सभी शर्तें पूरी होने तक अमेरिका के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज नहीं खोला जाएगा। परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत से भी फिलहाल इनकार, कतर के जरिए दोनों देशों के बीच जारी है संदेशों का आदान-प्रदान…
नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने की उम्मीदों को एक बार फिर झटका लगा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है। ईरान ने अमेरिका की ओर से भेजे गए जवाब को अपर्याप्त बताते हुए फिलहाल आगे बातचीत करने से इनकार कर दिया है। तेहरान का कहना है कि उसने समझौते के लिए सात शर्तें रखी थीं, जिनमें से कुछ पर अमेरिका ने सहमति जताई है, लेकिन बाकी मुद्दों पर उसका रुख अब तक स्पष्ट नहीं है।
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रेजाई ने रविवार को कहा कि अमेरिकी जवाब उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है। ईरानी सरकारी मीडिया के मुताबिक, उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन को बाकी शर्तों पर अपना रुख स्पष्ट करना होगा। ईरान फिलहाल अमेरिका को कोई नया जवाब देने के मूड में नहीं है। ऐसे में होर्मुज को लेकर जारी गतिरोध जल्द खत्म होने के आसार कम दिखाई दे रहे हैं।
सात शर्तों पर क्यों फंसी है अमेरिका-ईरान वार्ता?
अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा विवाद केवल शर्तों को स्वीकार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात पर भी है कि समझौते की शुरुआत किस मुद्दे से होगी। पिछले सप्ताह एक अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया था कि दोनों देशों के बीच असली मतभेद इस बात को लेकर है कि कौन-सी शर्त पहले पूरी की जानी चाहिए।
ईरान चाहता है कि दोनों देश जून में हुए इस्लामाबाद समझौते के बेहतर स्वरूप की ओर लौटें। इस समझौते के तहत कुछ समय के लिए युद्ध रोकने की व्यवस्था बनी थी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के साथ ईरान के परमाणु कार्यक्रम जैसे अहम मुद्दे भी चर्चा में शामिल थे।
अमेरिका ने कतर के माध्यम से अपना जवाब ईरान तक पहुंचाया था। कतर दोनों देशों के बीच संदेशों के आदान-प्रदान में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। हालांकि, अब तक ऐसा कोई समझौता सामने नहीं आया है, जिससे होर्मुज को लेकर स्थिति सामान्य होने की पुष्टि हो सके।
परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत से ईरान का इनकार
होर्मुज के मुद्दे के साथ ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी अमेरिका के साथ विवाद की बड़ी वजह बना हुआ है। ईरान ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल वह इस विषय पर अमेरिका के साथ बातचीत नहीं कर रहा है।
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि अमेरिका के प्रस्तावों में ज्यादातर पुरानी मांगें शामिल हैं, जिनमें परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी शर्तें भी हैं। उन्होंने उन खबरों को भी गलत बताया, जिनमें दावा किया गया था कि ईरान प्रतिबंधों में राहत के बदले संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी एजेंसी को जांच की अनुमति देने के लिए तैयार है।
तेहरान का कहना है कि उसकी मौजूदा प्राथमिकता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सुरक्षा बहाल करना है। दूसरी ओर, अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध और नियंत्रण चाहता है। दोनों देशों के रुख में यही अंतर समझौते की राह में बड़ी बाधा बना हुआ है।
होर्मुज बंद होने से दुनिया पर क्या पड़ेगा असर?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक है। अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों से पहले, वैश्विक तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता था।
इस रास्ते पर आवाजाही बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है। इसका असर ऊर्जा की कीमतों, समुद्री परिवहन और उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है, जो खाड़ी क्षेत्र से होने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर हैं।
भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों के लिए भी होर्मुज की स्थिति अहम है। इस मार्ग पर लंबे समय तक व्यवधान रहने से तेल की कीमतों और आयात लागत पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि आपूर्ति कितनी प्रभावित होती है और वैकल्पिक मार्गों से कितनी भरपाई हो पाती है।
गलीबाफ ने भी दोहराया था ईरान का रुख
ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बघेर गलीबाफ ने 4 अक्टूबर को कहा था कि जून के इस्लामाबाद समझौते पर आधारित सभी सात शर्तें पूरी होने तक अमेरिका के लिए होर्मुज बंद रहेगा। उन्होंने अमेरिका पर एकतरफा मांगों के जरिए बातचीत को लंबा खींचने का आरोप भी लगाया था।
फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच किसी अंतिम समझौते की घोषणा नहीं हुई है। ईरान अपनी सभी शर्तें पूरी करने पर जोर दे रहा है, जबकि अमेरिका की परमाणु कार्यक्रम संबंधी मांगों पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद कायम हैं। ऐसे में होर्मुज का मुद्दा केवल क्षेत्रीय तनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।