मुंबई: बॉलीवुड फिल्मों के पोस्टर्स में हीरो को सिगरेट के साथ दिखाने की पुरानी शैली पर फिल्ममेकर संजय गुप्ता ने सवाल उठाया है। उन्होंने 27 सितंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर रणबीर कपूर की ‘एनिमल’, रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ और विक्की कौशल की ‘लव एंड वॉर’ के पोस्टर्स का एक कोलाज साझा किया। तीनों पोस्टर्स में कलाकार सिगरेट पीते नजर आ रहे हैं। इसी को लेकर गुप्ता ने फिल्मों के दौरान दिखाए जाने वाले एंटी-स्मोकिंग संदेशों और पोस्टर्स में धूम्रपान के ग्लैमराइजेशन के बीच के अंतर पर तंज कसा।
संजय गुप्ता ने सवाल उठाया कि जब फिल्मों के पोस्टर्स में ही कलाकारों को सिगरेट के साथ स्टाइलिश अंदाज में पेश किया जाता है, तो सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले और उसके दौरान दिखाए जाने वाले एंटी-स्मोकिंग विज्ञापनों का क्या मतलब रह जाता है।
पोस्टर्स पर सवाल उठाए तो यूजर्स ने याद दिलाई ‘कांटे’
संजय गुप्ता की पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई। कुछ यूजर्स ने उनकी बात का समर्थन किया, जबकि कुछ ने उन्हें उनकी पुरानी फिल्म ‘कांटे’ की याद दिलाई। एक यूजर ने साल 2002 में रिलीज हुई इस फिल्म का उदाहरण देते हुए सवाल किया कि जब फिल्म के एक गाने में संजय दत्त को सिगरेट पीते दिखाया गया था, तो आज वह स्मोकिंग वाले पोस्टर्स पर सवाल क्यों उठा रहे हैं।
इस टिप्पणी के जरिए यूजर ने संजय गुप्ता के मौजूदा सवाल को उनकी पुरानी फिल्म से जोड़ते हुए इसे विडंबना बताया।
संजय गुप्ता ने दिया जवाब
यूजर की टिप्पणी पर संजय गुप्ता ने भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उस दौर में स्मोकिंग को लेकर आज जैसे नियम और जागरूकता संदेश मौजूद नहीं थे। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया में लिखा, “उस समय नो-स्मोकिंग एड नहीं होते थे, जीनियस।”
इस बहस में एक यूजर ने फिल्मों में सिगरेट को मर्दानगी से जोड़ने वाली सोच पर भी सवाल उठाया। उसके मुताबिक, फिल्मों में कई बार सिगरेट को पुरुष किरदार को ज्यादा मर्दाना या दमदार दिखाने के आसान तरीके के तौर पर पेश किया जाता है।
क्या सिगरेट को स्टाइलिश दिखाना क्रिएटिविटी का हिस्सा?
संजय गुप्ता की पोस्ट ने फिल्मों में धूम्रपान को किस तरह पेश किया जाता है, इस पर बहस छेड़ दी है। एक तरफ सिनेमाघरों में दर्शकों को धूम्रपान के नुकसान के बारे में जागरूक करने वाले संदेश दिखाए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ फिल्म के प्रचार से जुड़े पोस्टर्स में वही चीज स्टाइल और किरदार की छवि से जोड़कर दिखाई जाती है।
यही अंतर संजय गुप्ता के सवाल का आधार बना। बहस इस बात पर भी है कि फिल्म में किसी वस्तु को दिखाना और उसे आकर्षक या ग्लैमरस तरीके से पेश करना एक ही बात है या नहीं। सोशल मीडिया पर हुई चर्चा ने फिल्मों में धूम्रपान के चित्रण और रचनात्मक प्रस्तुति को लेकर सवाल खड़े किए हैं।