नई दिल्ली: फिल्मों में जानवरों के किरदार कई बार इंसानी सितारों पर भारी पड़ते रहे हैं। ‘हाथी मेरे साथी’ से लेकर ‘तेरी मेहरबानियां’ और ‘एंटरटेनमेंट’ तक, दर्शकों ने पर्दे पर जानवरों की मासूमियत और वफादारी को खूब पसंद किया है। अमित राय की ‘ओह माय डॉग’ भी इसी सिलसिले को आगे बढ़ाती है। यहां कुत्ते सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि पूरी कहानी की भावनात्मक धुरी हैं। ऑस्कर और मोमो की मौजूदगी फिल्म को कई ऐसे पल देती है, जो इंसानी किरदारों से ज्यादा असर छोड़ते हैं।
दो बच्चों और उनके वफादार साथियों की कहानी
‘ओह माय डॉग’ की कहानी असम और बिहार में चल रही दो अलग-अलग कहानियों को एक-दूसरे से जोड़ती है। असम में रहने वाला तकनीक पसंद करने वाला बच्चा अप्पू अपने डॉग मोमो के साथ खुश है। दूसरी ओर बिहार में बाल मजदूरी करने वाला प्रिंस है, जिसकी जिंदगी में उसका वफादार साथी ऑस्कर बेहद खास है।
कहानी उस वक्त करवट लेती है, जब मोमो अचानक गायब हो जाता है और लगभग इसी दौरान प्रिंस का अपहरण हो जाता है। पुलिस दोनों मामलों में अपनी कार्रवाई करती है, लेकिन मामला यहीं नहीं रुकता। अप्पू अपने दोस्त मोमो की तलाश में निकल पड़ता है, वहीं ऑस्कर भी अपने मालिक तक पहुंचने के लिए तमाम मुश्किलों का सामना करता है।
कुत्ते की तलाश से खुलता है अपराध का काला संसार
शुरुआत में दोस्ती और भावनाओं की कहानी लगने वाली फिल्म धीरे-धीरे सस्पेंस और रोमांच का रूप ले लेती है। कहानी डॉग मीट रैकेट, पशु तस्करी, बाल मजदूरी और अंग तस्करी जैसे गंभीर मुद्दों तक पहुंचती है।
अमित राय ने इन विषयों को सिर्फ सनसनी पैदा करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया है। फिल्म इनके जरिए उस दुनिया को सामने लाने की कोशिश करती है, जहां गरीबी और लालच के बीच इंसान और जानवर दोनों ही सौदे का हिस्सा बन जाते हैं।
सबसे बड़ा सवाल- इंसान ज्यादा इंसान है या जानवर?
फिल्म की सबसे मजबूत बात उसका यही सवाल है कि असली इंसानियत आखिर किसमें है। एक तरफ वह बेजुबान जानवर है, जो अपने मालिक का साथ छोड़ने को तैयार नहीं है और दूसरी तरफ ऐसे इंसान हैं, जो पैसे के लिए इंसान और जानवर दोनों का सौदा करने से पीछे नहीं हटते।
अमित राय ने कहानी को केवल बच्चों के मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा। फिल्म में सामाजिक सरोकार भी हैं और इसी वजह से यह बड़ों को भी सोचने के लिए मजबूर करती है।
कई मुद्दे एक साथ, यहीं थोड़ी कमजोर पड़ती है कहानी
फिल्म की महत्वाकांक्षा कई जगह इसकी कमजोरी बन जाती है। पशु तस्करी, बाल मजदूरी, अंग तस्करी, पारिवारिक रिश्ते, दोस्ती, सामाजिक संदेश और महाभारत के संदर्भों को एक साथ कहानी में जगह दी गई है।
इतने सारे विषयों के बीच फिल्म कुछ हिस्सों में अपनी मूल भावनात्मक कहानी से दूर जाती नजर आती है। अगर इंसान और कुत्ते के रिश्ते को थोड़ा ज्यादा केंद्र में रखा जाता तो कहानी का भावनात्मक असर और गहरा हो सकता था।
तकनीकी पक्ष मजबूत, कुत्ते के नजरिए वाले दृश्य खास
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी प्रभावशाली है। कैमरा सिर्फ खूबसूरत दृश्य दिखाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कहानी का माहौल बनाने में भी भूमिका निभाता है। खास तौर पर कुत्ते के नजरिए से फिल्माए गए दृश्य कहानी को अलग अनुभव देते हैं।
चेज सीक्वेंस में भी तकनीकी काम दिखाई देता है। वहीं बैकग्राउंड संगीत भावनात्मक और रोमांचक दृश्यों को मजबूती देता है। हालांकि फिल्म के गाने ऐसी छाप नहीं छोड़ पाते, जो कहानी खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक याद रहे।
