केंद्र सरकार के परिसीमन प्रस्ताव को लेकर तमिलनाडु की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सी. जोसफ विजय की अगुवाई में आयोजित एक अहम बैठक में केंद्र के इस कदम का कड़ा विरोध करने का एकमत से फैसला लिया गया। इस फैसले के तहत राज्य के राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए तमिलनाडु विधानसभा में जल्द ही एक विशेष सरकारी प्रस्ताव पेश किया जाएगा।
प्रमुख मांगें और मुख्य बिंदु
लोकसभा सीटों पर ‘स्थायी फ्रीज’: बैठक में यह मांग प्रमुखता से रखी गई कि संसद की कुल लोकसभा सीटों की संख्या को मौजूदा 543 पर ही हमेशा के लिए फ्रीज रखा जाए।
जनसंख्या नियंत्रण की सजा न मिले: नेताओं का कहना है कि यदि परिसीमन का आधार केवल आबादी को बनाया गया, तो तमिलनाडु जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों को राजनीतिक रूप से नुकसान होगा। इन राज्यों ने राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन नीतियों को सफलता से लागू किया है।
संसद में एकजुट विरोध: मुख्यमंत्री विजय ने राज्य के सभी सांसदों से अपील की है कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर तमिलनाडु के हितों की रक्षा करें। यदि केंद्र सरकार परिसीमन से जुड़ा कोई संविधान संशोधन विधेयक लाती है, तो संसद के भीतर उसके खिलाफ मतदान किया जाए।
परिसीमन आयोग के अधिकारों पर सवाल: नेताओं ने परिसीमन आयोग को मिलने वाली असीमित शक्तियों पर भी चिंता जताई और कहा कि इस प्रक्रिया में अंतिम निर्णय और अधिकार देश की संसद के पास ही होना चाहिए।
राज्य का सियासी परिदृश्य
इस बैठक ने तमिलनाडु के राजनीतिक समीकरणों को भी उजागर किया, राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टियों DMK और AIADMK ने मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई गई इस बैठक में हिस्सा नहीं लिया। इसके बावजूद कांग्रेस, विदुथलाई चिरुथिगल काची “VCK” और Left दलों के प्रतिनिधियों ने बैठक में शामिल होकर परिसीमन के खिलाफ एकजुट लड़ाई लड़ने की प्रतिबद्धता दोहराई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तमिलनाडु विधानसभा में प्रस्ताव पारित होने के बाद यह मुद्दा केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में भी इसकी गूंज सुनाई देगी।