नई दिल्ली। दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने और सुरक्षा प्रतिबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने केंद्र सरकार को मेट्रो का नियमित संचालन सुनिश्चित करने, इंटरनेट सेवा बहाल करने और दिल्ली में लगाए गए बैरिकेड्स हटाने के निर्देश दिए।
साथ ही, सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या 45 मेट्रो स्टेशनों पर लोगों के प्रवेश और निकास को बंद किया गया था। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया।
मेट्रो स्टेशनों को बंद करने पर केंद्र से जवाब तलब
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए लोगों के खिलाफ निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया। उन्होंने यह भी बताया कि जिन वकीलों को हिरासत में लिया गया था, उन्हें छोड़ दिया गया है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से अनुपालन हलफनामा दाखिल करने को कहा। अदालत ने विशेष रूप से यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि क्या 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास बंद किया गया था। केंद्र की ओर से बताया गया कि शनिवार रात 10 बजे से सभी मेट्रो स्टेशन खोल दिए गए थे और कुछ स्टेशनों पर प्रतिबंध सीमित समय के लिए लगाए गए थे।
अदालत ने कहा कि सभी मेट्रो स्टेशन लोगों की जरूरत के मुताबिक खुले रहने चाहिए। साथ ही, इंटरनेट सेवा बहाल करने और बैरिकेड्स हटाने के निर्देश भी दिए।
‘नागरिक अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाली एजेंसी नहीं है, लेकिन नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोगों के जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर अदालत मामले की तह तक जाएगी और सभी पक्षों को सुनने के बाद आदेश देगी।
एक याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि दिल्ली में शनिवार को लोगों को कई जगहों पर खड़े होने तक की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने इसे नागरिकों के अधिकारों का खुला उल्लंघन बताते हुए अदालत से कड़ा आदेश जारी करने की मांग की।
वकीलों ने हिरासत और पुलिस कार्रवाई पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि उन्हें प्रदर्शन से जुड़े घटनाक्रम के वीडियो और स्क्रीनशॉट पेनड्राइव में सौंपे गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर के दायरे से बाहर भी वकीलों समेत कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई और उन्हें हिरासत में लिया गया।
वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि कुछ वकील शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहे थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें घेर लिया और एक महिला पुलिसकर्मी ने उन्हें खींचा।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अन्य मौलिक अधिकारों से जुड़ा है। वकीलों ने दावा किया कि दिल्ली के अलावा गुरुग्राम और अन्य स्थानों से भी लोगों को हिरासत में लिया गया तथा हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या लगभग छह से सात हजार थी।
धारा 163 लागू करने पर भी उठा सवाल
सुनवाई के दौरान दिल्ली में निषेधाज्ञा लागू किए जाने और इसकी जानकारी नहीं दिए जाने का मुद्दा भी उठा। न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट किया कि धारा 163 लागू करने की सूचना व्यक्तिगत रूप से प्रत्येक व्यक्ति को देना आवश्यक नहीं होता।
वहीं, वरिष्ठ वकीलों ने पुलिस कार्रवाई और कथित बल प्रयोग को लेकर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि वह मामले की गंभीरता से परिचित है और नागरिकों के जीवन तथा स्वतंत्रता से जुड़े पहलुओं की जांच करेगी।
अवमानना याचिका पर सोमवार को सुनवाई का प्रस्ताव
सुनवाई के दौरान पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल एक याचिकाकर्ता की ओर से ऑनलाइन जुड़े। उन्होंने अदालत से नोटिस जारी करने का अनुरोध किया। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल का पक्ष सुनने के बाद इस पर विचार किया जाएगा।
अदालत ने कहा कि नए मामलों को सोमवार को सूचीबद्ध किया जा सकता है या पहले से सूचीबद्ध संबंधित मामलों के साथ उनकी सुनवाई की जा सकती है। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने विशेष सुनवाई के लिए अदालत का आभार जताया। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत हमेशा देश की सेवा के लिए तैयार है।
फिलहाल, सुनवाई का प्रमुख केंद्र दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान लगाए गए प्रतिबंध, मेट्रो और इंटरनेट सेवाओं का संचालन तथा नागरिकों के मौलिक अधिकार बने हुए हैं। केंद्र सरकार को अदालत के निर्देशों के अनुपालन के संबंध में हलफनामा दाखिल करना है।