नई दिल्ली: आसमान में बादल छा जाने के बाद ज्यादातर लोगों को उम्मीद होती है कि मौसम ठंडा हो जाएगा और गर्मी से राहत मिलेगी। लेकिन कई बार इसके उलट बिना तेज धूप के भी शरीर से लगातार पसीना निकलता रहता है और उमस इतनी बढ़ जाती है कि कुछ देर बाहर रहना भी मुश्किल हो जाता है। इसके पीछे सिर्फ तापमान नहीं, बल्कि हवा में मौजूद नमी और शरीर की प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया जिम्मेदार होती है।
बादल होने के बावजूद क्यों आता है पसीना?
मानव शरीर का सामान्य तापमान करीब 37 डिग्री सेल्सियस होता है। जब शरीर का तापमान बढ़ने लगता है तो त्वचा में मौजूद स्वेद ग्रंथियां सक्रिय होकर पसीना निकालती हैं। यह शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने की प्रक्रिया है। जैसे किसी गर्म कमरे का तापमान कम करने के लिए निकास व्यवस्था काम करती है, उसी तरह शरीर पसीने के जरिए अतिरिक्त गर्मी बाहर निकालने की कोशिश करता है।
हालांकि केवल गर्मी ही पसीना आने की वजह नहीं होती। बारिश से पहले या बादलों के दौरान हवा में जलवाष्प की मात्रा काफी बढ़ जाती है। इसी बढ़ी हुई नमी के कारण त्वचा से निकलने वाला पसीना आसानी से नहीं सूख पाता और शरीर पर चिपका रहता है।
उमस बढ़ने के पीछे क्या है वैज्ञानिक कारण?
सामान्य परिस्थितियों में पसीना त्वचा से वाष्प बनकर उड़ जाता है, जिससे शरीर का तापमान कम होता है और ठंडक महसूस होती है। लेकिन जब वातावरण पहले से ही नमी से भरा हो, तब पसीने का वाष्पीकरण धीमा हो जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि शरीर लगातार चिपचिपा महसूस करता है, कपड़े गीले होने लगते हैं और उमस पहले से ज्यादा परेशान करने लगती है।
बादल और उमस का आपस में क्या संबंध है?
बादल सूरज की कुछ किरणों को जरूर रोकते हैं, लेकिन वे हवा में मौजूद नमी को कम नहीं करते। कई बार बारिश से पहले वातावरण में नमी तेजी से बढ़ जाती है। यदि इस दौरान हवा की गति भी कम हो, तो पसीना सूखने की प्रक्रिया लगभग रुक जाती है। यही वजह है कि बादलों वाले दिन भी तेज धूप जैसी बेचैनी और गर्मी महसूस हो सकती है।
लगातार उमस का शरीर पर क्या असर पड़ता है?
जब लंबे समय तक उमस बनी रहती है, तो शरीर को खुद को ठंडा रखने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। इससे जरूरत से ज्यादा पसीना निकलता है और शरीर से पानी के साथ जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स भी कम होने लगते हैं। ऐसी स्थिति में थकान, कमजोरी, सिरदर्द, चक्कर आना और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
बुजुर्गों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों पर इसका असर अपेक्षाकृत अधिक पड़ सकता है। यदि लंबे समय तक गर्म और अत्यधिक नम वातावरण में रहा जाए तो हीट एक्सहॉशन और हीट स्ट्रेस जैसी गंभीर स्थितियों का खतरा भी बढ़ सकता है।