अक्टूबर 1962 का साल है. अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी व्हाइट हाउस में बैठे हैं. थोड़े चिंतिंत और परेशान. वहीं दूसरी तरफ मास्को में निकिता ख्रुश्चेव सिगरेट के धुएं में डूबे किसी बड़े फैसले पर विचार कर रहे हैं. इसी बीच अमेरिकी जासूस विमानों को पता चलता है — “सोवियत संघ ने क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात कर दी हैं.” क्यूबा अमेरिका से सिर्फ 145 किलोमीटर दूर है लिहाजा ये ख़बर अमेरिका के दिल में हथियार गाड़ने जैसी थी. उधर अमेरिकी मीडिया चिल्लाने लगा — “रूस हमला करने वाला है!” हालात ये हो गए कि लोग बंकर बनाने लगे. बच्चे स्कूलों में परमाणु हमले की ड्रिल सीखने लगे. दुनिया सचमुच ‘वर्ल्ड वॉर-3’ के मुहाने पर पहुंचती हुई लग रही थी.
केनेडी ने क्यूबा की नाकाबंदी कर दी. लोगों ने बताया कि रूस के जहाज़ आगे बढ़ रहे हैं और इनके अंदर परमाणु मिसाइलें थीं. दोनों देशों ने एक-दूसरे पर निशाना साध रखा था. एक छोटी गलती पूरे ग्रह को राख में बदल सकती थी.
और फिर…ठीक अंतिम क्षणों में, मास्को से एक संदेश आता है- “हम मिसाइलें हटा लेंगे, अगर अमेरिका भी तुर्की से अपने हथियार हटाए.” डील हो जाती है. दुनिया बच जाती है. इस घटना को आज कहा जाता है — “Cuban Missile Crisis”. मानव इतिहास का सबसे खतरनाक परमाणु टकराव. यहां पर इस घटना का जिक्र करने का कारण ये है कि 2025 के सितंबर महीने में फिर से वैसे ही हालात बनते हुए दिखे और अक्टूबर में भी उनका दोहराव हुआ है.
यूक्रेन के साथ हो रही जंग पुतिन की अहम से जुड़ी हुई है. वो हर कीमत पर इसे जीतना चाहते हैं. ये कीमत नैटो पर हमला हो तो भी वो इसे चुकाएंगे. इसके पीछे एक कारण भी है. याद कीजिए 1983 में जब NATO ने यूरोप में एक युद्ध-अभ्यास किया जिसका नाम था Able Archer 83. लेकिन रूस को लगा “ये कोई अभ्यास नहीं… ये असली हमला है!” सोवियत रेड आर्मी ने परमाणु बम तैयार रखे. रडारों पर हाथ रखे जनरल मॉस्को से आदेश का इंतज़ार कर रहे थे. बस एक गलती और यूरोप तबाह हो जाता. बाद में जब दस्तावेज़ खुले, तो पता चला कि रूस सच में मान बैठा था कि NATO हमला करने वाला है. यानी बस कुछ मिनट की दूरी थी एक असली युद्ध से.
अब यूक्रेन का युद्ध चल रहा है। NATO हर दिन कहता है, “अगर रूस ने किसी NATO देश पर हमला किया, तो हम सब मिलकर जवाब देंगे” और रूस कहता है कि “अगर तुम दखल दोगे, तो परमाणु जवाब मिलेगा.”
इतिहास फिर से एक Cuban Missile Crisis-जैसी रेखा खींच रहा है. बस इस बार “क्यूबा” की जगह “यूक्रेन” है. इसीलिए इन दिनों फिर कहा जा रहा है कि यूरोप की तटरेखा जितनी शांत दिखती है उतनी है नहीं. इसी पानी के नीचे एक नई रणनीति चल रही है. खुफिया हमले, ड्रोन, अज्ञात टैंकर और ‘शैडो फ्लीट’ जो संदेश देता है कि एक बड़े पैमाने की तैयारी हो रही है. यह सिर्फ खबर नहीं, यह एक चेतावनी जैसी लगती है.” अलज़जीरा से बात करते हुए कोस्टल कैरोलिना विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एप्लाइड इंटेलिजेंस के सहायक निदेशक जोसेफ फिट्सनाकिस ने इस नई गतिविधि पर एक अहम बात कही कि ‘यूरोप आज रूस की सैन्य प्रगति का सामना करने के लिए उतना तैयार नहीं है जितना 1939 में था, जब नाजी सेना दरवाजे पर थी।'”

इसका कारण ये है कि यूरोप दो भागों में बंट गया है. पहला हिस्सा अग्रिम पंक्ति के देशों — फ़िनलैंड, पोलैंड और बाल्टिक का है जो खतरे को समझते हैं. दूसरा हिस्सा पश्चिमी यूरोप का है जो सार्वजनिक मन और राजनीतिक सहमति—दोनों ही मोर्चों पर—भ्रम और भीतर के मतभेदों से कमजोर पड़े हैं. अगर आप टाइमलाइन पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि रूस और यूरोप किस दिशा में बढ़ रहे हैं.
