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Birthday Special: टीम इंडिया का वो कप्तान जिसने विदेश में लड़ना सिखाया! “दादा” की जिद ने बदले भारतीय क्रिकेट के दिन

Chaturvedi Shruti V.
Last updated: July 8, 2026 1:51 pm
Chaturvedi Shruti V.
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Contents
1992 में जब टीम को पानी पिलाने से किया इनकारकोलकाता के ठाठ से क्रिकेट के मैदान तक1996 की ऐतिहासिक वापसी और लगातार दो शतक‘ऑफ साइड के भगवान’ की पदवी2002- 2003 में जर्सी लहरा कर ऑस्ट्रेलिया को दिया था करारा जवाबसहवाग, हरभजन और युवराज को तराशने का रोलधोनी को मिली गांगुली की बनाई टीमविज्ञापन की दुनिया में भी आज भी बरकरार है जलवा

Highlights

  • 1992 में ‘पानी पिलाने’ विवाद से लेकर भारतीय क्रिकेट के ‘दादा’ बनने तक का सफर
  • लॉर्ड्स टेस्ट डेब्यू में शतक, लगातार दो टेस्ट सेंचुरी से दुनिया को चौंकाया
  • कप्तान बनकर टीम इंडिया को निडर बनाया, विदेशों में जीतना सिखाया
  • सहवाग, युवराज, हरभजन और धोनी जैसे सितारों के करियर को नई उड़ान दी

भारतीय क्रिकेट इतिहास में जब भी बदलाव और निडरता की बात होगी, एक नाम सबसे पहले जेहन में आएगा सौरव चंडीदास गांगुली। कोलकाता के एक समृद्ध परिवार में जन्मा एक लड़का, जो आगे चलकर भारतीय क्रिकेट का ‘बंगाल टाइगर’ और करोड़ों फैंस का चहेता ‘दादा’ बना। 8 जुलाई को अपना 54वां जन्मदिन मना रहे सौरव गांगुली का सफर सिर्फ चौके-छक्कों या रिकॉर्ड्स तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कहानी है उस जिद की जिसने भारतीय क्रिकेट की पूरी तकदीर बदल दी।

1992 में जब टीम को पानी पिलाने से किया इनकार

यह बात साल 1992 की है, जब वेस्टइंडीज के दौरे पर एक 19 साल के युवा खिलाड़ी को भारतीय टीम में शामिल किया गया था। वह खिलाड़ी थे सौरव गांगुली। ब्रिस्बेन में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उन्होंने अपना एकमात्र वनडे मैच खेला और सिर्फ 3 रन बनाकर आउट हो गए। इसके बाद उन्हें टीम से ड्रॉप कर दिया गया।

लेकिन इस ड्रॉप के पीछे सिर्फ उनका खेल नहीं, बल्कि एक बड़ा विवाद था। उस दौरे पर सौरव गांगुली पर यह आरोप लगा कि उन्होंने बेहद घमंडी रवैया दिखाया और मैदान पर साथी खिलाड़ियों को ‘पानी पिलाने’ से साफ मना कर दिया। उस समय की मीडिया और क्रिकेट गलियारों में इस बात को लेकर गांगुली की तीखी आलोचना हुई। आलोचकों ने कहा कि एक रईस घराने के लड़के में अनुशासन की कमी है और इसका क्रिकेट करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो चुका है।

लेकिन गांगुली ने कभी इस बात को स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि उनके स्वाभिमान को गलत तरीके से पेश किया गया। हालांकि, इस पूरे विवाद पर उस समय के कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन ने सौरव गांगुली का खुलकर समर्थन किया। अज़हरुद्दीन का मानना था कि गांगुली एक बहुत ही अनुशासित, शालीन और शानदार खिलाड़ी थे। उन्होंने गांगुली के खिलाफ उड़ीं इन सभी अनुशासनात्मक अफवाहों को पूरी तरह से झूठा और बेबुनियाद बताया। इस विवाद ने गांगुली को टीम से पूरे चार साल के लिए दूर कर दिया, लेकिन इस दौरान उनके भीतर का ‘बदले का शेर’ जाग चुका था।

कोलकाता के ठाठ से क्रिकेट के मैदान तक

सौरव गांगुली का पूरा नाम “सौरव चंडीदास गांगुली” है, 8 जुलाई 1972, कोलकाता में जन्म हुआ था, उनके माँ का नाम निरूपा गांगुली और पिता चंडीदास गांगुली जो की कोलकाता के बेहद समृद्ध और प्रिंटिंग बिजनेस के बड़े कारोबारी थे सौरव ने 11 जनवरी 1992 में वनडे बनाम वेस्टइंडीज अंतरराष्ट्रीय से क्रिकेट में डेब्यू किया और फिर वो 20 जून 1996 (टेस्ट बनाम इंग्लैंड) का मैच खेल कर अपने करियर की शुरुआत की, जिसके बाद वो दादा, प्रिंस ऑफ कोलकाता, बंगाल टाइगर, ऑफ साइड के भगवान के नाम से फेमस हुए।

