पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बीच सियासी तस्वीर तेजी से बदलती नजर आ रही है। ताजा रुझानों में Bharatiya Janata Party को बढ़त मिलती दिख रही है, जिससे राज्य में बड़ा राजनीतिक बदलाव संभव माना जा रहा है।
अगर ये रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली All India Trinamool Congress के लंबे शासन पर असर पड़ सकता है। ममता बनर्जी करीब डेढ़ दशक से राज्य की सत्ता में हैं और उनकी पार्टी का मजबूत आधार रहा है।
वहीं, भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए लगातार प्रयास किए हैं। प्रधानमंत्री Narendra Modi और गृह मंत्री Amit Shah की रणनीति के चलते पार्टी यहां मुख्य मुकाबले में आई है। हालांकि, अंतिम नतीजे आने तक तस्वीर पूरी तरह साफ होना बाकी है और राजनीतिक समीकरण बदल भी सकते हैं।
पश्चिम बंगाल की सियासत में आज एक नया इतिहास रचा जा रहा है। साल 2011 में जिस ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे ने 34 साल के वामपंथी शासन का अंत किया था, आज उसी नारे की प्रणेता ममता बनर्जी को जनता ने सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। 15 सालों के टीएमसी शासन के बाद बंगाल में एक बार फिर ‘परिवर्तन’ की लहर बही है और भारतीय जनता पार्टी (BJP) पहली बार ऐतिहासिक जीत के साथ सरकार बनाने की ओर बढ़ रही है।
90 के दशक में 1 विधायक, आज सरकार बनाने की तैयारी
जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के गृह राज्य में कमल खिलाना भाजपा का दशकों पुराना सपना रहा है। 90 के दशक में जहाँ बंगाल विधानसभा में भाजपा का मात्र एक विधायक (बादल भट्टाचार्य) हुआ करता था, आज वह दल पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता संभालने जा रहा है। इस जीत के साथ ही पूर्वी भारत के तीन महत्वपूर्ण राज्यों—अंग (बिहार), कलिंग (ओडिशा) और बंग (बंगाल) में भाजपा की विजय का चक्र पूरा हो गया है।
ममता बनर्जी की हार के 5 बड़े कारण
- भ्रष्टाचार और बेरोजगारी पर जनता का प्रहार
सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन से उपजी ममता सरकार के 15 वर्षों में राज्य उद्योग और निवेश के मामले में पिछड़ गया। भाजपा ने भ्रष्टाचार, सिंडिकेट राज, परिवारवाद और बेरोजगारी को प्रमुख मुद्दा बनाया, जिसे जनता ने स्वीकार किया। शिक्षक भर्ती घोटाला और आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी घटनाओं ने सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुँचाया। - मुस्लिम और एससी-एसटी वोटों में बड़ी सेंधमारी
ममता बनर्जी का सबसे मजबूत आधार ‘मुस्लिम वोट बैंक’ इस बार दरकता नजर आया। मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में भाजपा की बढ़त ने यह साफ कर दिया कि मुस्लिम मतदाताओं का एक वर्ग अब बदलाव चाहता है। इसके अलावा अनुसूचित जाति (SC), जनजाति (ST), मतुआ समुदाय और चाय बागान श्रमिकों ने भी भाजपा के पक्ष में मतदान किया। - महिलाओं ने छोड़ा ‘दीदी’ का साथ
पिछले चुनावों में ममता बनर्जी की ताकत रहीं महिला मतदाताओं ने इस बार भाजपा के वादों पर अधिक भरोसा जताया। टीएमसी की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना के मुकाबले भाजपा द्वारा महिलाओं को 3,000 रुपये मासिक और बसों में मुफ्त यात्रा के वादे ने गेम-चेंजर की भूमिका निभाई। - भारी एंटी-इनकंबेंसी और ‘अभिषेक फैक्टर’
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ममता सरकार के खिलाफ जबरदस्त सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) थी। परिवारवाद और अभिषेक बनर्जी को दी गई असीमित शक्ति भी पुराने टीएमसी समर्थकों को रास नहीं आई। विपक्षी दलों के विधायकों को तोड़ने की राजनीति ने भी जनता के बीच नकारात्मक संदेश दिया। - चुनाव आयोग की सख्ती और ‘निर्भय’ मतदान
इस बार चुनाव आयोग ने फर्जी मतदाताओं के नाम काटकर मतदाता सूची (SIR) को दुरुस्त किया। केंद्रीय बलों की 700 कंपनियों की तैनाती और कड़े सुरक्षा इंतजामों के कारण मतदाताओं ने बिना किसी डर के मतदान किया, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिलता दिख रहा है। क्या बंगाल में अब थमेगी हिंसा की राजनीति?
भाजपा ने बंगाल में ‘विकास’ और ‘कानून-व्यवस्था’ को फिर से बहाल करने का दावा किया है। रुझानों से स्पष्ट है कि टीएमसी अब दहाई के आंकड़े (Double Digit) में सिमटने की ओर है। आज शाम तक आधिकारिक परिणामों के साथ ही बंगाल की राजनीति का नया अध्याय शुरू हो जाएगा।