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IPress House > Blog > फीचर > क्रिसमस की थाली में कैसे टर्की ने ले ली गूज़ की जगह?  यूरोप में टर्की ऐसे बना डिफॉल्ट डिश
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क्रिसमस की थाली में कैसे टर्की ने ले ली गूज़ की जगह?  यूरोप में टर्की ऐसे बना डिफॉल्ट डिश

Gopal Singh
Last updated: December 25, 2025 5:33 pm
Gopal Singh
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क्रिसमस में टर्की की परंपरा
क्रिसमस में टर्की की परंपरा
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आज अगर क्रिसमस की बात हो और टर्की का ज़िक्र न आए, तो त्योहार अधूरा सा लगता है। लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। कभी क्रिसमस की दावत में टर्की नहीं, बल्कि गूज़ यानी हंस सबसे ज़्यादा पसंद किया जाने वाला मांस हुआ करता था। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि 1950 के दशक में सामाजिक, आर्थिक और कृषि से जुड़े कई कारणों की वजह से हुआ।

क्रिसमस पर गूज़ की पुरानी परंपरा

यूरोप, खासकर ब्रिटेन में, सदियों तक क्रिसमस के मौके पर गूज़ पकाने की परंपरा रही। गूज़ अमीरों और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले किसानों—दोनों के लिए खास मानी जाती थी। लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के बाद हालात बदलने लगे। युद्ध के समय और

उसके बाद लंबे समय तक राशनिंग रही, यानी सरकार द्वारा जरूरी चीज़ों की सीमित और नियंत्रित सप्लाई, जिससे लोगों की खाने की आदतें और प्राथमिकताएं धीरे-धीरे बदल गईं।

राशनिंग खत्म हुई तो टर्की ने ली जगह

1950 के दशक में जैसे ही राशनिंग खत्म हुई, लोगों के पास खाने के ज्यादा विकल्प आने लगे। इसी दौरान टर्की ने बाज़ार में एंट्री मारी। टर्की का आकार बड़ा होता है, जिससे ज़्यादा लोगों को खिलाया जा सकता है। इसका स्वाद हल्का होता है और इसे कई तरीकों से पकाया जा सकता है, जो बदलती लाइफस्टाइल और बड़े पारिवारिक समारोहों के हिसाब से ज्यादा सुविधाजनक साबित हुआ।

खेती, बाज़ार और विज्ञापनों का असर

खेती और पोल्ट्री उद्योग में आई आधुनिक तकनीक ने भी टर्की को बढ़ावा दिया। टर्की को बड़े पैमाने पर, कम खर्च में और कम समय में पाला जाने लगा, जबकि गूज़ पालना महंगा और मेहनत भरा काम था। सुपरमार्केट संस्कृति के फैलने से टर्की आसानी से उपलब्ध होने लगा। साथ ही, मीडिया और विज्ञापनों ने टर्की को “परफेक्ट क्रिसमस डिश” के तौर पर पेश किया।

देखते-देखते 1950 के दशक तक टर्की क्रिसमस का डिफॉल्ट मीट बन गया और गूज़ धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटता चला गया। आज भी कुछ लोग परंपरा निभाने के लिए गूज़ पकाते हैं, लेकिन ज़्यादातर घरों में क्रिसमस की शान बन चुका है—टर्की। यह बदलाव सिर्फ खाने का नहीं, बल्कि बदलते समय, अर्थव्यवस्था और संस्कृति का भी आईना है।

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TAGGED: christmas food tradition, christmas meal history, christmas turkey history, europe christmas dish, festive food culture, goose vs turkey christmas, Indian Press House समाचार, turkey became default dish
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