मौजूदा समय में Iran और United States के बीच सीजफायर तो लागू है, लेकिन तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है। अमेरिका लगातार अपनी शर्तें लागू करना चाहता है, जबकि ईरान ने साफ कर दिया है कि कोई भी समझौता तभी होगा, जब उसकी शर्तों को माना जाएगा।
दूसरी ओर, अमेरिका ने फिलहाल सीधे हमले से दूरी बनाई है, लेकिन इसके बावजूद ईरान पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। दरअसल, अमेरिका ने ईरान के आसपास समुद्र में सख्त नाकेबंदी (ब्लॉकेड) कर रखी है, जिससे उसके तेल निर्यात पर बड़ा असर पड़ रहा है।
मिडिल ईस्ट में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। एक तरफ जहां होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से एलपीजी (LPG) की किल्लत की खबरें आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान अपने कच्चे तेल को सहेजने के लिए अनोखी चुनौती से जूझ रहा है।
खर्ग द्वीप पर संकट: क्या भर जाएंगे तेल के भंडार?
गल्फ न्यूज की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिबंधों के बावजूद ईरान के खर्ग द्वीप (Kharg Island) पर तेल का प्रवाह थम नहीं रहा है। यहां हर दिन 10 से 11 लाख बैरल कच्चा तेल पहुंच रहा है। स्थिति यह है कि जमीनी भंडारण (Onshore Storage) में अब केवल 1.3 करोड़ बैरल की ही क्षमता बची है।
अगर निर्यात में रुकावट जारी रही, तो मौजूदा रफ्तार से अगले 15 दिनों (दो हफ्तों) में ईरान के सभी जमीनी टैंक पूरी तरह भर जाएंगे। इस संकट से निपटने के लिए ईरान ने ‘फ्लोटिंग स्टोरेज’ का सहारा लिया है। इसके तहत विशाल टैंकरों को समुद्र में ‘तैरते गोदाम’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें M/T Nasha जैसे विशालकाय जहाजों (330 मीटर से अधिक लंबे) को दशकों बाद फिर से सक्रिय किया गया है।
इंसान की ड्रिलिंग बनाम कुदरत की रफ्तार: आखिर कैसे बनता है तेल?
एक तरफ जहां युद्ध के कारण तेल की सप्लाई के लिए हाहाकार मचा है, वहीं दूसरी तरफ यह समझना दिलचस्प है कि जिस ‘काले सोने’ के लिए दुनिया लड़ रही है, उसे बनने में करोड़ों साल लगते हैं।
- समुद्री जीवों का अवशेष (The Beginning) : तेल का निर्माण आज से लाखों साल पहले मरे हुए सूक्ष्म समुद्री जीवों (जैसे शैवाल और ज़ूप्लैंकटन) से होता है। जब ये जीव मरकर समुद्र की तलहटी में जमा हुए, तो उन पर मिट्टी और पत्थर की परतें चढ़ती गईं।
- दबाव और गर्मी का जादू (The Process) : भारी दबाव और धरती की आंतरिक गर्मी ने इन अवशेषों को पहले ‘केरोजन’ (Kerogen) में बदला और फिर यही पदार्थ धीरे-धीरे कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस में तब्दील हो गया।
- गहराई की बढ़ती चुनौती : आज हमें तेल निकालने के लिए जमीन में बहुत गहरा उतरना पड़ रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो:
1949 में: कुओं की औसत गहराई लगभग 3,500 फीट थी।
आज: सबसे गहरा कुआं करीब 40,000 फीट तक जा चुका है, जो माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई से भी कहीं ज्यादा है।
भारत पर क्या होगा असर?
हालांकि भारत में फिलहाल पेट्रोल और डीजल का स्टॉक पर्याप्त बताया जा रहा है, लेकिन सप्लाई चेन बाधित होने से एलपीजी के वितरण पर असर देखा जा रहा है। होर्मुज स्ट्रेट में फंसे हजारों जहाजों के बीच भारतीय जहाजों की आवाजाही एक राहत की खबर है, लेकिन युद्ध लंबा खिंचने पर वैश्विक कीमतों में उछाल की आशंका बनी हुई है।
तेल का बनना एक भूगर्भीय घटना है जिसे दोहराया नहीं जा सकता, जबकि इसका उपभोग और इस पर होने वाले युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय कर रहे हैं। ईरान का ‘तैरता गोदाम’ मॉडल फिलहाल एक अस्थायी समाधान नजर आता है।
इसी बीच, Donald Trump ने Fox News को दिए इंटरव्यू में कहा कि अगर ईरान के पास तेल स्टोर करने की जगह खत्म हो गई, तो उसके तेल के कुओं में दबाव बढ़ सकता है। उनका कहना था कि तेल लगातार निकलता रहता है और अगर उसे समय पर बाहर नहीं निकाला गया, तो इससे बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है।
ट्रंप के इस बयान से साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका की नाकेबंदी के कारण ईरान का तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे उसे भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
ईरान के पास तेल और गैस का विशाल भंडार है। इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे प्रेशर कुकर में गैस और तेल दबाव में बंद हों। जमीन के नीचे मौजूद ये भंडार मोटी चट्टानों की परतों से ढके होते हैं, जो ढक्कन की तरह काम करती हैं और इन्हें बाहर निकलने से रोकती हैं।
सरल शब्दों में कहें तो यह ईरान पर आर्थिक दबाव बनाने की रणनीति है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि आखिर ईरान के पास इतना तेल आता कहां से है और जमीन के नीचे इसके भंडार कहां स्थित हैं?