वॉशिंगटन: 108 दिनों तक चले खून-खराबे के बाद अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म होने पर सहमति बन गई है। दोनों देशों के बीच हुए शांति समझौते की प्रमुख शर्तें भी सामने आ चुकी हैं। इस समझौते में सबसे बड़ा फोकस ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना और वैश्विक सप्लाई चेन के लिए बेहद अहम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा पूरी तरह खोलना बताया जा रहा है। 19 जून को स्विट्जरलैंड में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के बाद इसे लागू किया जाना प्रस्तावित है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल उठ रहा है—अगर अंत में बातचीत और समझौते पर ही आना था, तो फिर युद्ध और पुरानी डील को खत्म करने की जरूरत क्यों पड़ी?
कहां से शुरू हुआ अमेरिका-ईरान परमाणु विवाद?
इस पूरी कहानी की शुरुआत साल 2002 से मानी जाती है, जब दुनिया को पहली बार जानकारी मिली कि ईरान परमाणु कार्यक्रम पर काम कर रहा है। अमेरिका को संकेत मिले कि ईरान नतांज और अरक में परमाणु गतिविधियां चला रहा है, जिससे भविष्य में परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने की आशंका जताई गई।
इसके बाद अमेरिका, यूरोपीय देशों और अंतरराष्ट्रीय परमाणु निगरानी संस्थाओं का दबाव बढ़ने लगा। 2006 के बाद संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और यूरोप ने ईरान पर कई आर्थिक और रणनीतिक प्रतिबंध लगाए। इन प्रतिबंधों का असर ईरान के तेल कारोबार और बैंकिंग व्यवस्था पर पड़ा और इसके बाद बातचीत के रास्ते तलाशने की कोशिशें तेज हुईं।
ओबामा काल में कैसे बनी 2015 की ऐतिहासिक डील?
साल 2009 में अमेरिका में बराक ओबामा राष्ट्रपति बने। उनका मानना था कि प्रतिबंध और सैन्य टकराव किसी स्थायी समाधान का रास्ता नहीं बन सकते।
2012-2013 के दौरान ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच गुप्त बातचीत शुरू हुई। उस समय ईरान में डॉ. हसन रूहानी की सरकार थी और वह भी पश्चिमी देशों के साथ समझौते के पक्ष में माने जाते थे।
धीरे-धीरे यह प्रक्रिया औपचारिक वार्ता में बदली और 2013 में अंतरिम समझौते का रास्ता बना। करीब दो साल चली बातचीत के बाद अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी, रूस, चीन और ईरान के बीच 2015 में परमाणु समझौते पर सहमति बनी।
2015 की डील में क्या-क्या तय हुआ था?
इस समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कई सीमाएं तय की गईं।
- यूरेनियम संवर्धन को 3.67 प्रतिशत तक सीमित किया गया
- संवर्धित यूरेनियम भंडार को 300 किलोग्राम तक सीमित रखा गया
- बड़ी संख्या में सेंट्रीफ्यूज हटाए गए
- अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण एजेंसी को व्यापक निगरानी का अधिकार दिया गया
- बदले में अमेरिका, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र की तरफ से आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दी गई
ट्रंप ने ओबामा की डील को क्यों ठुकराया?
डोनाल्ड ट्रंप चुनाव प्रचार के समय से ही इस समझौते को एकतरफा और कमजोर बताते रहे थे। जनवरी 2017 में राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने मई 2018 में अमेरिका को इस समझौते से बाहर निकाल लिया।
ट्रंप के फैसले के पीछे कई तर्क बताए गए—
- उनका मानना था कि समझौते की कुछ शर्तें सीमित अवधि की थीं और बाद में खत्म हो सकती थीं
- उन्हें आशंका थी कि भविष्य में ईरान फिर परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ा सकता है
- उनका कहना था कि समझौते में बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम शामिल नहीं था
- ईरान की क्षेत्रीय गतिविधियों और सहयोगी समूहों के समर्थन को भी समझौते में जगह नहीं मिली थी
- ट्रंप का तर्क था कि प्रतिबंधों में राहत देकर ईरान को और मजबूत बनाया जा रहा था
- उनका विश्वास था कि कड़े आर्थिक दबाव से ज्यादा व्यापक समझौता कराया जा सकता है
इन्हीं वजहों के आधार पर ट्रंप प्रशासन ने 2015 के समझौते को खत्म करने का फैसला लिया था।
दूसरे कार्यकाल में ट्रंप की नई रणनीति क्या है?
2025 में दोबारा सत्ता में लौटने के बाद ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ नए शांति समझौते को अपनी रणनीतिक उपलब्धि के तौर पर पेश किया है। इसे ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ अभियान के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
नई सहमति में परमाणु हथियार न बनने देने की प्रतिबद्धता दोहराई गई है और यूरेनियम संवर्धन को लेकर भी नए दबाव की बात सामने आई है। हालांकि इसके तकनीकी और निगरानी ढांचे की पूरी तस्वीर अभी स्पष्ट नहीं मानी जा रही।
ओबामा बनाम ट्रंप: दोनों डील में आखिर बड़ा फर्क क्या है?
दोनों समझौतों का मूल उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार क्षमता से दूर रखना बताया गया है, लेकिन तरीका अलग नजर आता है।
ओबामा की डील को लेकर विशेषज्ञों का मानना रहा कि उसमें निगरानी व्यवस्था ज्यादा स्पष्ट और विस्तृत थी। वहीं ट्रंप जिस मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को समझौते में शामिल करना चाहते थे, उस दिशा में भी पूरी सफलता नहीं मिली।
इसी वजह से कई जानकार अब सवाल उठा रहे हैं कि अगर अंतिम लक्ष्य फिर बातचीत और नियंत्रण तंत्र ही था, तो इतने लंबे संघर्ष और पुराने समझौते को खत्म करने की रणनीति से वास्तविक बदलाव क्या हासिल हुआ।