यूरोप के ऊपर मंडराता साया: रूसी घुसपैठ के बढ़ते सबूत
पिछले महीने यूरोप के आसमान में जो हुआ, वह किसी आकस्मिक घटना की तरह नहीं लगता — बल्कि एक सुनियोजित “स्ट्रेस टेस्ट” जैसा है, जो नाटो की प्रतिक्रिया क्षमता और सामरिक समन्वय दोनों की परीक्षा ले रहा है.
- 10 सितंबर: दो दर्जन रूसी Geran-2 ड्रोन नाटो हवाई क्षेत्र में दाख़िल हुए. पोलैंड की एयर डिफ़ेंस ने तुरंत अलर्ट जारी किया. तीन वर्षों के युद्ध में यह सबसे असामान्य और साहसिक कदम था.
- 19 सितंबर: तीन रूसी MiG-31 लड़ाकू विमान फ़िनलैंड की खाड़ी के ऊपर एस्टोनिया के हवाई क्षेत्र में बारह मिनट तक मंडराते रहे. वहां तैनात इतालवी F-35 विमानों ने तत्काल कार्रवाई की.
- 21 सितंबर: जर्मनी ने दो Eurofighter Typhoon भेजे जब एक रूसी Il-20M टोही विमान बाल्टिक सागर के ऊपर बिना उड़ान योजना और बिना रेडियो संपर्क के उड़ता पाया गया.
- 25 सितंबर: नाटो कमांड ने खुलासा किया कि हंगरी के Gripen विमानों ने लातवियाई हवाई क्षेत्र के पास रूसी Su-30, Su-35 और MiG-31 को रोकने की कार्रवाई की थी.
इन घटनाओं की श्रृंखला किसी साधारण “गलत नेविगेशन” का परिणाम नहीं थी. यह एक पैटर्न है कि रूस की “ग्रे ज़ोन” रणनीति का हिस्सा जिसमें सीधी लड़ाई के बजाय विरोधी की नर्वस सिस्टम को परखा जाता है: कैसे, कितनी जल्दी और कितनी सटीकता से वह जवाब देता है.
यूरोप के लिए यह एक चेतावनी है — आसमान सिर्फ सीमा नहीं, अब यह रणनीतिक संदेश का माध्यम बन चुका है.
ये घटनाएं जैसे ड्रोन, टोही मिशन, अज्ञात टैंकर—किस तरह एक बड़ी तस्वीर बनाते हैं? जाहिर है रूस ‘विशेष अवधि’ या ‘आपातकाल’ जैसा माहौल बना रहा है — एक ऐसी चरण-शून्य स्थिति जिसमें टकराव से पहले की रणनीतिक चालें होती हैं.
विश्लेषक एक और पहलू की ओर इशारा करते हैं. उनका मानना है कि रूस की शैडो फ्लीट — टैंकर जो प्रतिबंधों को तोड़ते हुए ना सिर्फ तेल ले जाती हैं, बल्कि जासूसी उपकरणों लैस ये फ्लीट ड्रोन लॉन्चिंग के लिए भी इस्तेमाल हो रही हैं. इसके सबूत तब मिले जब 2 अक्टूबर को फ्रांसीसी कमांडो ने बोराके नाम का एक जहाज़ को जब्त किया — उस पर संदिग्ध ड्रोन हमले से जुड़े संकेतों का शक था.
सितंबर के आखिर में एक ड्रोन हमले के बाद, कोपेनहेगन से लगभग 80 किलोमीटर दक्षिण स्थित एक शहर का एयरपोर्ट बंद कर दिया गया। इसके बाद आसपास के कई छोटे एयरपोर्ट्स पर भी इसी तरह के हमलों की रिपोर्ट सामने आई.
