क्या पश्चिम एशिया की सुलगती आग अब एक भयानक विश्वयुद्ध का रूप लेने वाली है? मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक समीकरणों में अचानक आए एक बड़े भूचाल ने पूरी दुनिया के कान खड़े कर दिए हैं। 7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्की (तुर्किए) और पाकिस्तान के बीच हुए ‘मक्का समझौते’ के बाद अब जंग के बादल और अधिक गहरे हो गए हैं। इस रणनीतिक समझौते के तहत पाकिस्तान ने खुलेआम ऐलान कर दिया है कि यदि सऊदी अरब की तरफ किसी ने आंख भी उठाई, तो उसकी रक्षा के लिए पाकिस्तान अपनी पूरी सैन्य ताकत झोंक देगा। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ के इस आक्रामक बयान ने पूरी दुनिया में खलबली मचा दी है।
ईरान से सीधी जंग मोल लेने की मंशा नहीं, पर सुरक्षा सबसे पहले
पाकिस्तान ने भले ही ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ के तहत सऊदी अरब की हिफाजत के लिए अपनी सैन्य क्षमताएं पूरी तरह झोंकने का ऐलान कर दिया हो, लेकिन साथ ही उसने यह भी सफाई दी है कि इस समझौते का उद्देश्य किसी खास देश, खासकर ईरान के खिलाफ मोर्चा खोलना नहीं है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ के मुताबिक, यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब पर लगातार बढ़ाए जा रहे हमलों के जवाब में यह कदम उठाना जरूरी हो गया था। हालांकि, इस्लामाबाद इस बात को लेकर बेहद सतर्क है कि वह सऊदी अरब की सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को पूरा करते-करते ईरान के साथ सीधे सैन्य टकराव में न उलझ जाए।
रियाद में हुई थी गुप्त और उच्चस्तरीय बैठक
रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का यह आक्रामक बयान पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के सेना प्रमुखों की रियाद में हुई उस गोपनीय बैठक के कुछ दिनों बाद आया है, जिसमें हूती हमलों का मुंहतोड़ जवाब देने पर लंबी चर्चा हुई थी।
हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ मिसाइल और ड्रोन हमलों को तेज कर दिया है और यमन के लाल सागर तट पर अपना नियंत्रण बढ़ा लिया है। इसी खतरे से निपटने के लिए हाल ही में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के शीर्ष राजनयिकों ने यूएन जनरल असेंबली से इतर एक विशेष बैठक की थी, जिसमें नए रक्षा समझौते को अमली जामा पहनाने की रणनीति पर मुहर लगी।
शांतिदूत बनने का दिखावा या परदे के पीछे बड़ी चाल?
एक तरफ पाकिस्तान सऊदी अरब को सैन्य रूप से खुला समर्थन दे रहा है, तो दूसरी तरफ वह खुद को ‘मध्यस्थ’ के रूप में पेश करने की कोशिश भी कर रहा है। रक्षा मंत्री आसिफ ने दावा किया है कि इस्लामाबाद ईरान से जुड़े संघर्ष को खत्म करने के लिए बातचीत का समर्थक है।
याद दिला दें कि इसी साल अप्रैल में पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच सीधी बातचीत की मेजबानी भी की थी, जिसके तहत जून में एक अंतरिम समझौते पर सहमति बनी थी। लेकिन, जैसे ही जमीन पर शत्रुता फिर से शुरू हुई, सारी समय-सीमाएं धरी की धरी रह गईं। अब मक्का समझौते के बाद पाकिस्तान के इस आक्रामक रुख से साफ है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया का रण बेहद भयानक होने वाला है।
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए सैन्य समर्थन का भरोसा दिया है, लेकिन ईरान के साथ सीधे टकराव से बचने और बातचीत के जरिए तनाव कम करने की बात भी कही है। ऐसे में पाकिस्तान के सामने सऊदी अरब के साथ रक्षा प्रतिबद्धताओं और क्षेत्रीय कूटनीति के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। आने वाले दिनों में इस समझौते का अमल और पश्चिम एशिया की स्थिति अहम रहेगी।