लखनऊ | उत्तर प्रदेश की राजनीति और समाजवाद का एक बड़ा स्तंभ ढह गया है। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता, पूर्व कैबिनेट मंत्री और विधानसभा में पूर्व नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी का शुक्रवार रात करीब 10:15 बजे लखनऊ के संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (PGI) में इलाज के दौरान निधन हो गया।
सपा के नवागत जिलाध्यक्ष सुनील कुमार मौर्य ने उनके निधन की पुष्टि करते हुए बताया कि पार्टी कार्यकर्ता व नेता उनके अंतिम दर्शनों के लिए लखनऊ रवाना हो रहे हैं। बलिया से लेकर उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों तक उनके निधन की खबर से शोक की लहर दौड़ गई है।
जेपी आंदोलन से 8 बार के विधायक तक का सफर
बलिया के गोसाईपुर गांव में जन्मे राम गोविंद चौधरी का राजनीतिक सफर जयप्रकाश नारायण (JP) के आंदोलन और छात्र राजनीति से शुरू हुआ था। एलएलबी (LLB) की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वकालत के साथ-साथ जनसेवा की राह चुनी।
- छात्र राजनीति और आपातकाल: मुरली मनोहर टाउन महाविद्यालय से छात्रसंघ राजनीति में कदम रखने वाले चौधरी ने आपातकाल के दौरान जेल की यातनाएं भी झेलीं।
- चंद्रशेखर को माना गुरु: वे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के करीबी और शिष्य माने जाते थे।
- 8 बार विधानसभा पहुंचे: उन्होंने 1977 में पहली बार चिलकहर सीट से चुनाव जीता। इसके बाद 1980, 1985, 1989, 1991 और बाद के वर्षों में बांसडीह सीट से कुल 8 बार विधायक निर्वाचित हुए।
मुलायम व अखिलेश सरकार में निभाई अहम भूमिका
समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव दोनों के ही वे बेहद करीबी व रणनीतिकार रहे।
- मुलायम मंत्रिमंडल (2003-2007): सपा की सरकार में उन्होंने मंत्री पद संभालते हुए कई महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व निभाया।
- अखिलेश मंत्रिमंडल (2012-2017): 2012 में बांसडीह से जीत दर्ज करने के बाद अखिलेश यादव सरकार में वे बेसिक शिक्षा व बाल विकास पोषण मंत्री रहे।
- नेता प्रतिपक्ष (2017-2022): 2017 में जब भाजपा सत्ता में आई, तो सपा ने विधानसभा में विपक्ष की कमान राम गोविंद चौधरी को सौंपी। बतौर नेता प्रतिपक्ष उन्होंने सदन में 943 प्रश्न और 50 से अधिक ज्वलंत मुद्दों पर चर्चाएं उठाकर सरकार को घेरा।
2022 में हार और एक युग का अंत
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बांसडीह सीट पर उन्हें भाजपा-निषाद पार्टी गठबंधन की प्रत्याशी केतकी सिंह से कड़े मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा था। उनके जाने से न केवल बलिया, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश ने एक बेबाक और निडर समाजवादी चेहरा खो दिया है।