विशेषज्ञों का कहना है कि जिन देशों ने ड्रोन पहचान के लिए चीनी तकनीक का इस्तेमाल किया है, वे अब एक नए खतरे का सामना कर रहे हैं. इन उपकरणों के अचानक बंद हो जाने या विफल हो जाने का. 22 सितंबर को ठीक उसी दिन, जब हमला हुआ था, डीजेआई का ‘एयरोस्कोप’ सिस्टम ओस्लो एयरपोर्ट पर अचानक बंद पड़ गया. 2022 से रूस की खुफिया एजेंसियों पर यूरोप में तोड़फोड़ और भ्रामक सूचना अभियानों के आरोप लगते रहे हैं. अटलांटिक काउंसिल की उत्तरी यूरोप निदेशक, एना वीसलैंडर कहती हैं कि ‘हाइब्रिड युद्ध हमें तनावग्रस्त करता है, और धीरे-धीरे थका देता है. वो थकान, वो लगातार बना रहने वाला भय जो लोकतंत्र की प्रतिक्रियाशीलता को धीरे-धीरे कुंद कर देता है’.
यूरोप की नई बेचैनी: एकता की कमी और बढ़ता खतरा
पिछले कुछ महीनों में यूरोप का सुरक्षा परिदृश्य पहले से कहीं ज़्यादा अस्थिर दिख रहा है. ड्रोन हमले, ‘छाया बेड़े’ की रहस्यमय गतिविधियां, और रूस के हाइब्रिड युद्ध के संकेत सब मिलकर एक गहरी बेचैनी पैदा कर रहे हैं.
यूरोपीय संघ का हालिया शिखर सम्मेलन इस संकट को संभालने के बजाय, विभाजन को और उजागर करता दिखा. बेल्जियम ने यूक्रेन की मदद के लिए रूसी फंड के उपयोग और यूरोपीय रक्षा उद्योग को गति देने वाले प्रस्तावों पर अड़ंगा लगाया. रिपोर्ट में ‘शैडो फ्लीट’ का नाम तक नहीं था जबकि वही यूरोप की ऊर्जा सुरक्षा का सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है.
खुफिया साझेदारी में भी भरोसे की दीवारें दरक रही हैं। कई यूरोपीय एजेंसियां अब अमेरिका के साथ साझा की जाने वाली जानकारी सीमित कर रही हैं. डच खुफिया का हालिया बयान और जर्मनी के भीतर बढ़ती सतर्कता दिखाते हैं कि ट्रांस-अटलांटिक सहयोग अब उतना सहज नहीं रहा.
अमेरिका की नीति भी अस्पष्ट है. वाशिंगटन के संकेत दिन-ब-दिन बदल रहे हैं, जिससे यूरोप यह तय नहीं कर पा रहा कि अमेरिका कितना प्रतिबद्ध है. कई यूरोपीय नेताओं के मन में यही सवाल उठ रहा है कि “अमेरिका किसके साथ है?”
नॉर्डिक देशों की विशेषज्ञ एना वीसलैंडर मानती हैं कि ‘क्षेत्रीय सहयोग रूस की कमज़ोरियों पर वार कर सकता है, लेकिन यूरोप के पास अभी कोई समन्वित नीति नहीं है. डेनमार्क और पोलैंड जैसे देश सक्रिय हैं, पर बाकी महाद्वीप थकान और भ्रम से जूझ रहा है’.
खतरे के संकेत बढ़ रहे हैं. जर्मनी की संघीय खुफिया सेवा के प्रमुख ने चेताया है कि ‘नाटो-रूस टकराव 2029 से पहले भी संभव है’. अमेरिकी पूर्व सैन्य अधिकारी ग्राइम्स इसे “स्टेज-ज़ीरो” बताते हैं. जहां युद्ध अब केवल सीमाओं का नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक तैयारी का भी खेल बन चुका है.
इस पूरे संकट के बीच यूरोप दो मोर्चों पर खड़ा है. एक, रक्षा और खुफिया समन्वय का, दूसरा राजनीतिक एकजुटता का. अगर इन दोनों में से कोई भी कमजोर पड़ा, तो हाइब्रिड युद्ध यूरोप की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक चुनौती साबित हो सकता है.