माही राय ने पहली फिल्म में छोड़ी छाप
माही राय फिल्म की भावनात्मक धुरी हैं। अपने डॉग के लिए उनकी मासूमियत, जिद और बेचैनी पर्दे पर स्वाभाविक लगती है। पहली फिल्म में उनका आत्मविश्वास और अभिनय भविष्य के लिए उम्मीद जगाता है।
पंकज त्रिपाठी अपने सहज अंदाज में नजर आते हैं, लेकिन उनके किरदार को पटकथा में उतनी जगह नहीं मिलती, जितनी उससे उम्मीद की जा सकती थी। पवन मल्होत्रा की मौजूदगी कहानी में नई ऊर्जा लाती है। राजेश कुमार, विजय मिश्रा और गीता अग्रवाल भी अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं।
ऑस्कर और मोमो ही फिल्म के असली सितारे
फिल्म के सबसे यादगार कलाकारों की बात करें तो यहां किसी इंसानी कलाकार का नाम सबसे पहले नहीं आता। ऑस्कर और मोमो अपने अभिनय और स्क्रीन पर सहज मौजूदगी से पूरी फिल्म पर छा जाते हैं।
उनके हाव-भाव कई बार बिना एक शब्द बोले वह बात कह देते हैं, जिसे इंसानी किरदार संवादों के जरिए समझाते हैं। दोनों डॉग्स की ट्रेनिंग और कैमरे के सामने उनकी सहजता फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल है।
लंबाई और कमजोर एडिटिंग ने बिगाड़ा असर
‘ओह माय डॉग’ की सबसे बड़ी कमियों में इसकी लंबाई शामिल है। पहले हिस्से में कहानी रफ्तार बनाए रखती है, लेकिन इंटरवल के बाद कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा खिंचे हुए महसूस होते हैं।
चेज सीक्वेंस लंबे हो जाते हैं और कुछ भावनात्मक दृश्यों में भी कसावट की कमी दिखाई देती है। अगर संपादन के दौरान करीब 20 से 25 मिनट कम किए जाते तो फिल्म ज्यादा चुस्त और प्रभावी बन सकती थी।
पटकथा में कई जगह सुविधाजनक घटनाक्रम
फिल्म की पटकथा भी हर जगह बराबर मजबूत नहीं रहती। कुछ घटनाएं कहानी की जरूरत के मुताबिक सुविधाजनक ढंग से घटती हुई लगती हैं। पुलिस जांच के कई हिस्से भी वास्तविक जांच से ज्यादा कहानी को आगे बढ़ाने का जरिया बनकर रह जाते हैं।
कुछ किरदारों की पृष्ठभूमि को पर्याप्त विस्तार नहीं मिलता, इसलिए उनके फैसलों और व्यवहार का असर उतनी गहराई से सामने नहीं आ पाता।
महाभारत के संदर्भ दिलचस्प, लेकिन पूरी तरह सहज नहीं
फिल्म में महाभारत के संदर्भों का इस्तेमाल किया गया है। ये हिस्से विचार के स्तर पर दिलचस्प हैं, लेकिन कहानी में उनका जुड़ाव हर जगह स्वाभाविक नहीं लगता। कुछ दृश्यों में ऐसा महसूस होता है कि इन प्रतीकों को कहानी को अतिरिक्त गहराई देने के लिए जोड़ा गया है।
पशु और अंग तस्करी जैसे गंभीर अपराधों के पीछे मौजूद नेटवर्क को भी फिल्म छूती है, लेकिन उसकी भयावहता को पूरी तरह विस्तार नहीं देती। इस हिस्से पर ज्यादा काम होता तो फिल्म का रोमांच और मजबूत हो सकता था।
क्या ‘ओह माय डॉग’ देखनी चाहिए?
‘ओह माय डॉग’ सिर्फ एक बच्चे और उसके कुत्ते की कहानी नहीं है। यह वफादारी, दोस्ती, लालच और इंसानियत के बीच का फर्क दिखाने की कोशिश करती है। फिल्म की कहानी कई जगह भटकती है, लंबाई खलती है और पटकथा में कसावट की कमी दिखाई देती है, लेकिन इसकी भावनात्मक ईमानदारी और ऑस्कर-मोमो की शानदार मौजूदगी कमजोरियों को काफी हद तक संभाल लेती है।
अगर आपके घर में कभी कोई पालतू जानवर रहा है या आप जानवरों के साथ भावनात्मक रिश्ता महसूस करते हैं, तो इस फिल्म का असर आप पर ज्यादा गहरा हो सकता है।
फिल्म: Oh My Dog (2026)
निर्देशक: अमित राय
गीतकार: गुरु ठाकुर, अखिल तिवारी
संगीतकार: अमन पंत
कलाकार: माही राय, पंकज त्रिपाठी, पवन मल्होत्रा, ऑस्कर, मोमो
रेटिंग: 2.5/5