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15 दिवसीय संस्कृत नाट्य कार्यशाला समापन: लखनऊ में बच्चों ने ‘दूतवाक्यं’ से संस्कृत को बनाया मॉडर्न और आकर्षक

उत्तर प्रदेश की राजधानी के गुलाला घाट स्थित कपीश्वर वैदिक गुरुकुल के प्रांगण में सोमवार को प्राचीन भारतीय संस्कृति और आधुनिक नाट्य कला का अद्भुत संगम देखने को मिला। अवसर था उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान एवं प्रांजल आर्ट्स एंड डेवलपमेंट सोसाइटी के मिलकर किए गए आयोजन में आयोजित 15 दिवसीय संस्कृत नाट्य कार्यशाला के समापन का, जहाँ बच्चों ने महाकवि भास रचित कालजयी नाटक ‘दूतवाक्यं’ का सफल मंचन कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

संवाद और संस्कारों की भाषा बनी संस्कृत


मंच पर बच्चों की परफॉरमेंस देख कर यह साफ हो गया कि संस्कृत अब सिर्फ मंत्रों तक सीमित नहीं है, यह एक्टिंग और डायलॉग्स की भी बेहतरीन भाषा है। डॉ. विवेक तांगड़ी की देखरेख में आयोजित इस शो ने बताया कि संस्कृत सीखना असल में सही संस्कार और जीवन जीने का तरीका सीखना है।

15 दिनों की मेहनत और मंच पर छा गए नन्हे कलाकार

इस शानदार परफॉरमेंस के पीछे बच्चों की 15 दिनों की कड़ी मेहनत थी। इस वर्कशॉप में बच्चों को सिर्फ एक्टिंग ही नहीं, बल्कि इन खास स्किल्स में भी एक्सपर्ट बनाया गया:

संस्कृत स्पीकिंग: भाषा की शुद्धता और बिना रुके बोलने का टैलेंट।

डायलॉग डिलीवरी: भावनाओं के साथ अपनी बात कहना।

स्टेज प्रेजेंस: आत्मविश्वास और पर्सनालिटी डेवलपमेंट।

इस पूरी ट्रेनिंग का डायरेक्शन भारतेन्दु नाट्य अकादमी के पूर्व छात्र रमन कुमार के मार्गदर्शन में रंगकर्मी आलोक कुमार शुक्ल ‘तुमुल’ ने किया, जबकि अंशु गुप्ता ने बच्चों को संस्कृत के कठिन शब्दों और उच्चारण को आसान बनाने में मदद की।

“संस्कृत दुनिया की सबसे साइंटिफिक भाषा है। एक्टिंग के जरिए इसे सीखना युवाओं में कॉन्फिडेंस और अपनी संस्कृति के प्रति गर्व पैदा करता है।” — स्वामी कौशिक चैतन्य जी

गेस्ट्स ने की टैलेंट की तारीफ


प्रोग्राम में आए मुख्य अतिथियों ने बच्चों के टैलेंट को देखकर उनकी जमकर तारीफ की:
डॉ. चन्द्रभूषण त्रिपाठी (GM, PCF): इसे मॉडर्न दौर में हमारी पुरानी कला की ‘वापसी’ (Comeback) बताया।
दिनेश मिश्र (सीनियर प्रशासनिक अधिकारी): इस बात पर जोर दिया कि संस्कृत को हमें डेली लाइफ में अपनाना चाहिए।
आर. के. सिंह (रिटायर्ड IG): उन्होंने संस्कृत को अनुशासन की भाषा बताते हुए आज के समय में नैतिक मूल्यों (Values) के लिए इसे जरूरी बताया।
ललिता प्रदीप (रिटायर्ड अपर निदेशक): उन्होंने कहा कि नाटक के जरिए संस्कृत सीखने से बच्चों की भाषा भी साफ होती है और वे अपनी जड़ों से भी जुड़ते हैं।

इस खास मौके पर डॉ. शीलवन्त सिंह और पवन यादव सहित कई जानी-मानी हस्तियां मौजूद रहीं, जिन्होंने बच्चों के इस प्रयास को ‘संस्कृत का ब्राइट फ्यूचर’ बताया।

news desk

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