कुल अंतरराष्ट्रीय रन: 18,500 से अधिक (113 टेस्ट में 7,212 रन और 311 वनडे में 11,363 रन)

कुल अंतरराष्ट्रीय शतक: 38 (16 टेस्ट, 22 वनडे)

प्रमुख सम्मान: अर्जुन पुरस्कार (1997), पद्म श्री (2004), बंग विभूषण (2013)

1996 की ऐतिहासिक वापसी और लगातार दो शतक

चार साल की कड़ी मेहनत और घरेलू क्रिकेट में रनों का पहाड़ खड़ा करने के बाद साल 1996 में गांगुली की भारतीय टेस्ट टीम में वापसी हुई। जगह थी क्रिकेट का मक्का कहा जाने वाला ‘लॉर्ड्स का मैदान’ और सामने थी इंग्लैंड की खतरनाक गेंदबाजी।

गांगुली ने मैदान पर उतरते ही उन सभी आलोचकों के मुंह बंद कर दिए जिन्होंने चार साल पहले उनका करियर खत्म मान लिया था। अपने पहले ही टेस्ट मैच की पहली पारी में गांगुली ने शानदार 131 रन ठोक दिए। लॉर्ड्स के मैदान पर डेब्यू मैच में शतक लगाने वाले वह इतिहास के गिने-चुने बल्लेबाजों में शामिल हो गए।

लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी। इसके ठीक बाद ट्रेंट ब्रिज में खेले गए दूसरे टेस्ट मैच में भी गांगुली ने बल्ला घुमाया और लगातार दूसरा शतक ‘136 रन’ जड़ दिया। अपने शुरुआती दो टेस्ट मैचों में लगातार दो शतक लगाकर गांगुली ने दुनिया को बता दिया कि कोलकाता का यह प्रिंस अब विश्व क्रिकेट पर राज करने आया है।

‘ऑफ साइड के भगवान’ की पदवी

सौरव गांगुली की बल्लेबाजी की सबसे बड़ी खासियत थी उनकी टाइमिंग, विशेषकर ऑफ साइड में उनका खेल। जब गांगुली क्रीज से थोड़ा बाहर निकलकर पॉइंट और कवर्स के बीच से ड्राइव लगाते थे, तो गेंद गोली की रफ्तार से बाउंड्री के बाहर जाती थी।

उनकी इस लाजवाब कला को देखकर भारतीय क्रिकेट के महान बल्लेबाज राहुल द्रविड़ ने एक बार कहा था: “ऑफ साइड पर पहले भगवान हैं, और उसके बाद सौरव गांगुली हैं।”

तभी से गांगुली को ‘गॉड ऑफ द ऑफ साइड’ कहा जाने लगा। स्पिनर्स के खिलाफ कदमों का इस्तेमाल करके सीधे छक्के मारना उनकी एक और ऐसी कला थी जिसका तोड़ दुनिया के किसी गेंदबाज के पास नहीं था।

2002- 2003 में जर्सी लहरा कर ऑस्ट्रेलिया को दिया था करारा जवाब

सौरव गांगुली के कप्तानी दौर का सबसे प्रतिष्ठित पल 13 जुलाई 2002 को आया, जब भारत ने लॉर्ड्स में नेटवेस्ट सीरीज के फाइनल में इंग्लैंड को हराया और जीत मिलते ही उन्होंने ऐतिहासिक बालकनी में खड़े होकर फ्लिंटॉफ को जवाब देने के लिए अपनी जर्सी हवा में लहरा दी। इस आक्रामकता के बाद दादा का एक और यादगार रूप साल 2003 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर ब्रिस्बेन टेस्ट में देखने को मिला।

विदेशी पिचों और शॉर्ट-पिच गेंदों पर कमजोर होने के सभी आरोपों को खारिज करते हुए उन्होंने कंगारू गेंदबाजों के खिलाफ एक कड़क और ऐतिहासिक शतक (144 रन) जड़ दिया। ऑस्ट्रेलिया की धरती पर खेली गई उनकी इस साहसी पारी ने पूरी सीरीज का रुख बदल दिया और यह साबित कर दिया कि टीम इंडिया अब दुनिया के सबसे खतरनाक क्रिकेट गढ़ में भी सीना तानकर लड़ सकती है।

सहवाग, हरभजन और युवराज को तराशने का रोल

साल 2000 में जब भारतीय क्रिकेट मैच फिक्सिंग के काले साए में डूबा हुआ था, तब सौरव गांगुली को टीम की कमान सौंपी गई। गांगुली ने एक कप्तान के तौर पर सबसे बड़ा काम यह किया कि उन्होंने टीम को मैच जीतने वाले खिलाड़ी दिए। उन्होंने खिलाड़ियों के भीतर से हार का डर निकाल दिया।

गांगुली ने कई युवा प्रतिभाओं को पहचान कर उन्हें निखारा, जिनमें से तीन नामों ने भारतीय क्रिकेट का इतिहास बदल दिया:

वीरेंद्र सहवाग: सहवाग शुरुआत में मिडिल ऑर्डर में खेलते थे। यह गांगुली का विजन था जिन्होंने सहवाग की आक्रामकता को देखा और उन्हें टेस्ट और वनडे में ओपनिंग करने के लिए भेजा। गांगुली ने सहवाग से कहा था, “तुम जाकर अपना नेचुरल गेम खेलो, अगर तुम फ्लॉप भी हुए तो मैं तुम्हें टीम से बाहर नहीं होने दूंगा।” इसी भरोसे ने दुनिया को वीरेंद्र सहवाग जैसा खतरनाक ओपनर दिया।

हरभजन सिंह: साल 2001 की ऐतिहासिक बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी से पहले चयनकर्ता हरभजन सिंह को टीम में शामिल करने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन गांगुली अड़ गए। उन्होंने चयनकर्ताओं से साफ कह दिया कि अगर हरभजन टीम में नहीं होंगे, तो वह भी कप्तानी नहीं करेंगे। नतीजा यह हुआ कि हरभजन ने उस सीरीज में 32 विकेट झटके और ऑस्ट्रेलिया के विजय रथ को रोक दिया।

युवराज सिंह : साल 2000 के नॉकआउट टूर्नामेंट में गांगुली ने पंजाब के इस युवा लड़के पर दांव खेला। युवराज सिंह को लगातार मौके देकर गांगुली ने एक ऐसा मिडिल ऑर्डर बल्लेबाज तैयार किया जिसने आगे चलकर भारत को दो वर्ल्ड कप (2007 और 2011) जिताए।

इनके अलावा एमएस धोनी, जहीर खान और आशीष नेहरा जैसे दिग्गजों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शुरुआती सहारा और भरोसा सौरव गांगुली ने ही दिया था।

धोनी को मिली गांगुली की बनाई टीम

क्रिकेट इतिहास में महेंद्र सिंह धोनी को भारत का सबसे सफल कप्तान माना जाता है, जिन्होंने भारत को आईसीसी की तीनों बड़ी ट्रॉफियां (टी20 वर्ल्ड कप, 50-ओवर वर्ल्ड कप और चैंपियंस ट्रॉफी) जिताईं। लेकिन इस बात को खुद धोनी और तमाम क्रिकेट पंडित भी स्वीकार करते हैं कि धोनी को जो टीम मिली थी, उसकी मजबूत नींव सौरव गांगुली ने रखी थी।

गांगुली ने अपनी कप्तानी के दौरान जो ‘लड़ाकू और निडर’ खिलाड़ी तैयार किए थे, वे साल 2007 से लेकर 2011 तक अपने करियर के चरम पर थे। सचिन, द्रविड़ और लक्ष्मण जैसे दिग्गजों के अनुभव के साथ-साथ गांगुली द्वारा तैयार किए गए युवा शेर “युवराज, सहवाग, हरभजन, जहीर और खुद धोनी” इस टीम का हिस्सा थे।

गांगुली ने भारतीय टीम को विदेशों में जीतना सिखाया, लॉर्ड्स की बालकनी में शर्ट लहराकर अंग्रेजों को उनकी औकात दिखाई और टीम में यह भरोसा पैदा किया कि हम दुनिया की किसी भी टीम को हरा सकते हैं। धोनी ने इसी गांगुली मार्का निडर मानसिकता और तैयार फौज का इस्तेमाल कर भारतीय क्रिकेट को सफलता के शिखर पर पहुंचाया।

विज्ञापन की दुनिया में भी आज भी बरकरार है जलवा

मैदान से संन्यास लेने और बाद में BCCI के अध्यक्ष के रूप में प्रशासनिक पारी संभालने के बाद भी गांगुली का क्रेज कम नहीं हुआ है। विज्ञापन की दुनिया में भी वह आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं। चाहे वह पेप्सी का भावुक कर देने वाला विज्ञापन हो जिसमें उन्होंने कहा था—”उम्मीद है आपने मुझे भुलाया नहीं होगा” या फिर हाल के दिनों में उनका पुलिस अफसर का कड़क रोल, या फिर गूगल के विज्ञापनों में ‘गांगुली’ को ‘गुगली’ के रूप में पेश करना। ब्रांड्स आज भी उनके उसी रौब, कप्तानी वाले अंदाज और हाजिरजवाबी के कायल हैं।

सौरव गांगुली का पूरा जीवन इस बात का सबूत है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत हों, अगर आपके पास खुद पर भरोसा और लड़ने का जज्बा है, तो आप इतिहास के पन्नों पर अपना नाम अमर कर सकते हैं। पानी पिलाने के विवाद से शुरू हुआ सफर ‘ऑफ साइड के भगवान’ और भारतीय क्रिकेट के सबसे महान मार्गदर्शक पर जाकर खत्म हुआ।

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